उत्तराखंड भाजपा के अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने अब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे जी की रैली के बाद किए गए “शुद्धिकरण” का खुलकर बचाव करते हुए पूछा है, “अगर कार्यक्रम के बाद मैदान का शुद्धिकरण किया गया, तो इसमें गलत क्या था?”
इस एक बयान ने भाजपा के अब तक के सारे बहाने बेनकाब कर दिए हैं।
उस मैदान पर पहले भी कई राजनीतिक नेताओं की सभाएं हुई हैं। सरकारों, पार्टियों और विचारधाराओं की आलोचना भी हुई है। लेकिन उनके जाने के बाद कोई “शुद्धिकरण” नहीं किया गया। शुद्धिकरण तब किया गया, जब मल्लिकार्जुन खरगे जी, जो एक दलित हैं, उस मंच पर खड़े हुए।
आखिर भाजपा और उसके समर्थक किस चीज़ का शुद्धिकरण करना चाहते थे?

खरगे जी ने बेरोजगारी, पेपर लीक, सरकारी नौकरियों की बिक्री, अग्निवीरों के अनिश्चित भविष्य, छात्रों पर हिंसा, भ्रष्टाचार और मंदिरों के चढ़ावे की कथित चोरी की बात की थी। इनमें से किस बात ने उस मैदान को अपवित्र कर दिया?
या फिर एक दलित व्यक्ति का उस मंच पर खड़ा होना ही उन्हें अपवित्र लगा?
84 साल के एक नेता, जो अपार संघर्षों से उठकर यहां तक पहुंचे, जिन्होंने छह दशक जनसेवा को दिए और देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष बने, उन्हें भी वह महसूस कराया गया जिसे उन्होंने खुद “छुआछूत का डंक” कहा।
ज़रा सोचिए। अगर खरगे जी जैसे कद के व्यक्ति को सबके सामने इस तरह अपमानित किया जा सकता है, तो एक आम दलित इंसान को उस समय क्या कुछ सहना पड़ता होगा, जब वहां कोई कैमरा नहीं होता और उसे देखने वाला कोई ताकतवर व्यक्ति मौजूद नहीं होता?
क्या भाजपा महेंद्र भट्ट को पद से हटाएगी? क्या नरेंद्र मोदी और जेपी नड्डा उनके बयान की निंदा करेंगे?
अगर वे कोई कार्रवाई नहीं करते, तो उनकी चुप्पी और निष्क्रियता को इस जातिगत भेदभाव पर भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व की सहमति ही माना जाएगा।
कृपया इसे राजनीति का एक और विवाद समझकर आगे मत बढ़ जाइए। यह उन करोड़ों भारतीयों की गरिमा का सवाल है, जिनकी मौजूदगी, स्पर्श और अस्तित्व को सदियों तक “अपवित्र” माना गया।
हर ज़मीर वाले इंसान को इस पर बोलना और लिखना चाहिए, क्योंकि सत्ता में बैठे लोगों द्वारा ऐसे बेशर्म जातिगत भेदभाव का बचाव किए जाने पर चुप रहना, उसमें भागीदार बनने से कम नहीं है।
सिर्फ मल्लिकार्जुन खरगे जी के लिए नहीं, बल्कि हर उस इंसान के लिए, जिसे उसकी जाति के कारण कभी अपमानित किया गया है।













