उपेक्षा के भंवर में भदावर का खेल गौरव: आख़िर बाह को कब मिलेगा अपना स्टेडियम?
दो-दो अर्जुन अवार्ड देने वाली ऐतिहासिक धरती पर खिलाड़ियों के भविष्य को निगलती राजनीति की मृग मरीचिका।
शंकर देव तिवारी
इतिहास के झरोखे से देखें तो यमुना, उटंगन और चम्बल के दोआबे में बसा भदावर क्षेत्र किसी परिचय का मोहताज नहीं है। कलयुग की इस गाथा में जिसे राजस्व के नक्शे में आज हम ‘बाह’ नाम से पुकारते हैं, उसका अतीत गौरवशाली राजाओं की पांच राजधानियों की गवाही देता है। भिंड और अटेर के किलों से शुरू हुआ यह सफर हतकांत, पिनाहट, बटेश्वर और बाह से होते हुए नौगवा तक पहुंचा। रामायण काल की पौराणिक धरोहर को समेटे इस माटी ने समय के कई रंग देखे हैं। लेकिन विडंबना देखिए, जिस क्षेत्र ने कभी दश्यु काल के दंश को झेला, आज वहां खेल और खिलाड़ियों का एक नया युग अंगड़ाई ले रहा है। मगर इस नए युग को भी सुविधाओं की कमी का ग्रहण लगा हुआ है।
एक तरफ भदावर राज्य का राजघराना राजनीति के शीर्ष पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी विधायक बनकर आज भी काबिज है, तो दूसरी तरफ इसी माटी के गरीब और मध्यमवर्गीय घरों से निकले वो खिलाड़ी हैं जो देश-दुनिया में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं। बाह ने देश को दो-दो अर्जुन अवार्ड विजेता दिए हैं। यहां के एथलीट, वॉलीबॉल और क्रिकेट खिलाड़ी विश्व पटल पर बाह का नाम रोशन कर चुके हैं। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि साधनहीनता और रोजी-रोटी के अभाव में यहां के खिलाड़ियों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। देश की सरहद पर जान न्योछावर करने वाला यहां का फौजी जब घर लौटता है, तो उसे भी रोजगार और आजीविका के लिए किसी खिलाड़ी की तरह ही पलायन का दंश झेलना पड़ता है। बाह में वही प्रतिभा आगे बढ़ पाती है, जो विपरीत परिस्थितियों में खुद अपने लिए मौके तलाश लेती है।
बाह को खेल जगत का सिरमौर बनाने के दावे और प्रयास कई बार हुए, लेकिन प्रशासनिक शिथिलता के कारण ये सारे प्रयास ‘नौ दिन चले अढ़ाई कोस’ वाली कहावत को ही चरितार्थ करते रहे। बड़े महाराज के दौर से लेकर आज तक हर चुनाव में बाह में एक सर्वसुविधायुक्त स्टेडियम के निर्माण की रट लगाई जाती है, लेकिन हर बार चुनावी वादा किनारे आकर राजनीति के विकार भरे बहाव में बह जाता है। आज हमारा बाह एक खेल स्टेडियम तक के लिए तरस रहा है।
राजनीति की इसी मृग मरीचिका ने भदावर की जनता और युवाओं को अपनी ही जायज मांग के लिए लाचार बना दिया है। यदि जनप्रतिनिधि और शासन वाकई संवेदनशील होते, तो सांसद और विधायक निधि के समन्वय से एत्मादपुर की तर्ज पर बाह में भी एक भव्य खेल परिसर का निर्माण बहुत पहले हो चुका होता। भदावर राजघराने के वंशज, जो स्वयं एक प्रतिष्ठित इतिहासविद, साहित्य के गोयनका पुरस्कार से सम्मानित और स्वयं पूर्व खिलाड़ी रहे हैं, यदि वे निजी तौर पर भी पहल करें तो भदावर स्टेट का अपना एक स्टेडियम खड़ा हो सकता है। मगर ‘अगर-मगर’ के इसी फेर में बाह का युवा आज भी धूल भरे मैदानों में अपना भविष्य तलाश रहा है।
बाह की इस सुलगती मांग और खिलाड़ियों के हक को लेकर मन में एक ही टीस उठती है:
एक अकेली बात है,उनके लिए ये आम है।मगर हमारे लिए खास,चाहें तो पूर्ण करें, यही मांग है।
वक्त आ गया है कि खोखले आश्वासनों से आगे बढ़कर धरातल पर काम किया जाए। बाह के खेल गौरव को सहेजने और युवाओं को पलायन से बचाने के लिए यहां ‘महाराज महेंद्र रिपुदमन सिंह भदावर स्टेडियम’ का निर्माण कराया जाना अब केवल एक मांग नहीं, बल्कि इस ऐतिहासिक क्षेत्र का अधिकार है। शासन-प्रशासन और स्थानीय नेतृत्व को अब जागना ही होगा।















