मुंशी प्रेम चंद आज औऱ कल पर एक नजर
शंकर देव तिवारी
आज के दौर में प्रेमचंद किसी भी राजनीतिक नैरेटिव का ‘टूल’ बनने से इनकार कर देते। वे आज के जातिवादी शोर-शराबे से दूर, गंगी के घड़े के टूटने की आवाज को आज के संदर्भ में दर्ज करते, जो हर तरह के राजनीतिक और सामाजिक पाखंड पर सबसे बड़ा तमाचा होती।
प्रेमचंद की सुप्रसिद्ध कहानी ‘ठाकुर का कुआं’ सामाजिक भेदभाव, जातिवाद और अमानवीयता पर एक गहरा प्रहार है। यदि आज के दौर में लगातार बढ़ते जातिवादी प्रलाप (discourse) के बीच प्रेमचंद यह कहानी , तो उनका दृष्टिकोण क्या होता, इस पर एक गंभीर साहित्यिक और सामाजिक विश्लेषण नीचे दिया गया है:
क्या वे जातिवादी प्रलाप में सुर में सुर मिलाते या मोड़ लेते?
सुर में सुर नहीं मिलाते: प्रेमचंद कभी भी संकीर्ण या सतही नैरेटिव के साथ बहने वाले लेखक नहीं थे। आज का जातिवादी प्रलाप अक्सर राजनीतिक लाभ, ध्रुवीकरण और समाज को बांटने पर आधारित होता है। प्रेमचंद इसके साथ सुर में सुर कभी नहीं मिलाते।
बात खत्म करने के बजाय नया मोड़ देते: वे इस प्रलाप को महज एक राजनीतिक बहस मानकर खारिज नहीं करते, बल्कि इसे एक मानवीय और मनोवैज्ञानिक मोड़ देते। वे दिखाते कि तकनीक और आधुनिकता के बावजूद इंसानी दिमाग आज भी उसी ‘कुएं’ के पास खड़ा है।
• मजबूरी और लाचारी का शाश्वत चित्रण: आज की कहानी में जक्खू की बीमारी और गंगी की बेबसी को वे आज के प्रशासनिक भ्रष्टाचार, महंगे इलाज और आधुनिक सामाजिक ऊंच-नीच से जोड़ देते, जिससे बात खत्म होने के बजाय और गहरी होती।
हिंदी वाले प्रेमचंद बनाम उर्दू वाले प्रेमचंद का फर्क
प्रेमचंद ने अपने साहित्यिक सफर की शुरुआत उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से की थी और बाद में वे हिंदी में ‘प्रेमचंद’ बने। इन दोनों रूपों में गहरा अंतर और एक सुंदर समन्वय था:
आयाम उर्दू वाले प्रेमचंद (नवाब राय) हिंदी वाले प्रेमचंद
तेवर और शैली अधिक आक्रामक, सीधा प्रहार, रूमानियत और बगावत का घालमेल। अधिक संयत, गहरा सामाजिक विश्लेषण, यथार्थवाद।
दृष्टिकोण ‘सोज़े-वतन’ के दौर का राष्ट्रवाद और व्यवस्था के प्रति तात्कालिक गुस्सा। गांधीवादी हृदय-परिवर्तन से लेकर ‘कफन’ और ‘गोदान’ के घोर यथार्थवाद तक का सफर।
भाषा मुहावरेदार, चुटीली और अवाम की जुबान (हिंदुस्तानी)। संस्कृतनिष्ठ शब्दों का सहज समावेश, लेकिन आम आदमी की पहुंच के भीतर।
आज के दौर में यदि वे लिखते, तो उर्दू वाले प्रेमचंद व्यवस्था पर सीधे और तीखे सवाल दागते, जबकि हिंदी वाले प्रेमचंद समाज के भीतर झांककर उस कड़वे सच को सामने लाते जिसे लोग देखना नहीं चाहते। हालांकि, दोनों का मूल उद्देश्य ‘मानव-कल्याण’ ही रहता।
क्या आज
वर्तमान में वामपंथी (Leftist) विचारक प्रेमचंद को शोषितों, दलितों और किसानों की आवाज के रूप में अपनी ‘कलम की धार’ बनाते हैं। लेकिन अगर आज प्रेमचंद जीवित होते, तो वामपंथी उनसे पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो पाते:
प्रेमचंद किसी एक ‘वाद’ (Ism) के बंधक नहीं थे। वे मार्क्सवाद से प्रभावित जरूर थे, लेकिन उनका मूल दर्शन भारतीय समाज की ज़मीनी हकीकत और मानवीय संवेदना से जुड़ा था।
वामपंथ जहां हिंसक या पूर्ण वर्ग-संघर्ष (Class Struggle) की बात करता है, वहीं प्रेमचंद (अपने अंतिम दौर को छोड़कर) अक्सर हृदय-परिवर्तन और नैतिक सुधार पर भरोसा करते थे।
आज के दौर में प्रेमचंद केवल शोषक वर्ग (ठाकुर) पर ही नहीं, बल्कि शोषित वर्ग के भीतर की कुरीतियों, आपसी ईर्ष्या और राजनीति पर भी उतनी ही बेबाकी से लिखते। यह निष्पक्षता आज के खेमेबाजी वाले विचारकों (चाहे वे वामपंथी हों या दक्षिणपंथी) को रास नहीं आती।















