*यातायात माह का मखौल: जीटी रोड पर ‘यमराज’ का पहरा, जीटी रोड पर सजा दी दुकानें बीच जीटी रोड को बना दिया पार्किंग एरिया, पार्क हो रहे कार और बाइक*
*जी टी रोड से डीएम-एसएसपी दफ्तर के मुख्य रास्ते के तिराहे पर सजी ‘मौत की मंडी’: दुकानदारों ने सड़क (जीटी रोड) पर उतारे टीवी-फ्रिज, बीच सड़क पार्क हो रही गाड़ियां; प्रशासन गहरी नींद में*
एटा |
दीपावली की चमक और पटाखों की गूंज के बीच एटा में एक खौफनाक सच सिर उठाए खड़ा है। एक तरफ आज ही पुलिस महकमे ने बड़े-बड़े ढोल-नगाड़ों और बैनर-पोस्टरों के साथ ‘यातायात माह’ का आगाज किया। अफसरों ने हरी झंडी दिखाकर गाड़ियां रवाना कीं, ताकि जनता को ट्रैफिक नियमों का पाठ पढ़ाया जा सके और सड़क हादसों पर ब्रेक लगे।
लेकिन, इस ढकोसले का असली सच देखना हो तो जिला मुख्यालय के ठीक नाक के नीचे, कोतवाली नगर क्षेत्र के जीटी रोड कचहरी तिराहे पर आइए। इसी सड़क से जिलाधिकारी (DM) और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) के दफ्तरों के लिए पहिए घूमते हैं। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस वीआईपी और व्यस्त मार्ग पर वीवीआईपी मूवमेंट रहता है, वहां आज ‘यातायात माह’ के पहले ही दिन नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और पूरा प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है।
*खरीदारी या हादसे का निमंत्रण? बीच सड़क सजी इलेक्ट्रॉनिक दुकानें*
त्योहारी सीजन में जेबें गर्म करने की अंधी होड़ में इलेक्ट्रॉनिक दुकानदारों ने इंसानियत और कानून, दोनों को ताक पर रख दिया है। दुकानदारों ने अपनी हदें लांघते हुए टी.वी., फ्रिज, वाशिंग मशीन और भारी-भरकम सामान सीधे जीटी रोड पर सजा दिए हैं।
सड़क का बड़ा हिस्सा दुकानों की भेंट चढ़ चुका है, और जो थोड़ी बहुत जगह बची थी, उस पर खरीदारी करने आने वाले लोग अपनी कारें और मोटरसाइकिलें बीच सड़क पर ही बेतरतीब पार्क करके गायब हो रहे हैं। त्योहार की इस उमड़ती भीड़ में अगर कोई एंबुलेंस फंस जाए या कोई तेज रफ्तार वाहन अनियंत्रित हो जाए, तो पलभर में यहां भीषण नरसंहार जैसा हादसा हो सकता है। क्या प्रशासन किसी बड़े जनाजे के निकलने का इंतजार कर रहा है?
*भास्कर रियलिटी चेक: तिराहे पर तमाशबीन बनी पुलिस*
जब ‘दैनिक भास्कर’ संवाददाता ने जमीनी हकीकत टटोली, तो ट्रैफिक पुलिस की कार्यशैली की पोल खुलकर सामने आ गई:
*वर्दी में आराम— जीटी रोड तिराहे पर ट्रैफिक पुलिस का एक सिपाही अपनी बाइक को ही ‘आराम कुर्सी’ बनाकर उस पर इत्मीनान से बैठा नजर आया।*
सिपाही की नाक के नीचे दुकानदार सड़क घेरकर बैठे थे और लोग बीच सड़क गाड़ियां पार्क कर रहे थे, लेकिन मजाल है कि खाकी वाले ने किसी को एक शब्द भी टोका हो। ट्रैफिक सुधारने की जिम्मेदारी संभालने वाले खुद यातायात नियमों की धज्जियां उड़वा रहे थे।
जब दैनिक भास्कर संवाददाता ने इस जानलेवा लापरवाही पर अफसरों की जवाबदेही तय करनी चाही, तो उनका गोलमोल जवाब सिस्टम लापरवाही को उजागर करने के लिए काफी था
> “रोड से अतिक्रमण हटाना नगर पालिका का काम है।”
> — अब्दुल कादिर, टीएसआई (ट्रैफिक सब-इंस्पेक्टर)
> “अस्थाई अतिक्रमण हटाना पुलिस का काम है। खैर, कल पुलिस के साथ मिलकर देखा जाएगा।”
> — निहाल सिंह, ईओ (नगर पालिका)
सवाल यह है कि जब तक दोनों विभाग अपनी फाइलें एक-दूसरे की टेबल पर फेंकते रहेंगे, तब तक क्या शहर की सड़कों पर किसी मासूम की जान का मोल चुकाया जाएगा?
*भास्कर की दो टूक*
दीपावली खुशियों का दीप जलाने का पर्व है, मातम मनाने का नहीं। अगर प्रशासनिक नाकामी और दुकानदारों की इस आपराधिक लापरवाही के चलते किसी घर का चिराग बुझ गया, तो क्या ये कुर्सी पर बैठे जिम्मेदार अपनी नींद से जागेंगे? ‘यातायात माह’ का यह ढोंग अब जनता की जिंदगी पर भारी पड़ने लगा है। वक्त आ गया है कि कागजी रस्मों-रिवाज बंद हों और बुलडोजर व डंडे की भाषा में इस अतिक्रमण को कुचला जाए, वरना कल बहुत देर हो चुकी होगी।















