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पंजाब के एक गांव में जनाज़े की रस्म को बदल कर एक नया इतिहास रचा हैं, रिपोर्ट मुहम्मद इस्लाम

पंजाब के एक गांव में जनाज़े की रस्म को बदल कर एक नया इतिहास रचा हैं ! जहां एक ग़रीब शख़्स का जनाजा कब्रिस्तान में पहुंचा और सफें दुरूस्त हुई तो ईमाम साहब ने शामिल हुए लोगों सें मुखातिब होकर एक दिल सोज ऐलान किया !

 

ये मैय्यत जिसका जनाज़ा हम पढ़ने आये हैं वो अपने घर का एकलौता (वाहिद) कफील और सहारा था ! सोगवारान (शौकाकुल) परिवार में सिर्फ एक बेवा और तीन छोटे बच्चें हैं !

 

इद्दत के अय्याम में उनके पास आमदानी का कोई जरिया नहीं है ! लिहाज़ा कब्रिस्तान के मैन गेट पर एक चादर बिछा दी गई हैं ! जो भी साहबे तौफीक बग़ैर किसी दिखलावे के अल्लाह की रज़ा के लिए एक रूपये सें लेकर अपनी हैसियत के मुताबिक जितनी रकम दे सकता हो वो वहां डाल दे ! तद्फीन के बाद जब चादर सें रकम जमा की गई तो वो एक लाख रुपए सें ज़्यादा थी !

 

किसी के दस रुपए थे तो किसी के सौ लेकिन इस मुस्तरका हमदर्दी ने यतीम बच्चों के लिए कई महीनों का मआस (ख़र्चा पानी) शुकून फराहम कर दिया, ताजियत सिर्फ हाथ उठाकर दुआ करने का नाम नहीं, बल्कि दु:ख की घड़ी में अमली सहारा बनने का नाम है !

 

हमारे नबी करीम सल्लललाहो अलैहि वस्सल्लम का फरमान हैं कि अगर कोई पौधा लगाएं और उससे किसी इंसान, परीन्दे या जानवर को कोई फायदा पंहुचे तो लगाने वाले को उसका भी सवाब मिलता रहता हैं, जन्नत का आसान रास्ता खल्के ख़ुदा की खिदमत में छुपा हुआ हैं !

 

आइये इस रिवायत को हर गांव व शहर में जिंदा करे ! जब भी किसी ऐसे का जनाजा हो जो घर का वाहिद कफील (अकेला कमाने वाला) था, तो वहां के उल्मा ए इकराम पाँच मिनट की इधर उधर की बात करने की बजाय ये ऐलान करें के “मरहूम के बच्चों के लिए अपना हिस्सा डालें” ताकि मरहूम के परिवार को म’आसी अखराजात और परेशानियां सें बचाया जा सकें और ये अमल सदका ए जरिया बन जाए – जज़ाक अल्लाह खैर !

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