गिरती नैतिक दीवारें और कराहती व्यवस्था

आज का समय वह नहीं रहा, जहाँ इंसान अपने चरित्र और अक्स के दम पर सिर उठाकर जी सके। वर्तमान दौर ने यह कड़वा सवाल हर ईमानदार व्यक्ति के सामने ला खड़ा किया है कि ‘आप किसके हैं और कब तक हैं?’ यह संक्रमण काल सामाजिक और प्रशासनिक मूल्यों के बिखराव का सबसे त्रासद दौर है।
याद आता है वर्ष 1995 का वह कालखंड, जब नेता और अधिकारी के भीतर राष्ट्र के प्रति एक सामूहिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीयता की भावना दिखाई देती थी। आज वह भावना केवल नारों और विज्ञापनों में सिमट गई है। राष्ट्रनीति की जगह अब ‘मिशन’ और ‘निजी एजेंडों’ ने ले ली है। इस व्यवस्था में जो व्यक्ति जितना सीधा और ईमानदार है, उसे उतना ही विफल साबित करने की होड़ मची है। ईमानदारी आज सोशल मीडिया पर एक ‘नाकाम खबर’ बनकर वायरल हो रही है। कलम की आज़ादी को गिरवी रख दिया गया है, जिससे खबरों का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है और आम आदमी की शिकायतें दम तोड़ रही हैं। यह स्थिति आपातकाल के बाद के उस दौर की याद दिलाती है, जब व्यवस्था से भरोसा पूरी तरह उठ चुका था।
एक तरफ सरकार ने राम मंदिर और धारा 370 जैसे दशकों पुराने और जटिल मामलों को हल करके अपनी राजनीतिक दृढ़ता का परिचय दिया। लेकिन दूसरी तरफ, प्रशासनिक तंत्र के ‘तोतों’ ने आम जनता और सजग नागरिकों को ऐसे मुकदमों और साजिशों में फंसा रखा है, जो 95 के दौर के उत्पीड़न की याद दिलाते हैं। वर्तमान में यूजीसी (UGC) जैसे देश के भविष्य से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर एनडीए के घटक दलों और नीति-नियंताओं की चुप्पी बेहद चिंताजनक है। युवा और छात्र वर्ग आज सत्तर, नब्बे और २०१० के दशक जैसा गहरा असंतोष महसूस कर रहे हैं। यदि शिक्षा और रोज़गार जैसे बुनियादी मुद्दों पर उपेक्षा का यह रवैया जारी रहा, तो यह व्यवस्था के प्रति अविश्वास की अंतिम कील साबित हो सकता है। समय रहते इस प्रशासनिक सड़न को रोकना और सच की आवाज़ को आज़ाद करना बेहद ज़रूरी है।















