एडीए की ‘गंगापुरम’ योजना में बड़ा खेल: योगी सरकार के नियम बने ‘हाथी के दांत’, सुप्रीम कोर्ट के वकील का आवेदन बिना कारण निरस्त!

आगरा। उत्तर प्रदेश सरकार की ‘पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त’ कार्यप्रणाली के दावे उस समय हवा-हवाई साबित हो गए, जब आगरा विकास प्राधिकरण (एडीए) की महत्वाकांक्षी योजना में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया। ताजनगरी में इन दिनों यह चर्चा आम है कि सरकार के कार्यक्रम ‘हाथी के दांत’ की तरह हो चुके हैं, जो खाने के कुछ और और दिखाने के कुछ और हैं। इस विसंगति का ताजा शिकार कोई आम नागरिक नहीं, बल्कि कानून के रखवाले ही बने हैं।बिना कारण आवेदन निरस्त, ड्रा से किया बाहरप्राप्त जानकारी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता, भाजपा लीगल सेल के पूर्व जनरल सेक्रेटरी और भाजपा युवा मोर्चा आगरा के पूर्व मीडिया प्रभारी अनिल गुप्त एडवोकेट ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक बेहद कड़ा शिकायती पत्र भेजा है। अनिल गुप्त ने आगरा विकास प्राधिकरण के अंतर्गत विकसित की जा रही ‘ग्रेटर आगरा’ की ‘गंगापुरम टाउनशिप’ में एलआईजी (लोअर इनकम ग्रुप) श्रेणी के तहत आवासीय प्लॉट आवंटन के लिए पंजीकरण कराया था। नियमानुसार सभी पात्रता शर्तें पूरी करने के बावजूद, एडीए के अधिकारियों ने बिना कोई वैध कारण बताए उनके आवेदन को अचानक निरस्त (रद्द) कर दिया। इसके चलते उन्हें आगामी लॉटरी ड्रा की प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर कर दिया गया है।पोर्टल पर दर्ज कराई शिकायत, भ्रष्टाचार के आरोपअधिवक्ता अनिल गुप्त ने मुख्यमंत्री कार्यालय को आईजीआरएस पोर्टल के माध्यम से शिकायत पत्र भेजकर एडीए की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। पत्र के साक्ष्यों से यह प्रमाणित होता है कि प्राधिकरण के भीतर फाइलों को मनमाने ढंग से रोका और निरस्त किया जा रहा है। पीड़ित अधिवक्ता का आरोप है कि एडीए के अधिकारी अपनी मनमर्जी चला रहे हैं और वास्तविक रूप से पात्र आवेदकों के हक पर डाका डाला जा रहा है। सत्ताधारी दल के पूर्व पदाधिकारी के साथ हुए इस अन्याय के बाद स्थानीय राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।जनता उठा रही सवाल: क्या यही है जीरो टॉलरेंस?इस घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि एडीए की आवासीय योजनाएं अब आम जनता की पहुंच से दूर और अधिकारियों की कठपुतली बन चुकी हैं। जब सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और संगठन के पूर्व मीडिया प्रभारी को अपने अधिकार के लिए मुख्यमंत्री की चौखट पर गुहार लगानी पड़ रही है, तो आम जनता की सुनवाई की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। शहर के बुद्धिजीवियों का कहना है कि यदि मुख्यमंत्री इस मामले में कड़ा संज्ञान लेकर एडीए के दोषी अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं करते हैं, तो सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति महज़ कागजी बनकर रह जाएगी।












