जमीन बदली न आसमान,तू कितना बदल गया इंसान-जिंदा मां-बाप को पानी नहीं, पितृपक्ष में गंगाजल
कागारौल । पितृपक्ष के समय एक सज्जन इंसान ने कहा घुमा-फिराकर नहीं, सीधे दिल के दरवाजे पर दस्तक देकर जीते-जी सम्मान नहीं दिया, उनके मरने के बाद कर्मकांड का दिखावा किसके लिए।
पितृपक्ष आते ही धर्म-कर्म की दुकानें सज जाती हैं। कहीं पिंडदान की तैयारी, कहीं तर्पण का विधान, कहीं ब्राह्मण भोज की व्यवस्था और कहीं कैमरा देखकर श्रद्धा का स्तर अचानक बढ़ जाता है। सज्जन व्यक्ति बोला भईया, श्रद्धा मन में हो तो कैमरे की जरूरत नहीं पड़ती।
कहा कि गुरु की नजर में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन माता-पिता ने अपनी जिंदगी बच्चों की परवरिश में खपा दी, क्या उनके जीते जी दो मीठे बोल भी नसीब नहीं हुए। बुढ़ापे में बूढ़े बाप को दवा की जरूरत थी, तो बेटे ने व्यस्तता का हवाला दे दिया। जिस बेटे पर बूढ़ी मां के साथ बैठकर दो बात करने का समय नहीं वो मोबाइल में दुनिया भर की खबरें देखता है, और फिर वही साहब पितृपक्ष में बड़े विधि-विधान से श्राद्ध कराने निकल पड़े।
इस्माइल समाजसेवी बोले बाहरे जमाने, जिंदा बाप के लिए कमरा छोटा पड़ गया और मरने के बाद फोटो के सामने पूरा पंडाल सजा दिया। साहब का कहना है कि परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं का अपना महत्व है, लेकिन उनके साथ जीवित माता-पिता और बुजुर्गों की सेवा, सम्मान और देखभाल भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। भूखे माता-पिता के सामने पकवानों का भोग लगाने से पहले उनके लिए दो रोटियां जुटाना ज्यादा जरूरी है। अकेले बैठे बुजुर्ग के पास बैठ जाना शायद किसी बड़े कर्मकांड से कम नहीं। सज्जन व्यक्ति फिर बोला कृपितरों को याद रस्म निभाने से पहले यह भी देख लो कि घर में कोई जीवित बुजुर्ग उपेक्षा की धूल तो नहीं फांक रहा।
आखिर श्राद्ध केवल तिथि, तर्पण और पिंडदान का नाम नहीं। सच्ची श्रद्धा शायद वही है, जिसमें बुजुर्गों के जीवित रहते उनके चेहरे पर संतोष की मुस्कान दिखाई दे और एक सज्जन जाते-जाते कह गए। मरने के बाद तस्वीर पर माला चढ़ाने से पहले, जीते-जी उनके गले लगकर देखो शायद यही सबसे बड़ा श्राद्ध हो।
इस्माइल समाजसेवी
कागारौल, आगरा















