भगवान् को तो दायित्व का एहसास हो
भगवान भरोसे’ व्यवस्था और जांच का ठीकरा
शंकर देव तिवारी
अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे और दान के पैसों में कथित गबन के मामलों ने श्रद्धालुओं को स्तब्ध कर दिया है! एसआईटी (SIT) की जांच और करोड़ों रुपयों की हेराफेरी के आरोपों के बीच, यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर उन निस्वार्थ सेवकों, भक्तों और निर्माण से जुड़े लोगों को क्यों कटघरे में खड़ा किया जा रहा है, जिन्होंने अपना पसीना बहाकर इस मंदिर को साकार किया।
जब दानपात्रों के पहरेदार ही ‘सांप्रदायिक खजाने’ की रखवाली में सेंध लगाने लगें, तो एक पल के लिए यह सोचना पड़ता है कि आखिर गलती किसकी है? भक्त अपनी गाढ़ी कमाई का एक हिस्सा भगवान के चरणों में अर्पित करता है — इस उम्मीद में कि भगवान उनके कष्ट हरेंगे। लेकिन यहां स्थिति उलट है; भगवान तो अपने ‘दायित्व’ निभाने में ऐसे व्यस्त हैं कि उनके अपने ही खजाने में हो रही हेराफेरी उन्हें नजर नहीं आ रही। आखिर सर्वशक्तिमान को ऐसे नश्वर इंसानों की रखवाली की आवश्यकता क्यों पड़ गई?
अब विडंबना देखिए। मंदिर के खजाने में ‘चोरी और सीनाजोरी’ के इस खेल में जब पर्दा उठता है, तो जांच का ठीकरा अनायास ही उन मासूम और समर्पित लोगों के सिर फोड़ने की तैयारी होने लगती है, जिनका कसूर सिर्फ इतना था कि वे किसी न किसी रूप में मंदिर निर्माण से जुड़े थे। जिन्होंने वर्षों तक ईंट-पत्थर ढोए, नक्शे बनाए या चंदा इकट्ठा किया — वे अब अचानक ‘चंदा घोटाले’ के संदिग्ध बन गए हैं।
यह ठीक वैसा ही है, जैसे पुल बनाने वाले इंजीनियर या मजदूरी करने वाले मजदूरों को उस भ्रष्टाचार की सजा दी जाए, जो पुल के उद्घाटन के बाद उसके टोल-टैक्स की वसूली करने वाले बाबुओं और अधिकारियों ने किया हो। मंदिर निर्माण की भव्यता और पवित्रता अपनी जगह है, लेकिन मंदिर प्रबंधन, दान की गिनती की पारदर्शी प्रणाली और सुरक्षा का जिम्मा संभालने वालों की जवाबदेही तय करने के बजाय, पूरी निर्माण बिरादरी पर शक की सुई घुमाना एक भद्दा मजाक है।
अगर चढ़ावे के बक्से से नोटों की गड्डियां गायब हो रही हैं, सोने-चांदी के आभूषणों का हिसाब किताब गड़बड़ है, तो जांच का भार उन पर नहीं आना चाहिए जिन्होंने मंदिर बनाया है, बल्कि जांच का डंडा उन ‘प्रबंधकों’ की पीठ पर चलना चाहिए जिनके नाक के नीचे यह घपला सालों-साल चलता रहा。
भक्तों की आस्था को ठेस पहुंचाने वाले इन चंद भ्रष्ट लोगों के कारण, उन लाखों रामभक्तों की मेहनत पर कालिख नहीं पोती जानी चाहिए जिन्होंने तन, मन और धन से राम मंदिर को अपना सर्वस्व दिया। अब SIT की 150 पन्नों की प्रारंभिक रिपोर्ट सामने है, तो समय आ गया है कि दूध का दूध और पानी का पानी हो। असली गुनहगारों, यानी चढ़ावे के प्रबंधन और व्यवस्था में बैठे जिम्मेदारों को सजा मिले, न कि मंदिर की नींव रखने वालों को बेवजह ‘जांच का भार’ ढोना पड़े।









