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आत्म-ग्लानि का रोग और ‘हीनता’ की आपसी स्पर्धा, आलेख शंकर देव तिवारी

आत्म-ग्लानि का रोग और ‘हीनता’ की आपसी स्पर्धा

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आज हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ शांति और संतोष के मायने बदल चुके हैं। हम एक-दूसरे की टांग खींचकर, दूसरों को नीचा दिखाकर जो तसल्ली पाते हैं, उसे हमने ‘शांति’ का नाम दे दिया है। लेकिन सच तो यह है कि यह शांति नहीं, बल्कि हमारे भीतर पनप रहा ‘आत्म-ग्लानि’ नामक एक गंभीर मानसिक रोग है।

चाहे कॉरपोरेट दफ्तर हो, राजनीति हो, या हमारे घर के आस-पास का माहौल—कोई भी क्षेत्र इस आपसी शक्ति स्पर्धा से अछूता नहीं है। इस अंधी दौड़ में हमारा शिकार अक्सर वह इंसान बनता है जो हमसे कमजोर स्थिति में है। वह ‘मजदूर’ जो हमारे समाज की नींव रखता है, अक्सर हमारी इस विकृत मानसिकता की भेंट चढ़ जाता है। हम अपनी हीनभावना को छुपाने के लिए, अपने झूठे पद और प्रतिष्ठा के घमंड में इस कदर अंधे हो जाते हैं कि बुनियादी शिष्टाचार तक भूल बैठते हैं।

 

झूठे दम्भ का शिकार होता बुनियादी शिष्टाचार

जब कोई व्यक्ति भीतर से कमजोर या असुरक्षित महसूस करता है, तो वह अपनी ‘हेठी’ (बेइज्जती) से बचने के लिए एक आत्मघाती रास्ता चुनता है। वह अपने से पद, पैसे या स्थिति में छोटे व्यक्ति को व्यवहार से दबाने की कोशिश करता है। किसी मजदूर के काम में बेवजह कमियां निकालना, उसे मानसिक रूप से व्यथित करना और समाज में उसे कमतर आंकना—यह सब इसी दोयम दर्जे के व्यवहार का हिस्सा है।

हम यह भूल जाते हैं कि:

पद और प्रतिष्ठा अस्थाई हैं: आज जो पद आपके पास है, कल वह किसी और के पास होगा।

सम्मान देने से मिलता है: जब हम किसी श्रम करने वाले का अनादर करते हैं, तो हम उसकी नहीं बल्कि अपनी खुद की परवरिश और सोच को कटघरे में खड़ा करते हैं।

हर काम का अपना मूल्य है: समाज का पहिया तभी घूमता है जब हर वर्ग अपना काम पूरी निष्ठा से करे।

 

आत्म-ग्लानि से मुक्ति का मार्ग

इस आत्म-ग्लानि और हीनता के चक्रव्यूह से निकलने का एकमात्र तरीका आत्म-मंथन है। हमें यह समझना होगा कि दूसरों को छोटा दिखाकर हम कभी बड़े नहीं बन सकते। असली ताकत दूसरों को दबाने में नहीं, बल्कि उन्हें साथ लेकर चलने और उनके श्रम का सम्मान करने में है।

आइए, इस झूठे दम्भ के खोल को तोड़ें। अगली बार जब हम किसी श्रमिक, किसी कर्मचारी या अपने से छोटे पद के व्यक्ति से बात करें, तो हमारे लहजे में अहंकार की जगह कृतज्ञता और सम्मान होना चाहिए। यही इस मानसिक रोग की एकमात्र दवा है।

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