सलीम शेरवानी को राज्यसभा से दूर रखना समाजवादी पार्टी की मुस्लिम विरोधी राजनीति का नंगा सच।
भारतीय राजनीति में कुछ सच्चाइयां इतनी कड़वी होती हैं कि उन्हें बार-बार दोहराना जरूरी हो जाता है। समाजवादी पार्टी और मुसलमानों का रिश्ता भी ऐसी ही एक कड़वी सच्चाई है। दशकों से सपा मुस्लिम वोटों की बैसाखी पर खड़ी है, हर चुनाव में “मुसलमानों के हमदर्द” होने का दावा करती है, लेकिन जब हक और हिस्सेदारी देने की बारी आती है, तो वही पार्टी सबसे पहले मुस्लिम नेतृत्व का गला घोंटती है। सलीम शेरवानी को राज्यसभा न भेजा जाना इसका जीता-जागता सबूत है।
सलीम शेरवानी कोई साधारण कार्यकर्ता नहीं हैं। वह पांच बार लोकसभा सांसद रहे, केंद्र सरकार में मंत्री रहे, विदेश नीति और राष्ट्रीय मुद्दों के जानकार हैं। उनकी छवि बेदाग है, उनकी धर्मनिरपेक्ष सोच पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। उन्होंने अपना पूरा राजनीतिक जीवन सेक्युलर राजनीति को दिया। ऐसे नेता को राज्यसभा भेजना किसी पार्टी के लिए गर्व की बात होती, लेकिन सपा ने उन्हें ठुकरा दिया। क्यों? क्योंकि सपा को मजबूत मुस्लिम नेता नहीं चाहिए, उसे सिर्फ कमजोर और इशारों पर चलने वाले चेहरे चाहिए।
यह फैसला अकेला नहीं है, यह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।
पहले आजम खान को देख लीजिए। जिस नेता ने रामपुर में सपा को खड़ा किया, जिसने पार्टी को मुसलमानों में पहचान दिलाई, संकट के समय पार्टी ने उसे अकेला छोड़ दिया। फिर टिकटों की सूची उठाकर देख लीजिए। जिन सीटों पर मुस्लिम आबादी 30-40 प्रतिशत है, वहां भी मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या लगातार घटाई जा रही है। संगठन में बड़े पदों पर मुसलमानों को जगह नहीं दी जाती। राज्यसभा, विधान परिषद जैसे सदनों में भेजने के समय मुस्लिम नाम सबसे आखिर में याद आते हैं, और वह भी सिर्फ दिखावे के लिए।
सपा की यह नीति स्पष्ट संदेश देती है: “तुम्हारा वोट हमारा है, लेकिन सत्ता में तुम्हारी हिस्सेदारी नहीं होगी।” यह मुस्लिम समाज के राजनीतिक आत्मसम्मान पर सीधा हमला है।
सवाल यह है कि आखिर मुसलमान कब तक इस धोखे को सहेंगे? कब तक वे उन पार्टियों के झंडे उठाते रहेंगे जो उनके बच्चों के भविष्य की बात तो करती हैं, लेकिन उनके नेताओं को आगे बढ़ने नहीं देतीं? सलीम शेरवानी का अपमान सिर्फ एक व्यक्ति का अपमान नहीं है, यह उस पूरी कौम का अपमान है जिसने हर मुश्किल वक्त में सपा का साथ दिया।
लोकतंत्र में वोट की ताकत सबसे बड़ी ताकत होती है। अगर मुस्लिम समाज अपने वोट की ताकत को समझ ले और उन दलों से हिसाब मांगना शुरू कर दे जो सिर्फ उनके नाम पर राजनीति करते हैं, तो तस्वीर बदल सकती है। अब चापलूसी नहीं, हिस्सेदारी चाहिए। अब वादे नहीं, नेतृत्व में भागीदारी चाहिए।















