फूलमालाओं से लदे यह डिप्टी एसपी हमारे बड़े भाई हैं। हाल ही में इंस्पेक्टर से डिप्टी एसपी पद पर पदोन्नत हुए हैं। सच कहूं तो यह पद उन्हें बहुत पहले मिल जाना चाहिए था, बस थोड़ा विलंब हो गया। यह ऐसे पुलिस अधिकारी हैं जिन्होंने भले ही पूरे “विश्व” को नहीं, लेकिन अपनी कानूनी समझ और अनुभव से अनेक युवा दरोगाओं को पुलिसिंग में “ज्योति” भर दी है। इनकी कानूनी “राय” बेहद सटीक होती है।
विचार, व्यवहार और व्यक्तित्व के स्तर पर यह विरले लोगों में गिने जाते हैं। जिन पुलिस अधिकारियों के प्रति मेरे मन में सम्मान और स्नेह है, उनमें यह भी हैं।
यह अपने समय के रौबदार थानेदार रहे हैं। गलत को गलत और सही को सही कहने का साहस रखते हैं, भले ही उसका व्यक्तिगत नुकसान क्यों न उठाना पड़े।
जिन पुलिसकर्मियों का मैं सम्मान करता हूं, उनमें अधिकांश का स्वभाव ऐसा ही रहा है। यह उन लोगों में कभी शामिल नहीं रहे जो पुलिसिंग से अधिक “जी सर, हो जाएगा सर, टीवी बन जाएगा सर, सब्जी भिजवा दूंगा सर” वाली संस्कृति में विश्वास करते हों। गलत बात पर इनका जवाब हमेशा यही रहा सर, यह मैं नहीं कर पाऊंगा।
वर्ष 2019 में मैंने इनपर एक स्टोरी प्रकाशित किया था शीर्षक था मत पूछ अफसाने यह तो वर्दी में दीवाने हैं”
उस स्टोरी की शुरुआत की पंक्तियां लिखी थीं उसका कुछ अंश पढ़िए।
पकड़ के गिरेबां जो अपराधियों को देते हैं मरोड़,
खाकी वाले विभाग में नहीं है जिनका जोड़।
इन पंक्तियों को पढ़कर स्वाभाविक रूप से मन उस व्यक्ति का नाम जानना चाहता है जिसके लिए यह भाव पैदा हुए।
हालांकि वह न तो फेसबुकिया सिंघम हैं, न अखबारों के सुपरकॉप और न ही काला चश्मा लगाकर सड़कों पर वर्दी का रौब दिखाने वाले नायक। लेकिन यह जरूर कहूंगा कि उनका चरित्र काफी हद तक मनोज बाजपेयी द्वारा अभिनीत फिल्म शूल के नायक की याद दिलाती है। एक ऐसा पुलिसवाला जो अपने उसूलों के लिए अपराधियों की आंख की किरकिरी और उनके लिए कांटे की तरह चुभने वाला शूल बन जाता है।
पुलिस विभाग के पुराने लोग शायद अब तक समझ गए होंगे कि मैं किसकी बात कर रहा हूं। नए पुलिसकर्मी और आम लोग यदि बलिया, बनारस, मिर्जापुर और गाजीपुर तक अपने दिमाग के घोड़े दौड़ा रहे हों तो बता दूं कि वह हैं विश्वज्योति राय हैं। वर्ष 1997 में उपनिरीक्षक पद पर भर्ती हुए विश्वज्योति राय हाल तक भदोही में तैनात थे।
इधर बीच इनसे कई बार बातचीत हुई, लेकिन मुलाकात नहीं हो सकी। पदोन्नति के बाद मैंने आग्रह किया था कि बनारस पोस्टिंग करा लीजिए, लेकिन नियति ईन्हें मेरठ ले गई।
उम्दा कद, चुस्त-दुरुस्त व्यक्तित्व, कमांडो जैसी फुर्ती और हल्की मूंछों वाले विश्वज्योति राय जब पुलिस सेवा में आए तो युवा जोश से भरे हुए थे।
इनके भीतर कानून-व्यवस्था को मजबूत करने का जुनून था। संकल्प था कि जहां रहेंगे, वहां अपराध को पनपने नहीं देंगे।
यही कारण रहा कि जहां भी तैनात रहे, वहां आम जनता के लिए आंखों में नरमी और अपराधियों के लिए सख्ती बनी रही।
लोग इन्हें याद करते हैं क्योंकि इन्होंने अपनी मौजूदगी हर जगह महसूस कराई।
बनारस में सोनिया चौकी प्रभारी रहते हुए युवा नेता धर्मेंद्र सिंह पप्पू पर हमला करने वाले कुख्यात बाबू यादव और उसके साथियों के लिए वह यमराज साबित हुए।
यह कभी किसी के दबाव में नहीं आए।
गलत बात हो तो वरिष्ठ अधिकारियों तक से असहमति जताने का साहस रखते हैं।
गाजीपुर में तैनाती के दौरान एक प्रभावशाली नेता के अवैध कारोबार और उसके आर्थिक नेटवर्क पर इन्होंने हाथ डाला। नेता सीधे कप्तान के पास पहुंच गया। कप्तान ने अधीनस्थ अधिकारी की बात सुनने के बजाय नेता की बातों को महत्व देना शुरू कर दिया।
लेकिन विश्वज्योति राय ऐसे व्यक्ति नहीं थे जो अपनी मर्यादा और वर्दी के सम्मान से समझौता कर लें। उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि जो गलत है, उसे गलत ही कहेंगे।
विश्वज्योति राय के पुलिस जीवन से जुड़े ऐसे अनेक किस्से और प्रसंग हैं जो उनके व्यक्तित्व की झलक देते हैं। अपराधियों के प्रति कठोर और आम नागरिकों के प्रति संवेदनशील होना इनकी कार्यशैली की सबसे बड़ी पहचान रही है।
दिलचस्प बात यह है कि जहां अपराध नियंत्रण में इनका प्रदर्शन हमेशा चर्चा में रहा, वहीं मोटर वाहन अधिनियम के तहत चालान के मामले में वह अक्सर अपने वरिष्ठ अधिकारियों की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाते थे।
बैठक में जब पूछा जाता कि चालान कम क्यों हैं, तो इनका जवाब भी अलग होता था। यह कहते थे कि वाहन चलाने वालों की परिस्थितियों को समझना चाहिए। कोई किसान पंपिंग सेट के लिए डीजल लेने निकला है और हेलमेट भूल गया, कोई घर से जल्दबाजी में निकला और ड्राइविंग लाइसेंस साथ नहीं रख पाया।
ऐसे लोगों पर वह अनावश्यक सख्ती के पक्ष में नहीं हूँ सर।
इनका मानना था कि पुलिस का उद्देश्य केवल चालान काटना नहीं, बल्कि अपराध रोकना होना चाहिए।
अगर कोई आपराधिक प्रवृत्ति का हो असलहा, गांजा, हेरोइन या अन्य आपराधिक सामग्री का तस्कर हो तो उसे किसी भी कीमत पर मांद में से खींच लाते थें ।
यह पुलिस व्यवस्था में बढ़ते अनावश्यक दबाव, ट्रांसफर-पोस्टिंग में पैरवी और राजनीतिक हस्तक्षेप के आलोचक हैं।
इनका स्पष्ट मत है कि जब किसी पुलिसकर्मी की पोस्टिंग योग्यता और कार्यशैली के बजाय सिफारिश के आधार पर होगी तो उसका झुकाव भी उसी शक्ति केंद्र की ओर होगा जिसने उसे पोस्टिंग दिलाई है।
इससे पुलिस का मनोबल और निष्पक्षता दोनों प्रभावित होता है।
बड़े भाई विश्वज्योति राय की सबसे बड़ी विशेषता यही रही है कि इन्होंने पुलिस सेवा को नौकरी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी माना। उन्होंने अपनी शर्तों पर पुलिसिंग की, अपने उसूलों के साथ जीया और उसी रास्ते पर चलते हुए आज डिप्टी एसपी के पद तक पहुंचे हैं। ऐसे अधिकारियों की संख्या भले कम हो, लेकिन पुलिस विभाग की साख और जनता के विश्वास की असली पूंजी यही लोग होते हैं।
इनसे कई विषयों पर वैचारिक मतभेद भी होता है। ऐसे ही किसी विषय पर वैचारिक मतभेद बड़े भाई डिप्टी एसपी संजय सिंह से भी होते हैं मगर वैचारिक मतभेद कभी व्यवहार पर हावी नही होता। दोनों भाईयों का स्नेह सहयोग बना रहता है।
बहरहाल नये जगह नये दायित्व की शुभकामनाएं विश्वज्योति भईया।
विनय मौर्या
बनारस।।









