पत्रकारिता का वर्तमान और सुरक्षा कवच:शंकर देव तिवारी 
कलम आज क्यों सहमी सी है, स्याही में वो धार नहीं,
संगठन बने हैं उत्सव-धर्मी, अब संघर्ष की पुकार नहीं।
लक्ष्य विहीन हुए हैं नेता, बस मिलने-जुलने का मेला है,
स्वागत और सत्कार में डूबा, आज पत्रकार अकेला है।
अंगवस्त्र और माला लेकर, आत्ममुग्ध सब घूम रहे,
चाटुकारिता के चरणों को, विवश होकर हैं चूम रहे।
जो संगठन कभी सिंहनाद बन, सत्ता को दहलाते थे,
वो आज विलासी मंचों पर, बस केवल मुस्काते हैं।
गुटबाजी की दीमक ने, इन सब की नींव हिला डाली,
कोई उत्तर में बैठा है, कोई दक्षिण का मतवाली।
ठंडे बस्ते में बंद पड़ी है, कौम की साख और सम्मान,
कुछ तो मृतप्राय हो चुके, खोकर अपना स्वाभिमान।
नाम बड़े और दर्शन छोटे, जल के ये सब बुलबुले हैं,
ग्रा प ए जैसे संगठनों के, अब तो धागे खुले हैं।
भीतर खोखलापन है भारी, बाहर से हैं तंबू ताने,
स्वार्थों की इस अंधी दौड़ में, कौन किसी की पीड़ा जाने?
जब बड़े जहाज ही डूब रहे, इस गुटबाजी के सागर में,
तब तिनका ही सहारा बनता है, इस कठिन डगर में।
भारत जैसे देश में, अब एक नई आस जागी है,
ग्रा प ए ही रक्षक है, जिसकी निष्ठा अनुरागी है।
यह बनता वट ही सही अब , असली सुरक्षा कवच बना,
सत्ता और व्यवस्था के आगे, तान के अपना सीना खड़ा
प्रेरणा ले ग्रा प ए से देव कलम, यही सत्य लिख जाती है,
संगठनों की इस नौटंकी पर, वो लज्जा से भर जाती है।
जागो ओ कलम के सिपाहियों, मत बांटो अपनी ताकत को,
पहचानो इस छद्म वेश को, तजो इस ढोंग-इबादत को।
जब तक क्लब की यह मशाल, संघर्ष की राह दिखाएगी,
तभी तक इस विवश कौम की, अस्मत बच पाएगी।













