EPI 2026 में भारत 177 देशों में 176वें स्थान पर है। भारत का EPI स्कोर 22.46 है,संकलन ज्ञानेन्द्र रावत

EPI 2026 में भारत 177 देशों में 176वें स्थान पर है। भारत का EPI स्कोर 22.46 है।

 

176वां भारत: क्या प्रकृति की कीमत पर आगे बढ़ रही है हमारी विकास यात्रा ? –डा० संजय राणा

 

भारत आज दुनिया की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में अपनी जगह बनाने की ओर तेजी से बढ़ रहा है। नए एक्सप्रेसवे बन रहे हैं, शहर फैल रहे हैं, उद्योग बढ़ रहे हैं, ऊर्जा की मांग बढ़ रही है और देश दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। लेकिन इसी विकास यात्रा के बीच पर्यावरण से जुड़ा एक आंकड़ा हमें ठहरकर सोचने के लिए मजबूर करता है।

Environmental Performance Index (EPI) 2026 में भारत 177 देशों में 176वें स्थान पर है। भारत का EPI स्कोर 22.46 है। यह आंकड़ा किसी राजनीतिक दल, सरकार या विचारधारा की आलोचना नहीं है। यह एक अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय मूल्यांकन है, जिसे येल विश्वविद्यालय के Center for Environmental Law & Policy और उसके सहयोगी संस्थानों ने तैयार किया है। EPI 2026 में 47 संकेतकों को 12 पर्यावरणीय श्रेणियों में रखकर तीन व्यापक क्षेत्रों—Environmental Health, Ecosystem Vitality और Climate Change—के आधार पर देशों का मूल्यांकन किया गया है। इसलिए 176वीं रैंक को केवल एक आंकड़ा मानकर आगे बढ़ जाना उचित नहीं होगा। यह वास्तव में एक सवाल है—

क्या भारत का आर्थिक विकास उतनी ही तेजी से पर्यावरणीय जिम्मेदारी में भी बदल रहा है?

 

*177 में 176—स्थिति कितनी गंभीर है?

EPI 2026 में भारत का स्कोर 22.46 है और वह दक्षिण एशिया में आठवें अर्थात अंतिम स्थान पर है।

दक्षिण एशिया में भूटान 52वें, श्रीलंका 94वें, नेपाल 128वें, अफगानिस्तान 135वें, पाकिस्तान 157वें, मालदीव 171वें और बांग्लादेश 175वें स्थान पर हैं। भारत 176वें स्थान पर है। यहां एक महत्वपूर्ण बात भी समझनी होगी—रैंकिंग में नीचे होना अपने आप में पूरी कहानी नहीं बताता। EPI का स्कोर अलग-अलग पर्यावरणीय क्षेत्रों के प्रदर्शन को मिलाकर बनाया जाता है। इसलिए हमें यह देखना होगा कि भारत किन क्षेत्रों में सबसे कमजोर है और कहां सुधार हो रहा है।

 

*वायु प्रदूषण—सबसे बड़ी चुनौती

भारत के लिए सबसे गंभीर संकेतकों में से एक Air Quality है। EPI 2026 में भारत Air Quality में 175वें स्थान पर है और उसका स्कोर केवल 7.89 है। भारत का Environmental Health रैंक 174 है। Sanitation & Drinking Water में भारत 141वें, Heavy Metals में 155वें और Waste Management में 141वें स्थान पर है। अर्थात समस्या केवल दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, पटना या किसी एक औद्योगिक शहर की नहीं है।

समस्या का स्वरूप राष्ट्रीय है।

हमारे शहरों में वाहन, निर्माण गतिविधियां, औद्योगिक उत्सर्जन, सड़क की धूल, कचरे का अनुचित प्रबंधन और कुछ क्षेत्रों में जैविक ईंधनों का उपयोग मिलकर वायु गुणवत्ता पर दबाव डालते हैं।

प्रश्न यह नहीं कि AQI आज 150 है या 350। प्रश्न यह है कि—

क्या हमारे नागरिकों को स्वच्छ हवा में सांस लेने का अधिकार वास्तव में मिल रहा है?

 

*पानी और स्वच्छता की चुनौती

जल जीवन का आधार है, लेकिन EPI के आंकड़े बताते हैं कि भारत अभी भी Sanitation & Drinking Water में 141वें स्थान पर है। Unsafe sanitation में भारत की रैंक 139 और Unsafe drinking water में 144 है।

यह आंकड़ा हमें केवल ग्रामीण क्षेत्रों की याद नहीं दिलाता। तेजी से बढ़ते शहरों में सीवेज, नालों, जलस्रोतों और भूजल का दबाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है। एक ओर हम नदियों के पुनर्जीवन की बात करते हैं, दूसरी ओर शहरों का untreated wastewater नदियों और जलाशयों में पहुंचता है। यदि नदी में पानी है लेकिन वह पीने योग्य नहीं है, तो हमने नदी बचाने का दावा तो किया, लेकिन नदी का स्वास्थ्य नहीं बचाया।

 

*कचरा—सिर्फ सफाई का नहीं, संसाधन का सवाल

Waste Management में भारत 141वें स्थान पर है और स्कोर 18.40 है। भारत में हर दिन बड़ी मात्रा में ठोस कचरा पैदा होता है। समस्या यह नहीं कि हमारे पास कचरा है; समस्या यह है कि हम उसे संसाधन में बदलने की व्यवस्था अभी पर्याप्त स्तर तक नहीं बना पाए हैं।

01. गीला कचरा खाद बन सकता है।

02. सूखा कचरा पुनर्चक्रित हो सकता है।

03. निर्माण एवं विध्वंस का मलबा दोबारा इस्तेमाल हो सकता है।

लेकिन जब सब कुछ एक साथ मिल जाता है तो कचरा केवल कचरा रह जाता है।

इसलिए कचरा प्रबंधन का वास्तविक समाधान कूड़ेदान से नहीं, व्यवहार परिवर्तन से शुरू होगा।

 

*जैव-विविधता: विकास की सबसे अदृश्य कीमत

EPI 2026 में भारत की Biodiversity & Habitat रैंक 174 है और स्कोर 9.09 है।

 

*Terrestrial Biome Protection में भारत 176वें स्थान पर है तथा Protected Area Representativeness Index में भी 176वें स्थान पर है। यह आंकड़ा अत्यंत गंभीर है। क्योंकि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं।

01. जंगल जलचक्र हैं।

02. जंगल मिट्टी हैं।

03. जंगल जैव-विविधता हैं।

04. जंगल तापमान नियंत्रित करते हैं।

05. जंगल नदियों और भूजल को सहारा देते हैं।

06. और अंततः जंगल मानव जीवन की सुरक्षा प्रणाली हैं।

जब हम किसी जंगल को केवल लकड़ी, भूमि या परियोजना क्षेत्र के रूप में देखते हैं, तब हम उसके वास्तविक पारिस्थितिक मूल्य को नजरअंदाज कर देते हैं।

लेकिन क्या पूरी तस्वीर निराशाजनक है?

नहीं।

और यही बात इस रिपोर्ट को गंभीरता से समझने का सबसे महत्वपूर्ण कारण है।

भारत का EPI स्कोर पिछले दस वर्षों में 7.47 अंक सुधरा है।

 

*Climate Change Mitigation में भारत 130वें स्थान पर है और उसका स्कोर 28.01 है। इस क्षेत्र में पिछले दस वर्षों में भारत के प्रदर्शन में 13.98 अंकों का सुधार हुआ है। इसका अर्थ है कि सुधार संभव है। लेकिन सवाल है—

क्या सुधार की गति पर्याप्त है?

 

*आर्थिक विकास और पर्यावरण—दो विरोधी लक्ष्य नहीं

अक्सर पर्यावरण संरक्षण और विकास को आमने-सामने खड़ा कर दिया जाता है। यह सोच बदलने की जरूरत है।

01. सड़क चाहिए—लेकिन ऐसी योजना के साथ जिसमें प्राकृतिक जलनिकासी नष्ट न हो।

01. शहर चाहिए—लेकिन ऐसे शहर जिनमें पेड़, खुले क्षेत्र और जलस्रोत भी सुरक्षित रहें।

03. उद्योग चाहिए—लेकिन प्रदूषण नियंत्रण के साथ।

04. ऊर्जा चाहिए—लेकिन स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी लगातार बढ़ती रहे।

05. कृषि चाहिए—लेकिन मिट्टी, भूजल और जैव-विविधता की कीमत पर नहीं।

अर्थात सवाल विकास बनाम पर्यावरण का नहीं होना चाहिए। सवाल होना चाहिए—

“पर्यावरण के साथ विकास कैसे हो?”

 

*भारत के सामने अब अगला लक्ष्य क्या होना चाहिए?

भारत को केवल EPI रैंक सुधारने के लिए काम नहीं करना चाहिए। उसे उन वास्तविक समस्याओं पर काम करना चाहिए जो इस रैंकिंग के पीछे हैं।

1. स्वच्छ हवा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए

शहरों के साथ-साथ छोटे नगरों और औद्योगिक क्षेत्रों में भी प्रदूषण के स्रोतों की पहचान और नियंत्रण हो।

2. नदी नहीं, पूरा जलचक्र बचाया जाए

नदियों के साथ wetlands, तालाब, जलग्रहण क्षेत्र और भूजल recharge को भी संरक्षण नीति का हिस्सा बनाया जाए।

3. कचरे को अर्थव्यवस्था में बदला जाए

Source segregation, composting, recycling और circular economy को केवल सरकारी योजना नहीं बल्कि नागरिक व्यवहार बनाया जाए।

4. जैव-विविधता को विकास की लागत में शामिल किया जाए

किसी परियोजना की आर्थिक कीमत तय करते समय जंगल, जलस्रोत, जैव-विविधता और ecosystem services की कीमत भी समझी जानी चाहिए।

5. पर्यावरणीय शिक्षा को व्यवहार से जोड़ा जाए

बच्चों को केवल “पेड़ लगाओ” कहना पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह समझाना होगा कि पेड़ क्यों बचाना है, पानी क्यों बचाना है, कचरा क्यों अलग करना है और सार्वजनिक संसाधन वास्तव में किसके हैं। सबसे बड़ा परिवर्तन कानून में नहीं, व्यवहार में होगा भारत में पर्यावरण संबंधी कानूनों और योजनाओं की कमी नहीं है।

चुनौती है—नीति से जमीन तक पहुंचने की।

 

एक नागरिक सड़क पर कचरा नहीं फेंकता, पानी व्यर्थ नहीं बहाता, पेड़ को केवल अपनी संपत्ति नहीं बल्कि सामुदायिक संपदा समझता है और प्रदूषण को “किसी और की समस्या” नहीं मानता—तो यही वास्तविक पर्यावरणीय परिवर्तन है।

यही कारण है कि पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारी विभागों का काम मानना गलत है। सरकार नीति बना सकती है, प्रशासन लागू कर सकता है, उद्योग तकनीक अपना सकते हैं—लेकिन पर्यावरणीय संस्कृति समाज ही बना सकता है। 176वीं रैंक को अवसर में बदलना होगा

EPI 2026 भारत को आईना दिखाता है। आईने को दोष देने से चेहरा नहीं बदलता।

 

भारत के सामने आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का अवसर है। इसी के साथ दुनिया के सामने यह उदाहरण प्रस्तुत करने का अवसर भी है कि आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।

01. भारत के पास विशाल युवा आबादी है।

02. तकनीकी क्षमता है।

03. सौर ऊर्जा की क्षमता है।

04. विशाल जैव-विविधता है।

05. नदियां हैं।

06. वन हैं।

07. समुद्र तट हैं।

और सबसे महत्वपूर्ण-

08. परिवर्तन करने की क्षमता रखने वाला समाज है।

जरूरत केवल दिशा और प्राथमिकता की है। 176वीं रैंक हमारी नियति नहीं है।

यह एक चेतावनी है। और चेतावनी का सबसे अच्छा उत्तर बचाव नहीं, सुधार होता है।

आज आवश्यकता ऐसी विकास नीति की है जिसमें GDP बढ़े तो साथ में हरित क्षेत्र भी बढ़े; उद्योग बढ़ें तो प्रदूषण घटे; शहर बढ़ें तो जलस्रोत सुरक्षित हों; सड़कें बढ़ें तो पेड़ और प्राकृतिक जलधाराएं नष्ट न हों; और अर्थव्यवस्था बढ़े तो नागरिकों का स्वास्थ्य भी बेहतर हो। अंततः विकास का वास्तविक पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि हमने कितना बनाया।

यह भी होना चाहिए कि—

हमने आने वाली पीढ़ियों के लिए कितना बचाया।

भारत की सभ्यता ने सदियों पहले प्रकृति को पूजनीय माना था। आधुनिक भारत के सामने चुनौती उस परंपरा को केवल पूजा तक सीमित रखने की नहीं, बल्कि उसे नीति, अर्थव्यवस्था और नागरिक व्यवहार में उतारने की है।

क्योंकि सत्य सरल है—

“प्रकृति से मानव है, न कि मानव से प्रकृति।”

और यदि यह सत्य हमारी नीतियों और व्यवहार का आधार बन जाए, तो आज का 176वां स्थान कल भारत की पर्यावरणीय पुनर्जागरण यात्रा की शुरुआत भी बन सकता है।

आओ विकास की नई परिभाषा परिभाषित करें ” विकास ऐसा हो जहां मानव के साथ साथ जीव और प्रकृति भी विकास करें” इसलिए आओ प्रकृति की ओर लौटें।

( लेखक ख्यात सामाजिक कार्यकर्ता व एस्रो के निदेशक हैं।)

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