चाय पर साहित्य की चर्चा ‘ गोष्ठी में डॉ. यादवेंद्र आमोरिया के व्यक्तित्व एवं साहित्यिक कृतित्व पर चिंतन, रिपोर्ट निशा कांत शर्मा

‘चाय पर साहित्य की चर्चा ‘ गोष्ठी में डॉ. यादवेंद्र आमोरिया के व्यक्तित्व एवं साहित्यिक कृतित्व पर चिंतन किया गया। नगर के एटा क्लब में आयोजित गरिमामयी परिचर्चा में बुद्धिजीवियों ने साहित्य मनीषी डॉ. यादवेंद्र आमोरिया के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर सारगर्भित विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में लगभग 25 साहित्य प्रेमियों एवं विद्वानों की उपस्थिति रही।

इस अवसर पर उपस्थित साहित्यकारों ने डॉ. आमौरिया के साहित्यिक अवदान, सामाजिक सरोकारों तथा उनकी रचनात्मक दृष्टि पर विस्तार से प्रकाश डाला। वक्ताओं ने कहा कि डॉ. आमौरिया का साहित्य मानवीय मूल्यों, सामाजिक चेतना एवं सांस्कृतिक परंपराओं का सशक्त संवाहक है। वक्ताओं ने उनके व्यक्तित्व की सरलता, विद्वत्ता एवं समाज में के प्रति समर्पण भाव की सराहना करते हुए उन्हें साहित्य और संस्कृति का सच्चा साधक बताया।

कार्यक्रम में डॉ आशुतोष गुप्ता, डॉ शैलेन्द्र जैन, डॉ मुनेन्द्र सिंह चन्द्रावरिया, डॉ सुधीर पालीवाल, रामलाल कुशवाह, अच्युतम केशवम, संजय सिंह, दिनेश प्रताप सिंह चौहान, मुकुल नारायण जौहरी आदि ने उनके साहित्यिक तथा शैक्षणिक योगदान से जुड़े संस्मरण भी साझा किए।

कवि बलराम सरस ने उनकी जिजीविषा तथा कर्तव्यनिष्ठा से परिपूर्ण शोध पत्र का वाचन किया। हिंदी साहित्य के समालोचक डॉ के पी सिंह ने डॉ आमोरिया के गद्य लेखन पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वे धारा से अलग तथा धारा से आगे चलने वाले लेखक थे। उनके साहित्य में एक समाज सुधारक की संवेदना, सहानुभूति तथा ओजस्विता स्पष्ट दिखाई देती है।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. ओम ऋषि भारद्वाज ने प्रभावी एवं रोचक ढंग से किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता आचार्य डॉ. प्रेमी राम मिश्र ने की। उन्होंने कहा कि वे मात्र कवि ही नहीं थे, अपितु काव्य प्रतिभा के अनुपम उदाहरण थे। उनकी कविता में तन्मयता और संवेदनशीलता का दुर्लभ संयोग है।उन्होंने पुत्र प्रतीक आमौरिया सी.ए.की अपने पिता के प्रति अनन्य निष्ठा की भूरि भूरि प्रशंसा करते हुए राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की ये पंक्तियां सुनाईं – निज पूर्वजों के सद्गुणों पर गर्व जो करती नहीं। वह जाति जीवित जातियों में रह नहीं सकती कहीं।।

कार्यक्रम के संयोजक प्रतीक आमौरिया ने सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए साहित्यिक संवाद की ऐसी परंपराओं को निरंतर बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया। अपने पिताश्री को याद करते हुए कहा कि नैतिकता, आदर्श तथा प्रतिष्ठा के मानक में वह कभी धन को समाहित नहीं करते थे।

इस अवसर पर वेदान्त आमौरिया, ट्विशी आमौरिया, प्रशस्ति आमौरिया, वीरपाल सिंह, श्रीकृष्ण यादव, डॉ उमेश यादव, श्री अनिल उपाध्याय, श्री अभय मिश्रा की गरिमामयी उपस्थिति रही । सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में संपन्न हुई साहित्यिक गोष्ठी विचारों के आदान-प्रदान, साहित्यिक विमर्श तथा रचनात्मक संवाद का एक सफल मंच सिद्ध हुई।

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