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बलरामपुर अस्पताल में ओपीडी 8 बजे, डॉक्टरों की एंट्री 11 बजे! BMFNEWS

*बलरामपुर अस्पताल में ओपीडी 8 बजे, डॉक्टरों की एंट्री 11 बजे!*

 

*सरकार की मंशा शानदार, बलरामपुर के साहबों की सुस्ती लाचार!*

 

मरीज कतार में कुर्सियां इंतजार में और डॉक्टर साहब अपनी सुविधा के हिसाब से-सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल,

 

*संवाददाता मोहम्मद सैफ साबरी*

राजधानी लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल की एक तस्वीर स्वास्थ्य व्यवस्था के दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। एक तरफ सूबे की सरकार और स्वास्थ्य मंत्री प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था को आधुनिक बनाने अस्पतालों को हाई-टेक करने और हर मरीज को समय पर बेहतर इलाज देने के लिए दिन-रात प्रयासरत हैं, वहीं दूसरी तरफ अस्पताल के कुछ जिम्मेदार अधिकारियों और डॉक्टरों की उदासीनता इस बेहतरीन मंशा को पलीता लगा रही है।

 

अस्पताल में ओपीडी का निर्धारित समय सुबह 8 बजे है। मरीज अपनी बीमारी की पीड़ा और उम्मीद का झोला उठाए सुबह से ही लंबी कतारों में अपनी बारी का इंतजार करते हैं। लेकिन डॉक्टर साहब अपनी सुविधानुसार 10 या 11 बजे अस्पताल की दहलीज पर कदम रखते हैं। कमरा नंबर 209 सहित कई कमरों में कुर्सियां मरीजों का नहीं, बल्कि डॉक्टरों का इंतजार करती नजर आती हैं।

 

नदारद डॉक्टरों के बारे में पूछने पर रटा-रकाया जवाब मिलता है कि डॉक्टर साहब राउंड पर हैं। सवाल यह है कि क्या ओपीडी में घंटों से सिसकते मरीजों से ज्यादा जरूरी कोई अन्य कार्य हो सकता है? उधर, व्यवस्था का हाल जानने के लिए जब अधिकारियों को फोन मिलाया गया, तो कई नंबरों पर संपर्क ही नहीं हुआ। वहीं, मीडिया प्रभारी महोदय भी घर पर आराम फरमाते पाए गए।

 

सरकार का विजन बिल्कुल स्पष्ट है कि गरीब से गरीब व्यक्ति को मुफ्त और समय पर इलाज मिले। इसके लिए पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है, आधुनिक मशीनें और इमारतें तैयार की जा रही हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब अस्पताल के संचालक ही अपनी जिम्मेदारी भूल जाएंगे, तो करोड़ों की इन सुविधाओं का लाभ आम जनता को कैसे मिलेगा? मरीज कोई शौक से सुबह-सुबह लाइन में नहीं खड़ा होता, वह मजबूरी में आता है। यदि ओपीडी का समय 8 बजे है, तो डॉक्टरों की उपस्थिति भी उसी वक्त सुनिश्चित होनी चाहिए।

 

यह तस्वीर महज एक दिन की अव्यवस्था नहीं, बल्कि प्रशासनिक सुस्ती का आईना है। जरूरत इस बात की है कि जिम्मेदार अधिकारी इस मामले की निष्पक्ष जांच कराएं। सीसीटीवी कैमरों और ओपीडी के रिकॉर्ड्स को खंगालकर लापरवाहों पर सख्त शिकंजा कसा जाए, ताकि सरकार के बेहतरीन प्रयासों का पूरा लाभ अंतिम पायदान पर खड़े मरीज तक पहुंच सके।

 

आखिरकार, सरकारी अस्पताल में समय सिर्फ सरकार का नहीं, बल्कि हर उस लाचार मरीज के सम्मान का भी है जो उम्मीद की आस लिए डॉक्टर के दरवाजे पर खड़ा है।

 

 

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