गुस्ताखी माफ: चीनी-गुड़ के दाम आसमान पर, जमाखोरी की मार से जनता बेहाल
चीनी, शक्कर और गुड़ जैसी रोजमर्रा की जरूरी चीजों के दाम इन दिनों आम आदमी की पहुंच से बाहर होते नजर आ रहे हैं। स्थानीय बाजार में चीनी 70 से 75 रुपये किलो, गुड़ करीब 70 रुपये किलो और बताशे के दाम 100 रुपये किलो तक पहुंचने की चर्चा है।
महंगाई का दर्द हर घर महसूस कर रहा है, लेकिन सबसे बड़ी चिंता यह है कि लोग खुलकर बोलने से भी डर रहे हैं। बाजार में महंगे दामों को लेकर आम उपभोक्ताओं में नाराजगी है, मगर जमाखोरों और कालाबाजारी के खिलाफ आवाज उठाने से लोग बचते नजर आ रहे हैं।
लोगों का कहना है कि रोजमर्रा की जरूरत का सामान महंगा होने से घर का बजट बिगड़ रहा है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार पहले ही महंगाई की मार झेल रहे हैं। ऐसे में चीनी और गुड़ जैसी आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ना सीधे उनकी जेब पर असर डाल रहा है।
सवाल यह है कि अगर बाजार में पर्याप्त स्टॉक है तो कीमतें लगातार क्यों बढ़ रही हैं? क्या कहीं जमाखोरी और कालाबाजारी तो नहीं हो रही? और यदि ऐसा है तो संबंधित विभाग की नजर इन गतिविधियों पर क्यों नहीं पड़ रही?
जरूरत है कि प्रशासन और संबंधित विभाग बाजार में स्टॉक की जांच, दुकानों की नियमित निगरानी और जमाखोरी-कालाबाजारी के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे, ताकि आम जनता को राहत मिल सके।
महंगाई का दर्द जनता खुलकर कह नहीं पा रही, लेकिन हर घर की रसोई इसका असर महसूस कर रही है। अब सवाल सिर्फ चीनी और गुड़ के दाम का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जहां महंगाई से परेशान जनता आवाज उठाने में भी खुद को असहज महसूस कर रही है।
संवाददाता — सरोज कुमार दुबे













