डिग्री निर्माण केंद्र’ बनता ऐतिहासिक आगरा विश्वविद्यालय: अनुबंध पर टिकी शिक्षा और गायब होता अकादमिक वैभव
खास बात
डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (आगरा विश्वविद्यालय) में भारी संख्या में रिक्त पदों और अतिथि प्रवक्ताओं पर निर्भरता के कारण प्रशासनिक व शैक्षणिक असंतुलन की स्थिति बनी हुई है। हालांकि विश्वविद्यालय के अधिकांश पाठ्यक्रम यूजीसी से मान्यता प्राप्त हैं, लेकिन मानकों को पूरा न करने के कारण कई संबद्ध कालेजों की मान्यता समय-समय पर निरस्त भी की गई है। परीक्षा संचालन और मूल्यांकन जैसी व्यवस्थाओं के निजी एजेंसियों को टेंडर पर सौंपे जाने से संस्थान की स्वायत्तता पर सवाल खड़े होते हैं..
शंकर देव तिवारी
आगरा.एक दौर था जब देश के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थानों में शुमार डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (पूर्व में आगरा विश्वविद्यालय) का नाम बड़े ही आदर और गौरव के साथ लिया जाता था। इस विश्वविद्यालय का अतीत बेहद सुनहरा और अकादमिक ऊंचाइयों से भरा रहा है। देश-दुनिया को प्रखर राजनेता, वैज्ञानिक, नौकरशाह और साहित्यकार देने वाली इस ऐतिहासिक धरोहर की वर्तमान स्थिति को देखकर आज हर प्रबुद्ध नागरिक, अभिभावक और छात्र का दिल कचोटता है। जो संस्थान कभी ज्ञान का आलोक बिखेरता था, आज वह अपनी बदहाली, अव्यवस्था और ‘ठेकेदारी प्रथा’ के चलते एक दयनीय मोड़ पर खड़ा है। ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ अब शिक्षा का अवगाहन नहीं, बल्कि किसी स्टेशनरी कंपनी या महज एक ‘डिग्री निर्माण केंद्र’ का संचालन हो रहा है, जहाँ पढ़ाई से लेकर परीक्षा और परिणाम तक सब कुछ आउटसोर्सिंग और अनुबंध के सहारे घिसट रहा है।
अनुबंध संस्कृति और निजी एजेंसियों का शिकंजा
विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि यहाँ की मूल शैक्षणिक और प्रशासनिक व्यवस्था अब आउटसोर्सिंग (ठेके) के दलदल में धंस चुकी है। प्रवेश प्रक्रिया से लेकर परीक्षा फॉर्म भरने, एडमिट कार्ड जारी करने, और यहाँ तक कि परीक्षा कराने व कॉपियों के मूल्यांकन (एग्जाम इवैल्यूएशन) जैसे अत्यंत गोपनीय और संवेदनशील कार्य भी बाहरी निजी एजेंसियों को सौंप दिए गए हैं। जब शिक्षा और परीक्षा का कार्य व्यावसायिक हितों वाली निजी कंपनियों के हाथ में चला जाएगा, तो उसकी शुचिता और गुणवत्ता की गारंटी कौन लेगा? आए दिन कॉपियों के गायब होने, अंकों के हेरफेर, और रिजल्ट में भारी गड़बड़ियों की खबरें इसी ठेका प्रथा का दुष्परिणाम हैं। यह स्थिति विश्वविद्यालय को एक उच्च शिक्षण संस्थान से कम और स्टेशनरी की एक ऐसी दुकान के रूप में अधिक दिखाती है, जहाँ कागजों का हेरफेर ही मुख्य व्यवसाय बन चुका है।
कक्षाओं से दूर मूल शिक्षक और ‘गेस्ट’ के भरोसे भविष्य
इस बदहाली का एक और स्याह पहलू यह है कि विश्वविद्यालय और उससे संबद्ध कॉलेजों के नियमित और अनुभवी प्राध्यापक आज कक्षाओं से दूर दिखाई देते हैं। वे या तो प्रशासनिक जोड़-तोड़, वीआईपी ड्यूटियों, विभिन्न गैर-शैक्षणिक अवकाशों या अन्य कागजी कामों में व्यस्त हैं। जब नियमित शिक्षक अपने मूल दायित्व यानी अध्यापन से दूर रहेंगे, तो छात्रों के साथ न्याय कैसे होगा? इस शून्य को भरने के लिए ‘अतिथि प्रवक्ताओं’ (गेस्ट फैकल्टी) और तदर्थ शिक्षकों की फौज खड़ी कर दी गई है। निश्चित रूप से गेस्ट फैकल्टी में योग्यता की कमी नहीं होती, लेकिन अत्यंत कम मानदेय, अनिश्चित भविष्य और अनुबंध की शर्तों के बीच काम करने वाले इन शिक्षकों से हम उस अकादमिक निष्ठा और शोधपरक माहौल की उम्मीद कैसे कर सकते हैं, जो एक स्थाई और सुरक्षित शिक्षक दे सकता है? जब रीढ़ की हड्डी ही अस्थायी होगी, तो शिक्षा का ढांचा कैसे सीधा खड़ा रहेगा?
सरकार की नीतियां: लोकलुभावन समाधान बनाम बुनियादी सुधार
इस पूरे परिदृश्य में सरकार और शिक्षा विभाग की भूमिका भी आत्ममुग्धता से घिरी नजर आती है। एक तरफ नए पदों के सृजन और घोषणाओं की झड़ी लगा दी जाती है, लेकिन धरातल पर शिक्षकों की कमी जस की तस बनी हुई है। सरकार का पूरा ध्यान बुनियादी ‘शिक्षा नीति’ को मजबूत करने, शोध को बढ़ावा देने और सत्रों को नियमित करने पर कम, बल्कि वेतन, छुट्टी, तबादले और प्रोन्नति जैसे प्रशासनिक और लिपिकीय समाधानों में ही उलझा रहता है। इन सतही सुधारों और राजनीतिक तुष्टीकरण के चक्कर में विश्वविद्यालय का असली ‘शिक्षण माहौल’ पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। कोर्स और सत्र (अकादमिक कैलेंडर) महीनों और कभी-कभी सालों पिछड़ रहे हैं, जिससे छात्रों का भविष्य अंधकारमय हो रहा है।
विडंबनाओं का शिखर: भ्रम में जीते छात्र और नेतृत्व का संकट
विश्वविद्यालय परिसर की विडंबनाएं और संवादहीनता इस कदर बढ़ चुकी हैं कि छात्र अपने बुनियादी अधिकारों के लिए भटक रहे हैं। हाल ही में छात्र गेट पर धरना देकर नारा लगा रहे हैं कि “कुलपति गायब हैं”, जबकि तकनीकी रूप से राज्य विश्वविद्यालयों में ‘उप-कुलपति’ (वाइस चांसलर या कुलपति) ही सर्वेसर्वा होता है और कुलाधिपति (चांसलर) राज्यपाल होते हैं। यह भ्रम और आक्रोश इस बात का प्रतीक है कि छात्रों और प्रशासन के बीच संवाद की खाई कितनी गहरी हो चुकी है। जब छात्रों को यह भी स्पष्ट न हो कि उनकी समस्याओं को सुनने वाला शीर्ष अधिकारी कौन है और वह कहाँ बैठता है, तो प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़े सवाल उठना स्वाभाविक है। जब तक शीर्ष नेतृत्व परिसर में बैठकर छात्रों और शिक्षकों के साथ सीधा संवाद नहीं करेगा, तब तक अराजकता का यह माहौल खत्म नहीं हो सकता।
विभाजन की मार और घटती साख
आगरा विश्वविद्यालय के विशाल भौगोलिक क्षेत्र को छोटा करने और प्रशासनिक सुगमता के नाम पर इससे काटकर सात नए विश्वविद्यालय बना दिए गए। विभाजन प्रशासनिक रूप से सही हो सकता था, लेकिन इसके साथ ही आगरा विश्वविद्यालय ने अपना वह पुराना प्रभाव, राजस्व और अकादमिक विविधता भी खो दी। नाम बदलने और संकुचित होने के बाद इस केंद्रीय कल्प संस्थान को जिस तरह से उपेक्षित छोड़ दिया गया, उसी का नतीजा है कि आज इसकी तुलना देश के उन राज्यों (जैसे बिहार या झारखंड के कुछ बेहद पिछड़े विश्वविद्यालयों) से होने लगी है, जो सत्रों के लेट होने और अराजकता के लिए बदनाम रहे हैं। यदि यही हाल रहा, तो ख्यातिप्राप्त डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय केवल कागज के टुकड़े (डिग्रियां) बांटने वाली एक फैक्ट्री बनकर रह जाएगा, जिसकी साख राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शून्य होगी।
अभिभावकों की दुविधा और भविष्य की राह
हम अभिभावक भी इस व्यवस्था में कहीं न कहीं केवल ‘रिजल्ट’ और ‘डिग्री’ की चाहत तक सीमित हो गए हैं। हमें यह सोचना होगा कि बिना गुणवत्तापूर्ण ज्ञान और बिना किसी वास्तविक शैक्षणिक माहौल के मिली वह चमचमाती डिग्री हमारे बच्चों को रोजगार और जीवन की रेस में कहाँ खड़ा करेगी? यदि शैक्षणिक कार्य मूल शिक्षकों के बजाय बाहरी और गैर-जिम्मेदार लोगों से संपन्न होंगे, तो क्या हम अपने बच्चों के भविष्य से संतुष्ट हो सकते हैं? बिल्कुल नहीं।
अब समय आ गया है कि इस ऐतिहासिक विश्वविद्यालय को बचाने के लिए एक बड़े और कड़े नीतिगत हस्तक्षेप की शुरुआत हो। आउटसोर्सिंग और अनुबंध की इस आत्मघाती संस्कृति को तुरंत बंद करना होगा। परीक्षाओं और मूल्यांकन की कमान वापस स्थाई और जवाबदेह शिक्षकों के हाथों में सौंपनी होगी। सरकार को केवल वेतन और छुट्टियों के फेर से निकलकर सत्रों को नियमित करने और रिक्त पदों पर स्थाई नियुक्तियां करने के लिए युद्ध स्तर पर काम करना होगा। आगरा विश्वविद्यालय के इस ढलते सूरज को यदि आज नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। शिक्षा को ठेकेदारी से मुक्त करना ही इस संकट का एकमात्र समाधान है।
















