*निबंधन कार्यालयों में तालाबंदी: विरोध का संवैधानिक अधिकार या कानून का उल्लंघन?*
एटा- ई-रजिस्ट्री व्यवस्था के विरोध में यदि किसी स्थान पर अधिवक्ताओं अथवा अन्य व्यक्तियों द्वारा निबंधन/उपनिबंधक कार्यालयों में ताला लगाकर सरकारी कार्य को बाधित किया गया है, तो यह मामला मात्र विरोध-प्रदर्शन तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि कानून एवं प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा गंभीर विषय बन जाता है।
भारत का संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने और विरोध दर्ज कराने का अधिकार देता है, किंतु किसी भी व्यक्ति या संगठन को सरकारी कार्यालय पर कब्जा करने, प्रवेश रोकने, ताला लगाने अथवा लोक सेवाओं को बाधित करने का अधिकार प्रदान नहीं करता। यदि सरकारी कार्यालय में आने वाले नागरिकों को उनके वैधानिक कार्यों से वंचित किया जाता है, तो इससे न केवल आम जनता के अधिकार प्रभावित होते हैं, बल्कि शासन की वैधानिक कार्यप्रणाली भी बाधित होती है।
संपत्ति क्रय-विक्रय, वसीयत, पावर ऑफ अटॉर्नी तथा अन्य दस्तावेजों के पंजीकरण के लिए दूर-दराज से आने वाले नागरिकों को कार्यालय बंद मिलने पर आर्थिक, सामाजिक एवं समयगत हानि उठानी पड़ती है। कई मामलों में निर्धारित समय सीमा के भीतर पंजीकरण न होने से लेन-देन प्रभावित हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में तालाबंदी का सीधा दुष्प्रभाव आम जनता पर पड़ता है, जिसका विवाद से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता।
सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि अधिवक्ताओं को न्यायिक अथवा सार्वजनिक कार्यों को बाधित करने के उद्देश्य से हड़ताल या बहिष्कार करने का अधिकार प्राप्त नहीं है। न्यायालय ने कहा है कि न्यायिक व्यवस्था तथा सार्वजनिक सेवाओं का संचालन नागरिकों के अधिकारों से जुड़ा विषय है, जिसे किसी भी दबाव की रणनीति का माध्यम नहीं बनाया जा सकता।
यदि किसी स्थान पर सरकारी कार्यालय में ताला लगाया गया, कर्मचारियों को कार्य करने से रोका गया, नागरिकों के प्रवेश में बाधा डाली गई अथवा सरकारी कार्य ठप किया गया, तो ऐसे कृत्यों की जांच कर संबंधित व्यक्तियों की जिम्मेदारी निर्धारित करना प्रशासन का दायित्व है। कानून के शासन में किसी भी वर्ग, संगठन या पेशे को यह विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है कि वह स्वयं कानून हाथ में लेकर सरकारी सेवाओं को बंद करा दे।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति व्यक्त करने के अनेक वैधानिक माध्यम उपलब्ध हैं—ज्ञापन, धरना, प्रदर्शन, न्यायालयीन कार्यवाही तथा शासन से संवाद। किंतु सरकारी कार्यालयों की तालाबंदी, जनसेवाओं में व्यवधान और नागरिकों को उनके वैधानिक अधिकारों से वंचित करना लोकतांत्रिक विरोध की स्वीकार्य सीमा से परे माना जा सकता है।
*यदि तालाबंदी और कार्य अवरोध* के आरोप तथ्यात्मक रूप से सही पाए जाते हैं, तो यह केवल आंदोलन का विषय नहीं बल्कि कानून के शासन, नागरिक अधिकारों और सार्वजनिक प्रशासन की निष्पक्षता से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, परंतु किसी को भी जनता को बंधक बनाकर अपनी मांगें मनवाने का अधिकार नहीं है।
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