*प्रेस क्लब व पत्रकार कॉलोनी पर चुप्पी क्यों ?*
*अधिकारों की अनदेखी में अहंकार या अनभिज्ञता अज्ञानता तो नहीं ?, जबाब सिर्फ एक एटा डीएम के समक्ष मौन क्यों ?*
-बबलू चक्रवर्ती
एटा। स्थानांतरण के बाद जनपद एटा का चार्ज ग्रहण करके कलेक्ट्रेट सभागार में पत्रकारों से रूबरू हुई जनपद की नवागत जिलाधिकारी एम. अरुन्मौली के समक्ष सिर्फ एक पत्रकार था जिसने पत्रकारों और उनके परिवारों के हित की बात की, बाकी कोई कूड़े के ढेर गिनवा रहा था, तो कोई वन विभाग की भूमि, कोई अतिक्रमण तो, कोई यातायात पुलिस की पोल खोल कर जाम की स्थिति पर चर्चा कर रहा था, नियम विरुद्ध OYO की नग्नता पर मर्यादाओं को भी तोड़ा गया, अबैध खनन जैसे तमाम विषयों मुद्दों पर खुलकर बोलने वाले अपने ही हक अधिकारों पर बोलने की हिम्मत नही जुटा सके । आखिर वो कैसे पत्रकार थे जो अपने ही उन साथियों को भूल गये जो आर्थिक तंगी से जूझते हुये किराए के मकानों में रहकर अपना व परिवार के जीवन का अमूल्य समय पवित्र पत्रकारिता को समर्पित कर चुके हैं या फिर वो जो प्रेस कार्य हेतु सर्दी गर्मी बारिश आंधी तूफान जैसे मौसम में भी अपने गाँव से कोसों दूर सुबह निकल कर देर सबेर पुनः वापस अपने घर पहुचंते हैं । विषय यही खत्म नही होता बल्कि सोचना तो उन्हें ये भी था कि उन्होंने मौन बन कर अब तक हासिल किया क्या ? क्योंकि सर्दी,गर्मी बारिश,आंधी तूफान जैसे वक्त उन्होंने खुद के ही बैठने बचने का तो स्थान हासिल किया नही ? अब क्या भरोसा करें कि वो सर्व समाज के अधिकारों की आबाज का बोझ उठाने में सक्षम होंगे ?
सबाल यह भी हैं कि इस तरह बंधुआ मजदूर बनके गुलामी की मानसिकता से पवित्र पत्रकारिता को किस दिशा में ले जाएंगे ?
*-बबलू चक्रवर्ती*
















