*पारंपरिक मीडिया बनाम डिजिटल मीडिया (यूट्यूब एवं वेब पोर्टल): बदलाव, चुनौतियां और अस्तित्व की लड़ाई*
*युटयुबर्स एवं वेब न्यूज़ पोर्टल के द्वारा त्वरित लाइफ अथवा बुलेटिन न्यूज़ प्रसारण करने से घबराएं अपने को पारंपरिक मीडिया कहने वाले संस्थान:*
भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी के संस्थापक ए.के. बिंदुसार की कलम से….
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज दौरे के दौरान अपने साथियों से मुलाकात के बाद एके बिंदुसार ने वर्तमान चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज के समय में भारतीय पत्रकारिता एक ऐतिहासिक दौर से गुजर रही है। अपने को कहने वाली पारंपरिक मीडिया यानी बड़े प्रिंट मीडिया (अखबार) और स्थापित टीवी न्यूज व सैटेलाइट चैनलों के प्रभुत्व को आज स्वतंत्र यूट्यूबर्स और डिजिटल वेब न्यूज़ पोर्टल्स से कड़ी चुनौती मिल रही है। इस बदलाव ने मीडिया जगत में एक बड़ी बहस छेड़ दी है कि क्या बड़े मीडिया घरानों की घबराहट और यूट्यूबर्स को “फर्जी” करार देने का अभियान उनकी घटती कमाई और नियंत्रण खोने का डर है?
1. पारंपरिक मीडिया की घबराहट और कमाई का संकट: क्या सचमुच वर्चस्व खतरे में है?
एके बिंदुसार का कहना है कि इसमें कोई दो राय नहीं है कि बड़े मीडिया घरानों और कॉरपोरेट नियंत्रित चैनलों के मन में डिजिटल और स्वतंत्र पत्रकारों को लेकर एक असहजता और बौखलाहट साफ दिखाई देती है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
विज्ञापनों (विज्ञापन राजस्व) का डिजिटल की ओर रुख: एक दौर था जब विज्ञापनों का पूरा बजट बड़े अखबारों और सैटेलाइट चैनलों की झोली में जाता था। आज सरकारी और निजी विज्ञापनदाता सोशल मीडिया, यूट्यूब और डिजिटल पोर्टल्स की पहुंच और प्रभाव को देखते हुए अपना रुख बदल चुके हैं। पाठकों और दर्शकों की संख्या घटने से पारंपपरिक मीडिया की कमाई में भारी गिरावट आई है।
एकाधिकार का टूटना: दशकों तक सूचना के प्रवाह (Information Flow) पर चंद बड़े घरानों का नियंत्रण था। वे जो दिखाते या छापते थे, जनता वही सच मानने को विवश थी। यूट्यूब और वेब पोर्टल्स ने इस एकाधिकार को समाप्त कर दिया है, जिससे पारंपरिक मीडिया अपनी खोती हुई बादशाहत को लेकर चिंतित है।
बदनाम करने की सोची-समझी रणनीति: जब बड़े संस्थान अपने तर्कों और धरातल की रिपोर्टिंग के जरिए डिजिटल पत्रकारों का मुकाबला नहीं कर पाते, तब वे एक प्रोपेगंडा के तहत सभी स्वतंत्र यूट्यूबर्स और वेब पोर्टल संचालकों को “फर्जी”, “येलो जर्नलिस्ट” या “ब्लैकमेलर” कहकर बदनाम करने का षड्यंत्र रचते हैं, ताकि जनता का उन पर से भरोसा उठाया जा सके।
2. त्वरित, सटीक और धरातल की खबरें: वेब मीडिया की सबसे बड़ी ताकत
पारंपरिक मीडिया और डिजिटल मीडिया के बीच सबसे बड़ा फर्क समय (Speed) और ज़मीनी हकीकत (Ground Reality) का है:
खबरों की देरी बनाम तत्परता: बड़े अखबारों में छपने वाली खबर को पाठकों तक पहुंचने में 24 घंटे का समय लगता है, और टीवी चैनलों पर भी कई बार संपादकीय मजबूरी, विज्ञापनों के दबाव या राजनीतिक संकोच के कारण खबरें दबा दी जाती हैं। इसके विपरीत, एक एक्टिव यूट्यूबर या वेब पोर्टल का पत्रकार घटना स्थल पर तुरंत पहुंचकर लाइव या तुरंत बुलेटिन के जरिए सटीक जानकारी समाज के सामने रख देता है।
आम जनमानस से सीधा जुड़ाव: डिजिटल मीडिया ने आम आदमी, किसानों, युवाओं और वंचितों की आवाज़ को सीधे मंच दिया है। स्थानीय स्तर की वे समस्याएं, जिन्हें बड़े अखबार अपनी ‘प्रॉफिटेबल न्यूज’ नीति के तहत जगह नहीं देते, उन्हें यूट्यूबर्स प्रमुखता से उठाते हैं।
यह समय बदलाव का है। तकनीक ने पत्रकारिता के मायने बदल दिए हैं। कुछेक तत्वों के गलत आचरण के आधार पर पूरे डिजिटल मीडिया जगत को खारिज करना अन्यायपूर्ण है। पारंपरिक मीडिया घरानों को चाहिए कि वे डरने या दुष्प्रचार करने के बजाय स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का स्वागत करें और अपनी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाएं। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को मजबूत करने के लिए कार्य करना है न कि एक दूसरे के प्रति आंदोलन करने के लिए मजबूर करना है बल्कि मुख्यधारा के मीडिया और डिजिटल मीडिया दोनों का स्वस्थ सह-अस्तित्व बेहद जरूरी हैं।









