विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून पर विशेष
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कब तक चुकायेंगे पर्यावरण के दोहन की कीमत–ज्ञानेन्द्र रावत
महात्मा गांधी ने 1928 में पर्यावरणीय असंतुलन की चेतावनी देते हुए कहा था कि-” ईश्वर कभी नहीं चाहता कि भारत कभी पश्चिम की तरह औद्योगिकीकरण को अपनाये।” उनका यह भी मानना था कि देश को आजादी के बाद गरीबी के खात्मे और देशवासियों के सम्मानजनक जीवनयापन की दृष्टि से आर्थिक रूप से विकास करना ही होगा। उनके अनुसार भारत को अपने प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग के प्रति कहीं अधिक जिम्मेदारी दिखानी होगी और पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचाना होगा जिस पर हर तरह का जीवन विशेषकर मानव जीवन निर्भर है। इस संदर्भ में पर्यावरणविद ज्ञानेन्द्र रावत का कहना है कि दुखद यह है कि आजाद भारत की सरकारों ने गांधी के विचारों को पूरी तरह बिसार दिया और न जाने किस दर्प और ज्ञान के आलोक के मोहपाश में बंधकर भारतीय सच्चाइयों से परे संसाधन और ऊर्जा के सघन निर्बाध दोहन की नीतियों को अपनाया। इसका दुष्परिणाम जहां एक ओर मानव जीवन प्रभावित हुआ, संसाधनों पर कार्पोरेट घरानों के कब्जे से ग्रामीण और आदिवासी समाज बेदखली का शिकार हुआ और औद्योगिक कारखानों को प्रोत्साहन दिये जाने वाली परियोजनाओं के चलते प्रदूषण की समस्या ने भयावह रूप अख्तियार कर लिया। पर्यावरण विनाश सरकारों की कार्पोरेट घरानों के निजी स्वार्थ के आगे नतमस्तक होने का जीता-जागता सबूत है। प्रदूषित शहर,भयावह स्तर तक प्रदूषित वातावरण, मरती जीवनदायी नदियां, प्रदूषित जल, प्रदूषित हवा,पाताल में पहुंचता पानी यानी भूजल, खत्म होते जलस्रोत और जंगल, प्रदूषित मिट्टी, बंजर होती जमीन आदि-आदि इस तबाही के जीते-जागते सबूत हैं। इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है और वह जानलेवा बीमारियों का शिकार हो अनचाहे मौत के मुंह में जाने को विवश है। इसके बावजूद यह सिलसिला बेरोकटोक जारी है और सरकारें पर्यावरण के दोहन से हो रहे नुकसान से पीड़ित लोगों के विरोध से बेखबर आम आदमी के हितों की बलिवेदी पर विकास के नशे में मदहोश विकास रथ पर आरूढ हैं।
वैश्विक स्तर पर देखें तो आज से बीस बरस पहले हम सालाना आठ अरब मीट्रिक टन कार्बन वायुमंडल में छोड़ रहे थे जिसका आंकड़ा बढ़ कर आज डेढ गुणा से भी काफी ज्यादा हो गया है। इसके कारण धरती का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। इससे प्रकृति का मिजाज बदल रहा है। इसमें जलवायु परिवर्तन ने अहम भूमिका निबाही है। संयुक्त राष्ट्र ने जलवायु संकट को लेकर जारी चेतावनी में कहा है कि जलवायु लक्ष्यों के पूरा होने की उम्मीद न के बराबर है। हकीकत में दुनिया में ऊर्जा की जरूरत पूरा करने के लिए कोयला, तेल और गैस का ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है। इससे होने वाले उत्सर्जन से जलवायु लक्ष्यों की पूर्ति नहीं हो सकती। जलवायु परिवर्तन रोकने के भारत के प्रयास नाकाफी हैं। इस बाबत भारत को प्रयास तेज करने होंगे।
क्लाइमेट ट्रांसपेरेंसी की रिपोर्ट की मानें तो 2030 तक भारत के ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में करीब-करीब दोगुने बढ़ोतरी होने की आशंका है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि कार्बन उत्सर्जन में कमी न होने की स्थिति में क्या होगा? जाहिर है जल संकट बढ़ेगा, बीमारियां सुरसा के मुंह की भांति बढ़ेंगीं, खाद्यान्न उत्पादन में कमी आयेगी, ध्रुवों की बर्फ तेजी से पिघलेगी, समुद्र का जलस्तर तेजी से बढ़ेगा, नतीजतन दुनिया के कई देश पानी में डूब जायेंगे, समुद्र किनारे सैकड़ों की तादाद में बसे शहर- महानगर जलमग्न तो होंगे ही, तकरीबन 20 लाख से ज्यादा तादाद में प्रजातियां सदा-सदा के लिए खत्म हो जायेंगीं। खाद्यान्न संकट होगा सो अलग। सबसे बड़ी बात यह कि सदियों से जीवन के आधार रहे खाद्य पदार्थों के पोषक तत्व कम हो जायेंगे। खासियत यह कि खाद्य पदार्थ में पाये जाने वाले बी-1, बी-2,बी-5 और बी-8 जैसे विटामिनों में खासी कमी आयेगी।यही नहीं बीमारियों से बचाने वाले जैव रसायनों में भी कमी आने की आशंका है।
हालात की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि यदि धरती का तापमान दो गुणा से और बढ़ गया तो धरती का एक चौथाई हिस्सा रेगिस्तान में तब्दील हो जायेगा। दुनिया का 20-30 फीसदी हिस्सा सूखे का शिकार होगा। नतीजतन दुनियाभर में तकरीबन 150 करोड से ज्यादा लोग प्रभावित होंगे। जंगलों में आग की घटनाओं में बेतहाशा बढो़तरी होगी। इसका सबसे ज्यादा असर भारत समेत दक्षिण पूर्व एशिया, दक्षिण योरोप, मध्य अमरीका व दक्षिण आस्ट्रेलिया पर पड़ेगा। बीते चार दशकों से ही कम हो चुकी उर्वरा शक्ति वाली जमीन की सेहत बिगड़ने की दर अब सौ गुणा ज्यादा हो गयी है। अच्छी गुणवत्तापूर्ण खेतिहर जमीन बंजर होने की ओर अग्रसर है। उस हालत मे भविष्य में दुनिया की बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए दूसरे संसाधनों पर निर्भर होना पड़ेगा और आने वाले 24 सालों में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश,श्रीलंका, म्यांमार, मध्यपूर्व और उत्तरी अफ्रीका को इस चुनौती का भीषण सामना करना पड़ेगा।इसका सीधा असर खाद्यान्न, पेयजल और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ेगा। नतीजतन आम आदमी का जीना मुहाल हो जायेगा और लोग ठंडे प्रदेशों की ओर कूच करने को विवश होंगे।
आईपीसीसी की रिपोर्ट ने मौसम की चरम स्थितियों जैसे बाढ़, सूखा, मौसम के बदलते मिजाज, तूफान, ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और उनसे बनी झीलों, जंगलों में लगने वाली विनाशकारी आग तथा ऐसी ही अन्य अप्रत्याशित घटनाओं पर दुनिया का ध्यान केंद्रित किया है जिनका असर आज समूची दुनिया पर साफ तौर पर दिखाई पड़ रहा है। प्रकृति के सारे उतार-चढ़ाव मानवता को संभलने के लिए प्रकृति का इशारा हैं। आधुनिक सभ्यता के इतिहास में इस समय पर्यावरण तेजी से बदल रहा है। लेकिन हम लोग इसे गंभीरता से लेने के बजाय नजरंदाज कर रहे हैं। जबकि इसकी चपेट में सारी मानवता है। यह एक कड़वी सच्चाई है। इसलिए हमें कुछ करने से पहले यह सोचना होगा कि हम धरती को कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं और इसके जिम्मेदार भी हम ही हैं। पर्यावरण एक ऐसा मोर्चा है जिसके लिए देश ही नहीं,अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित प्रयास की जरुरत है। यदि हम इस दिशा में ईमानदारी से प्रयास करें और अपनी जीवनशैली में बदलाव लाकर प्रकृति से सामंजस्य कर प्रकृति के प्रहरी बनें तो इससे मानवता के साथ-साथ धरती पर रहने-बसने-जीने वाले तमाम जीव-जंतु और धरती को विनाश से बचाने में कामयाब हो सकते हैं।









