*भारत एवं भारतीय लोकतंत्र को बचाने के लिए मीडिया का सशक्तिकरण आवश्यक:*
(भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी के संस्थापक एके बिंदुसार की कलम से),
*आजादी से अब तक का कड़वा सच*
सत्ता का स्वार्थ और ठगी गई जनता:
वर्ष 1947 में जब भारत ने स्वतंत्रता की नई भोर में कदम रखा था, तब पूरे देश को एक पारदर्शी, जन-कल्याणकारी और सशक्त लोकतांत्रिक व्यवस्था की उम्मीद थी। परंतु, आजादी के सात दशकों से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी जमीनी धरातल पर आम नागरिक की मूल समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से लेकर आज तक विभिन्न राजनीतिक दलों ने सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए आम जनता का केवल एक “वोट बैंक” के रूप में इस्तेमाल किया है। चुनाव के समय बड़े-बड़े लोक-लुभावन वादे, जाति-धर्म के समीकरण और झूठे आश्वासन देकर जनता का विश्वास जीता जाता है, परंतु जैसे ही चुनाव समाप्त होते हैं, आम नागरिक को पुनः उसके हाल पर छोड़ दिया जाता है।
> “राजनीतिक व्यवस्था की आड़ में नेता माल-माल होते गए और देश की बेबस जनता फटेहाल होती चली गई।”
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आज स्थिति यह है कि देश का आम नागरिक अच्छी शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवा, निष्पक्ष न्याय, स्वच्छ वातावरण और सम्मानजनक रोजगार के लिए दर-दर भटक रहा है। वहीं दूसरी ओर, जन-प्रतिनिधियों की आर्थिक स्थिति और राजनीतिक रसूख में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। यह असमानता भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर एक गंभीर आघात है।
भारतीय लोकतंत्र के समक्ष गहराता गंभीर संकट:
जब किसी देश की शासन प्रणाली और राजनीतिक नेतृत्व लोक-कल्याण के मूलभूत पथ से भटक कर केवल सत्ता-सुख और निजी हितों की पूर्ति में लिप्त हो जाता है, तो लोकतंत्र का ढांचा खोखला होने लगता है। वर्तमान समय में भारतीय लोकतंत्र निम्नलिखित गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है।
वोट बैंक की संकीर्ण राजनीति: नीतियां और योजनाएं संपूर्ण राष्ट्र के विकास को ध्यान में रखकर बनाने के बजाय केवल चुनाव जीतने के अल्पकालिक गणित और सामाजिक ध्रुवीकरण को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं।
संवैधानिक संस्थाओं का अवमूल्यन: राजनीतिक स्वार्थ और प्रशासनिक दबाव के कारण कई स्वतंत्र एवं संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता प्रभावित हुई है, जिससे आम जनता का भरोसा डगमगा रहा है।
सत्य और सूचना का अभाव: भ्रामक प्रचार और नैरेटिव निर्माण के दौर में आम नागरिक तक सही और निष्पक्ष जानकारी नहीं पहुंच पा रही है, जिससे वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं हो पा रहा है।
‘नेतागिरी बना मीडिया गिरी’: चौथे स्तंभ के पुनर्जागरण का संकल्प:
ऐसी अत्यंत विकट और निराशाजनक स्थिति में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ—मीडिया—के नैतिक और सामाजिक दायित्व को रेखांकित करना न केवल आवश्यक है, बल्कि अति-अनिवार्य हो गया है। आज देश में एक वैचारिक क्रांति की आवश्यकता है, जिसे ‘नेतागिरी बना मीडिया गिरी’ के सिद्धांत के रूप में अपनाना होगा।
राजनीतिक दबाव व चाटुकारिता: ──(परिवर्तन)──> [निष्पक्ष व सशक्त मीडिया गिरी] ──> पारदर्शी व मजबूत लोकतंत्र,
‘नेतागिरी बना मीडिया गिरी’ का सीधा अर्थ यह है कि मीडिया को राजनीतिक आकाओं की चाटुकारिता, सत्ता के प्रचार-प्रसार और टीआरपी (TRP) की अंधी दौड़ से पूरी तरह बाहर निकलना होगा। निष्पक्ष पत्रकारिता को राजनीति के दबाव पर हावी होना पड़ेगा। पत्रकारिता का एकमात्र ध्येय सत्ता से तीखे सवाल पूछना, जन-समस्याओं को प्रमुखता से उठाना और आम नागरिक के अधिकारों की रक्षा करना होना चाहिए।
भारत एवं भारतीय लोकतंत्र को बचाने हेतु मीडिया का सशक्तिकरण:
यदि हमें भारत की संप्रभुता, अखंडता और इसके लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करनी है, तो मीडिया को हर स्तर पर स्वतंत्र और सशक्त बनाना ही होगा। जब तक पत्रकार बिना किसी डर या प्रलोभन के कार्य नहीं कर पाएंगे, तब तक लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता।
सशक्तिकरण के मुख्य आयाम आवश्यक कदम एवं दूरगामी प्रभाव:
पत्रकार सुरक्षा एवं स्वतंत्रता : जमीनी स्तर पर सच दिखाने वाले पत्रकारों को राजनीतिक व सामाजिक उत्पीड़न से पूर्ण कानूनी सुरक्षा प्रदान करना, ताकि वे बिना किसी भय के कार्य कर सकें।
आर्थिक आत्मनिर्भरता : छोटे और ग्रामीण क्षेत्रों के पत्रकारों व मीडिया संस्थानों को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाना, जिससे वे बड़े कॉर्पोरेट और राजनीतिक फंडिंग के दबाव से मुक्त रहें।
नैतिक व निष्पक्ष पत्रकारिता: एजेंडा-आधारित पत्रकारिता और भ्रामक खबरों को नकारते हुए केवल प्रमाणित और जनहितैषी तथ्यों को जनता के समक्ष प्रस्तुत करना।
जमीनी पत्रकारों का एकीकरण : देश के कोने-कोने में सेवारत निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारों को एक मजबूत संगठनात्मक मंच पर लाकर उन्हें समाज में उचित सम्मान दिलाना।
लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का एकमात्र मार्ग:
भारतीय लोकतंत्र को बचाने की यह लड़ाई केवल खोखले भाषणों या वादों से नहीं जीती जा सकती। जब तक निष्पक्ष, निडर और सशक्त मीडिया हर पीड़ित नागरिक की ढाल बनकर खड़ा नहीं होगा, तब तक सत्ता में बैठे लोग निरंकुश होते रहेंगे और जनता का शोषण होता रहेगा।
‘नेतागिरी बना मीडिया गिरी’ का यह दूरदर्शी सिद्धांत ही भारत को एक पारदर्शी, जवाबदेह और सच्चे अर्थों में लोक-कल्याणकारी लोकतंत्र की ओर ले जाएगा। आइए, हम सब मिलकर भारतीय मीडिया के इस पुनर्जागरण अभियान से जुड़ें और लोकतंत्र को सशक्त बनाएं।
— जय हिंद, जय भारत, जय भारतीय मीडिया फाउंडेशन












