फर्जी मुकदमों के जाल से मुक्ति: भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी की नार्को टेस्ट की पुरजोर मांग

*फर्जी मुकदमों के जाल से मुक्ति: भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी की नार्को टेस्ट की पुरजोर मांग*

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नई दिल्ली/देशव्यापी: वर्तमान समय में आपराधिक न्याय प्रणाली के समक्ष एक गंभीर चुनौती उभरकर सामने आई है। कई निर्दोष और सीधे-साधे लोग आपसी रंजिश या द्वेषपूर्ण भावना के कारण फर्जी मुकदमों में फंसाए जा रहे हैं। इस भयावह स्थिति को देखते हुए भारतीय मीडिया फाउंडेशन (नेशनल कोर कमेटी) ने अत्यंत चिंता व्यक्त की है।

यूनियन की केंद्रीय मैनेजमेंट अफेयर्स कमेटी के केंद्रीय अध्यक्ष श्री रविकांत साहू एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित बालकृष्ण तिवारी ने संयुक्त रूप से केंद्र और राज्य सरकारों के समक्ष एक अत्यंत महत्वपूर्ण मांग रखी है। संगठन का स्पष्ट मत है कि न्याय की पवित्रता बनाए रखने के लिए अब जांच प्रक्रिया में ‘नार्को टेस्ट’ (Narco Analysis Test) को अनिवार्य किया जाना चाहिए।

संगठन का रुख और चिंता के कारण

भारतीय मीडिया फाउंडेशन का मानना है कि आज कानून का दुरुपयोग कर भोले-भाले नागरिकों को अपराधी साबित करने का एक सुनियोजित चक्र चल रहा है। संगठन के शीर्ष नेतृत्व का कहना है कि:

दुरुपयोग: कई बार गलत इरादों से प्रेरित होकर, विशेषकर महिला उत्पीड़न और रेप जैसे गंभीर कानूनों का सहारा लेकर झूठी एफआईआर (FIR) दर्ज कराई जा रही हैं।

पुलिस की कार्यशैली: पुलिस विभाग में ‘गुड वर्क’ दिखाने की होड़ में अक्सर सही और गलत की जांच किए बिना आनन-फानन में मुकदमे दर्ज कर दिए जाते हैं, जिससे निर्दोषों का जीवन और सामाजिक प्रतिष्ठा बर्बाद हो जाती है।

अनिवार्यता: इस भयावह स्थिति से बचने के लिए संगठन ने मांग की है कि वादी (शिकायतकर्ता), प्रतिवादी (अभियुक्त) और मामले की जांच करने वाले पुलिस अधिकारी, तीनों का नार्को टेस्ट अनिवार्य किया जाना चाहिए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।

नार्को टेस्ट: विधिक प्रावधान और प्रक्रिया

नार्को एनालिसिस टेस्ट एक वैज्ञानिक जांच प्रक्रिया है। कानूनी रूप से इसके प्रयोग को लेकर भारतीय न्यायपालिका ने स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए हैं।

1. कानूनी प्रावधान

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 20(3) किसी भी व्यक्ति को स्वयं के विरुद्ध गवाही देने के लिए बाध्य करने से रोकता है (Self-incrimination)। अतः, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य (2010) मामले में स्पष्ट किया है कि:

किसी भी व्यक्ति पर उसकी सहमति के बिना नार्को टेस्ट नहीं किया जा सकता।

यह टेस्ट केवल सक्षम मजिस्ट्रेट की अनुमति और अभियुक्त की व्यक्तिगत सहमति के बाद ही किया जा सकता है।

2. राष्ट्रहित में नार्को टेस्ट का महत्व

यदि फर्जी मुकदमों के संदर्भ में इसका दायरा बढ़ाया जाता है, तो इसके राष्ट्रहित में निम्नलिखित परिणाम होंगे:

सत्य की विजय: फर्जी शिकायतों को प्रारंभिक चरण में ही वैज्ञानिक आधार पर खारिज किया जा सकेगा।

पुलिस जवाबदेही: जांचकर्ता अधिकारी पर नार्को टेस्ट का प्रावधान होने से पुलिस की निष्पक्षता बढ़ेगी और वे साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करने से बचेंगे।

न्यायिक समय की बचत: कोर्ट में वर्षों तक चलने वाले झूठे मुकदमों में कमी आएगी, जिससे न्यायपालिका का बहुमूल्य समय बचेगा।

सामाजिक शांति: निर्दोष लोगों को प्रताड़ना से मुक्ति मिलेगी, जिससे समाज में कानून और व्यवस्था के प्रति विश्वास बहाल होगा।

 

यूनियन के संस्थापक एके बिंदुसार ने कहा कि भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी के द्वारा उठाई गई यह मांग आधुनिक समय की आवश्यकता है। कानून का उद्देश्य निर्दोष को बचाना और अपराधी को सजा दिलाना है। यदि तकनीकी और वैज्ञानिक जांच (नार्को टेस्ट) से न्याय सुलभ होता है, तो सरकारों को इस दिशा में कड़े कानून बनाने पर विचार करना चाहिए। यह कदम न केवल झूठे मुकदमों के ‘उद्योग’ को समाप्त करेगा, बल्कि देश में एक निष्पक्ष और पारदर्शी न्याय प्रणाली की नींव रखेगा।

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