ये हैं भारतीय जासूस कश्मीर सिंह जो आज से करीब 53 साल पहले दुर्भाग्य से पाकिस्तान में पकड़ लिए गए थे। किस्मत की कहानी देखिए कि 1973 में पकड़े जाने के बाद से वो जासूस पाकिस्तान की जेलों में 35 साल रहे। उस जासूस की वीरता की कहानी सोशल मीडिया पर आजकल खूब वायरल हो रही है।
मार्च 2008 में पाकिस्तानी जेलों में 35 साल बिताने के बाद कश्मीर सिंह जब भारत लौटे, तो वे सिर्फ अपने घर नहीं लौट रहे थे। वे 1973 में बंद हुए एक ‘टाइम कैप्सूल’ से बाहर आ रहे थे, जिनकी जवानी जेल की सलाखों और जंजीरों के बीच ट्रेन की तरह गुजर गई। जम्मू-कश्मीर के पूर्व महानिदेशक (DGP) शेषपाल वैद्य ने उन्हें सलाम किया है।
कश्मीर सिंह का जन्म 1941 में पंजाब में हुआ था। 1960 के दशक की शुरुआत तक वे भारतीय सेना का हिस्सा बन चुके थे। उन्होंने 1962 से 1966 के बीच सेना में सेवा दी। यह वह दौर था जब चीन के साथ हुए युद्ध के कारण भारतीय सेना का मनोबल बुरी तरह आहत था। सेना छोड़ने के बाद, वे पंजाब पुलिस में शामिल हो गए। एक ऐसी नौकरी जिसमें शोहरत तो नहीं, लेकिन स्थिरता जरूर थी।
बाद में कश्मीर सिंह से भारतीय खुफिया एजेंसी के लिए कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने के लिए संपर्क किया गया। बताया जाता है कि लगभग 400 रुपये प्रति माह पर उन्होंने यह जोखिम वाला काम करना मंजूर किया था। सोशल मीडिया पर एक यूजर ने कश्मीर सिंह की कहानी शेयर की। जम्मू-कश्मीर के पूर्व डीजीपी ने कश्मीर सिंह की बहादुरी को सलाम किया है।
1970 के दशक की शुरुआत में खुफिया काम बहुत कठिन और कठोर होता था। तब कोई डिजिटल फुटप्रिंट नहीं थे और न ही एक क्लिक पर सैटेलाइट तस्वीरें मिलती थीं। जानकारी खुद जाकर जुटानी पड़ती थी, जिसमें अक्सर बहुत बड़ा व्यक्तिगत जोखिम होता था।
मोहम्मद इब्राहिम नाम से पाकिस्तान में घुसे थे कश्मीर सिंह
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 1973 में कश्मीर सिंह ने ‘मोहम्मद इब्राहिम’ नाम का इस्तेमाल करके पाकिस्तान में प्रवेश किया। उस समय यह कोई अनोखी रणनीति नहीं थी। जीवित रहने के लिए भेष बदलना जरूरी था। बताया जाता है कि कश्मीर सिंह ने इसी फर्जी नाम से पहचान पत्र हासिल कर लिए थे और होटलों में भी इसी नाम से चेक-इन किया था।
पेशावर-रावलपिंडी सड़क पर पकड़े गए कश्मीर सिंह:
रिपोर्टों के अनुसार, कश्मीर सिंह को पेशावर-रावलपिंडी सड़क के पास पाकिस्तानी खुफिया अधिकारियों ने गिरफ्तार कर लिया। उन पर जासूसी से लेकर तस्करी तक के आरोप लगाए गए। ऐसे आरोप जिन्होंने उनके बाकी पूरे जीवन को तय कर दिया। भारत में, उनकी पत्नी परमजीत कौर अपने तीन छोटे बच्चों के साथ अकेली रह गईं। बच्चे दस साल से भी कम उम्र के थे।
पाकिस्तानी सैन्य कोर्ट ने कश्मीर सिंह को सुनाई मौत की सजा
1973 के आखिर में ही पाकिस्तान सेना की एक अदालत ने कश्मीर सिंह को मौत की सजा सुनाई। 1970 के दशक के मध्य में दीवानी अदालतों ने भी इस फैसले को बरकरार रखा, जिससे मानो उनकी किस्मत ही तय हो गई। इसके बाद दया याचिका भी दायर की गई, लेकिन उससे कोई राहत नहीं मिली। उन्हें फांसी देने के बजाय, उनकी सजा को एक ऐसी स्थिति में बदल दिया गया जो शायद फांसी से भी ज्यादा क्रूर थी। मौत की सजा पाए कैदी के रूप में एक लंबा और अनिश्चित जीवन।
कश्मीर सिंह बताते हैं की जेल में शुरुआती महीनों में मुझे बहुत बुरी तरह प्रताड़ित किया गया, क्योंकि अधिकारी उनसे जुर्म कबूल करवाना चाहते थे। अगले साढ़े तीन दशकों के दौरान मुझे पाकिस्तान की सात अलग-अलग जेलों में रखा गया। मैंने 17 साल जंजीरों में बिताए और लंबे समय तक अकेले कोठरी में रखा गया। कई साल ऐसे भी बीते जब मैंने न तो आसमान देखा और न ही किसी से मुलाकात की।
मुशर्रफ तक पहुंची बात तो फिर बदल गया सब कुछ:
2008 की बात है, जब पाकिस्तान के मानवाधिकार कार्यकर्ता अंसार बर्नी ने मानवाधिकार मंत्री के तौर पर लाहौर जेल का दौरा किया। वहां उन्होंने एक बुजुर्ग भारतीय कैदी को देखा, जो 35 साल से जेल में बंद था। बर्नी ने बाद में बताया कि इतने लंबे समय तक जेल में रहने के कारण सिंह मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुके थे।
कश्मीर सिंह की कैद की इतनी लंबी अवधि और वहां के हालात देखकर बर्नी हैरान रह गए और उन्होंने मानवीय आधार पर इस मामले को उठाया। उन्होंने तर्क दिया कि किसी भी व्यक्ति को चाहे उस पर कोई भी राजनीतिक आरोप क्यों न हों बिना किसी फैसले के दशकों तक जेल में सड़ने के लिए नहीं छोड़ा जाना चाहिए। उनकी यह बात पाकिस्तान के सर्वोच्च स्तर तक पहुंची।
जब पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति और सैन्य जनरल रहे परवेज मुशर्रफ को इस मामले के बारे में बताया गया, तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ। इसके कुछ समय बाद ही कश्मीर सिंह को राष्ट्रपति की ओर से माफी मिल गई। इस आदेश में उनकी रिहाई और उन्हें भारत वापस भेजने की बात शामिल थी।
ऐसे हुआ घर वापसी का लंबा सफर:
4 मार्च 2008 को कश्मीर सिंह वाघा बॉर्डर के रास्ते भारत आए। वे दृश्य कभी न भुलाए जा सकने वाले थे। एक कमजोर आदमी, जो अपनी उम्र से कहीं ज्यादा बूढ़ा लग रहा था, एक ऐसे देश में कदम रख रहा था जो इतना बदल चुका था कि उसे पहचानना भी मुश्किल था। अधिकारियों, मीडिया और उनके परिवार ने उनका स्वागत किया। परिवार के लोग, जो तीन दशकों से भी ज्यादा समय से उनकी राह देख रहे थे भावुक हो उठे।
पत्नी परमजीत कौर के साथ उनका मिलन बेहद मार्मिक था। उन्होंने अपनी जिंदगी का ज्यादातर हिस्सा एक ऐसी स्थिति में बिताया था, जहां वे न तो विधवा थीं और न ही पूरी तरह से एक पत्नी। बस इस उम्मीद को थामे रहीं कि उनके पति एक दिन जरूर लौटेंगे। उनके गांव में कश्मीर सिंह का स्वागत एक नायक की तरह हुआ।💐🇮🇳
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