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भगवान सबके हैं, फिर दर्शन में VIP क्यों? रिपोर्ट नितिन तिवारी

*भगवान सबके हैं, फिर दर्शन में VIP क्यों?*

 

मंदिर के बाहर लगी लंबी कतार में खड़ा वह साधारण भक्त सिर्फ दर्शन का इंतजार नहीं कर रहा होता, वह अपने भगवान से मिलने की उम्मीद संजोए घंटों खड़ा रहता है। माथे पर पसीना, हाथ में प्रसाद, आंखों में श्रद्धा और दिल में एक अटूट विश्वास—“भगवान सबके हैं… मेरे भी और उस अमीर के भी।”

तभी अचानक सायरन बजता है। गाड़ियों का काफिला मंदिर के द्वार पर रुकता है। सुरक्षा कर्मी रास्ता बनाते हैं और कुछ ही क्षणों में VIP भक्त बिना कतार के भीतर पहुंच जाता है। बाहर खड़ा आम भक्त चुपचाप यह सब देखता रहता है। उसके चेहरे पर सवाल होता है और मन में एक टीस—क्या भगवान के दरबार तक पहुंचने का रास्ता भी अब हैसियत देखकर तय होगा?

भगवान के सामने न कोई धनवान है, न गरीब। न कोई VIP है, न आम। वहां तो केवल श्रद्धा मायने रखती है। फिर ऐसी व्यवस्था क्यों, जिसमें किसी की जेब उसे भगवान के और करीब कर दे और किसी की गरीबी उसे घंटों इंतजार करने को मजबूर?

VIP संस्कृति केवल एक कतार नहीं तोड़ती, यह उस गरीब भक्त के विश्वास को भी चोट पहुंचाती है, जो अपने जीवन की तमाम परेशानियों के बीच भगवान के दरबार में बराबरी तलाशने आता है।

मंदिर वह स्थान होना चाहिए जहां इंसान अपनी हैसियत बाहर छोड़कर भीतर जाए।

क्योंकि भगवान के दरबार में अगर कोई सबसे बड़ा है, तो वह केवल भक्त की श्रद्धा है।

आखिर सवाल मंदिर की व्यवस्था से है, भगवान से नहीं—

जब भगवान सबके हैं, तो उनके दर्शन में VIP व्यवस्था क्यों?

 

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