WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.49 P
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.49 PM
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.48 PM
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.51 P
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.51 PM
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.50
WhatsApp Image 2026-08-14 at 8.40.50 PM

आम नागरिक व मतदाता जाने अपना अधिकार अधिकार से ना हो वंचित, रिपोर्ट अंशुल शर्मा

*आम नागरिक व मतदाता जाने अपना अधिकार अधिकार से ना हो वंचित*

*आरक्षित सीट से जीता प्रधान क्या अपना ‘प्रधान प्रतिनिधि’ बना सकता है? जानिए कानून*

*कानून का चाबुक सबके लिए समान*

17 अप्रैल 2026_

उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम के मुताबिक, पंचायत चुनाव में आरक्षण का मकसद वंचित वर्ग को सीधे नेतृत्व देना है। लेकिन कई जगह देखने को मिलता है कि आरक्षित सीट से जीती महिला प्रधान या एससी/एसटी/ओबीसी प्रधान की जगह उनके पति, बेटा या कोई रसूखदार व्यक्ति ‘प्रधान प्रतिनिधि’ बनकर सारा कामकाज चलाता है।

कानून क्या कहता है:

1प्रधान प्रतिनिधि का कोई पद नहीं: पंचायती राज एक्ट में ‘प्रधान प्रतिनिधि’, ‘प्रधानी पति’ या ‘प्रधानी पुत्र’ जैसा कोई पद मान्य नहीं है।
2. शक्तियों का हस्तांतरण अवैध: 2015 में पंचायती राज विभाग ने साफ आदेश दिया था कि निर्वाचित प्रधान ही बैठक की अध्यक्षता, चेक पर हस्ताक्षर, प्रस्ताव पास करना और सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन करेगा। कोई दूसरा व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकता।
3. कार्रवाई का प्रावधान: अगर कोई प्रधान अपने अधिकार किसी और को देता है तो जिलाधिकारी जांच के बाद उसे पद से हटा सकते हैं। शासन ने कई जिलों में ऐसे प्रधानों को बर्खास्त भी किया है।

हाईकोर्ट का रुख:
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी कई याचिकाओं में कहा है कि आरक्षित वर्ग की सीट पर जीता हुआ प्रधान ही संवैधानिक रूप से जवाबदेह है। उसके नाम पर कोई दूसरा व्यक्ति प्रशासनिक या वित्तीय काम नहीं कर सकता। इसे ‘प्रॉक्सी नेतृत्व’ मानकर कोर्ट सख्त टिप्पणी कर चुका है।

जमीनी हकीकत:
इसके बावजूद गांवों में ‘प्रधान पति’ संस्कृति हावी है। महिला या आरक्षित वर्ग के प्रधान को सिर्फ हस्ताक्षर तक सीमित कर दिया जाता है। असली फैसले प्रतिनिधि लेता है। इससे आरक्षण का मूल उद्देश्य कमजोर होता है।

प्रशासन की जिम्मेदारी:
डीपीआरओ और बीडीओ को निर्देश है कि ग्राम पंचायत की बैठकों में खुद प्रधान की उपस्थिति सुनिश्चित करें। चेक पर हस्ताक्षर के समय वीडियो रिकॉर्डिंग कराने के आदेश भी हैं। शिकायत मिलने पर धारा 95(1)(g) के तहत प्रधान को हटाने की कार्रवाई हो सकती है।

निष्कर्ष:
कानूनन कोई दूसरा व्यक्ति प्रधान का प्रतिनिधि बनकर प्रधानी नहीं चला सकता। अगर ऐसा हो रहा है तो यह पंचायती राज एक्ट का उल्लंघन है। ग्रामीण इसकी शिकायत सीधे डीएम या डीपीआरओ से कर सकते हैं।
(आईबी सिंह) वरिष्ठ पत्रकार, की कलम से✍️

Leave a Comment