रिपोर्ट: एके बिन्दुसार (प्रधान संपादक)
- भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी ने की थी मामले की पड़ताल, अब आरटीआई से होगा भू-माफियाओं का पर्दाफाश।
मिर्जापुर / चुनार। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जनपद में सरकारी जमीनों पर भू-माफियाओं के कब्जे का एक बहुत बड़ा और सनसनीखेज मामला सामने आया है। मामला इतना गंभीर है कि इसमें तहसील प्रशासन के अधिकारियों की मिलीभगत और माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद के आदेश की खुली अवहेलना का आरोप लग रहा है।
भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी की टीम सन 2024 से इस पूरे मामले की गहन पड़ताल कर रही थी। पड़ताल के बाद जो तथ्य सामने आए हैं, उन्होंने पूरे प्रशासनिक तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ग्राम पौनी, पोस्ट भुडकुडा, परगना भगवत, तहसील चुनार, जनपद मिर्जापुर की आराजी नंबर 212 और 373 की जमीन आज चर्चा का विषय बनी हुई है। माल कागजात और राजस्व रिकॉर्ड में यह जमीन 7 जुलाई 1987 से पहले तक बंजर खाते की भूमि के रूप में दर्ज थी। यानि यह सरकारी जमीन थी, जो ग्राम सभा की संपत्ति थी।
लेकिन आरोप है कि 7 जुलाई 1987 को भू-माफियाओं ने तहसील प्रशासन के कुछ भ्रष्ट कर्मचारियों से सांठगांठ करके फर्जी तरीके से इस बंजर भूमि को अपने नाम करा लिया। इस फर्जीवाड़े की जानकारी वर्षों तक किसी को नहीं लगी। ग्राम सभा और ग्रामीणों को इस बात की भनक तक नहीं लगी कि उनकी सरकारी जमीन पर कागजों में किसी और का नाम चढ़ा दिया गया है।
इस फर्जीवाड़े का खुलासा तब हुआ जब ग्राम सभा ने गांव के विकास के लिए इस बंजर भूमि से होकर एक पिच रोड बनाने का प्रस्ताव पास किया।
नियमानुसार प्रस्ताव पास होने के बाद शासन से पिच रोड के निर्माण के लिए पैसा भी आ गया। टेंडर हुआ और ठेकेदार ने अपना काम भी शुरू कर दिया। गांव के लोग खुश थे कि अब उन्हें एक अच्छी सड़क मिलेगी।
लेकिन तभी अचानक भू-माफिया मौके पर पहुंच गए और उन्होंने इस सरकारी काम को रुकवा दिया। उन्होंने दावा किया कि यह जमीन उनकी है और उनके पास पट्टा है। पिच रोड का काम बंद हो गया। ग्रामीण हैरान रह गए कि जो जमीन वर्षों से बंजर के रूप में पड़ी है, वह अचानक निजी कैसे हो गई।
ग्रामीणों ने इस मामले की शिकायत भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी की टीम से की। शिकायत मिलते ही टीम ने इस मामले को गंभीरता से लिया और सन 2024 से इसकी जमीनी पड़ताल शुरू कर दी।
टीम ने जब मिर्जापुर जनपद के अभिलेखागार और तहसील चुनार के रिकॉर्ड खंगाले तो एक और बड़ा खुलासा हुआ। जिस मुकदमे नंबर और आदेश के आधार पर यह जमीन निजी व्यक्तियों के नाम दर्ज की गई थी, उसकी कोई भी मूल फाइल न तो जिला अभिलेखागार में उपलब्ध है और न ही तहसील चुनार में। इससे यह साफ हो गया कि यह पूरा मामला फर्जी दस्तावेजों के आधार पर किया गया है।
जब तहसील स्तर पर न्याय नहीं मिला तो सामाजिक कार्यकर्ता विजेंद्र बहादुर सिंह ने इस जनहित के मामले को लेकर माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद का दरवाजा खटखटाया। उनके द्वारा हाईकोर्ट में जनहित याचिका संख्या 83/2024 दाखिल की गई।
माननीय उच्च न्यायालय ने इस जनहित याचिका को गंभीरता से सुना और तहसील प्रशासन को एक बहुत ही स्पष्ट और कड़ा आदेश दिया।
न्यायालय ने आदेश दिया कि तहसील प्रशासन दोनों आराजी नंबर 212 और 373 की जांच ग्राम सभा के समक्ष करे। इसके लिए गांव के सभी लोगों को बुलाया जाए। खतौनी में किसका नाम किस प्रकार और किस आदेश से आया है, इसकी पूरी जांच की जाए। साथ ही सभी पट्टा धारकों की जमीन की मौके पर पत्थर गड्डी कर यह सुनिश्चित किया जाए कि किसकी जमीन कहां पर है और कौन फर्जी तरीके से खतौनी में अपना नाम दर्ज कराकर आया है।
यह आदेश न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम था। ग्रामीणों को उम्मीद थी कि अब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।
लेकिन प्रार्थी का आरोप है कि चुनार तहसील के तत्कालीन उप जिलाधिकारी राजेश कुमार वर्मा ने माननीय हाईकोर्ट के इस स्पष्ट आदेश का पालन नहीं किया। गांव में न तो कोई खुली बैठक बुलाई गई, न ही ग्रामीणों को बुलाया गया और न ही जमीन की पत्थर गड्डी कराई गई।
हाईकोर्ट के आदेश का पालन न होने से मजबूर होकर प्रार्थी ने कानून का सहारा लिया और सीजेएम मिर्जापुर के माध्यम से तत्कालीन उप जिलाधिकारी चुनार राजेश कुमार वर्मा और वर्तमान उप जिलाधिकारी अनेक सिंह के खिलाफ अवमानना का नोटिस जारी कराया।
इस अवमानना मामले में 23 अक्टूबर की तारीख नियत की गई थी। इस तारीख पर दोनों अधिकारियों को इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी पड़ी।
लेकिन यहां भी प्रार्थी का आरोप है कि दोनों अधिकारियों ने न्यायालय को गुमराह करने के लिए झूठा काउंटर एफिडेविट दाखिल किया। इस हलफनामे में उन्होंने बताया कि उक्त सभी भूमि पट्टा धारकों के नाम दर्ज है और भू-माफियाओं के पक्ष में सिविल कोर्ट से स्टे ऑर्डर है।
प्रार्थी का गंभीर सवाल है कि जब तहसील का मालिक जिलाधिकारी और उप जिलाधिकारी ही होता है और वही लोग न्यायालय में झूठा हलफनामा लगाएंगे तो एक गरीब आम जनता को न्याय कहां से मिलेगा। तहसील में बैठा अधिकारी अगर भू-माफियाओं को बचाने के लिए कोर्ट में गलत तथ्य पेश करेगा तो सरकारी जमीनों की लूट कैसे रुकेगी।
हालांकि माननीय न्यायालय ने अपने आदेश के अंतिम पैराग्राफ में प्रार्थी को यह अधिकार सुरक्षित रखा है कि आवश्यकता पड़ने पर वह अवमानना केस को दोबारा चालू कर सकता है।
प्रार्थी का कहना है कि यह सारी बातें हवा हवाई नहीं हैं। उनके पास माननीय उच्च न्यायालय के सभी आदेशों की प्रमाणित प्रतियां और अन्य सबूत सुरक्षित हैं।
अब इस लड़ाई को आगे बढ़ाते हुए भारतीय मीडिया फाउंडेशन की टीम ने निर्णय लिया है कि इस पूरे फर्जीवाड़े की परतें आरटीआई के माध्यम से खोली जाएंगी। आरटीआई से यह पता लगाया जाएगा कि 1987 में किस आदेश से, किस अधिकारी ने, इस बंजर जमीन को निजी हाथों में दिया था और उस समय की पूरी पत्रावली कहां गायब हो गई। बहुत जल्द इस मामले में शामिल भू-माफियाओं और अधिकारियों के नामों का खुलासा किया जाएगा।














