खत्म नहीं हो रहा वायु प्रदूषण का संकट — ज्ञानेन्द्र रावत
वायु प्रदूषण का संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। दुनिया में बढ़ती गर्मी और जंगलों में लग रही विनाशकारी आग की बेतहाशा बढ़ती घटनाओं से दुनिया की हवा जहरीली हो रही है। डब्ल्यूएमओ के वैज्ञानिक लोरेंगो लैब्रेडोर का कहना है कि जंगलों में लगी आग का जहरीला धुंआ दुनियाभर के शहरों की हवा को तेजी से बुरी तरह प्रदूषित कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र की मौसम एजेंसी डब्ल्यूएमओ की हालिया रिपोर्ट में इसका खुलासा किया गया है कि वायु प्रदूषण का संकट वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने और लोगों की सेहत सुधारने के अंतराष्ट्रीय प्रयासों पर पानी फेर रहा है। जलवायु परिवर्तन के चलते डब्ल्यूएमओ के वायु गुणवत्ता मानकों को पाना अब मुश्किल होता जा रहा है। भारत भी उस मार से अछूता नहीं रहा है। यहां पर भी पराली आदि जलाये जाने से पी एम 2.5 के स्तर में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। वैसे यह एक आम मिथक सा बन गया है कि अक्सर भारत में, जबकि यह समस्या विश्व व्यापी है, खासकर उत्तर भारत में वायु प्रदूषण के लिए पराली को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है जबकि वायु प्रदूषण में पराली का योगदान डीजल – पैट्रोल व कारखानों से निकलने वाले प्रदूषकों के मुकाबले काफी कम है जो वायु गुणवत्ता सम्बंधी समस्याओं को बढ़ाने में अहम भूमिका निबाहते हैं।
देखा जाए तो वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेवार 32 से 44 फीसदी प्रदूषक किन स्रोतों से आते हैं, उनकी पहचान अभीतक नहीं हो सकी है जिनसे वायु गुणवत्ता खराब होती है। इनसे निपटने का कोई प्रभावी उपाय भी अभीतक ईजाद नहीं हो सका है। जहां तक पराली का सवाल है, वायु प्रदूषण में उत्तर भारत के राज्यों खासकर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में पराली यानी फसलों के अवशेष जलाने का योगदान आमतौर पर 22 से 35 फीसदी तक रहता है। यह हवा की स्थिति और मौसम के आधार पर कभी-कभी बढ़ता-घटता रहता है। इस बारे में आईआईटी और टेरी के वैज्ञानिक अध्ययनों की मानें तो सर्दियों की शुरुआत में जब पंजाब और हरियाणा में पराली जलायी जाती है तब उत्तर-पश्चिम हवाओं के कारण यह धुंआ एनसीआर की हवा में पी एम 2.5 का स्तर काफी बढ़ा देता है लेकिन अभी तो सितम्बर का महीना भी खत्म नहीं हुआ है और मौसम के बदलाव और मानसून के कमजोर पड़ने के साथ ही पंजाब, उत्तर प्रदेश और हरियाणा से सटे कई राज्यों में पराली जलाये जाने का असर वायु गुणवत्ता पर साफ-साफ दिखाई देने लगा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के क्रीम्स यानी कंसोर्टियम फार रिसर्च आन एग्रो इकोसिस्टम मानीटरिंग एंड माडलिंग फ्राम स्पेस उपग्रह निगरानी की मानें तो आने वाले दिनों में पराली जलाने से निकलने वाला धुंआ हवा की दिशा और मौसम सम्बंधी परिस्थितिजन्य हालातों के चलते एनसीआर की हवा को और खराब हालात में पहुंचा देगी।
देश में राजधानी दिल्ली की वायु गुणवत्ता पर हर बार सवाल उठते रहे हैं। यहां वायु गुणवत्ता में सुधार हेतु बीते सालों में उठाये गये कई कदमों और कुछ नये प्रयोगों के बावजूद यहां की हवा नहीं सुधरी। हां उन प्रयासों से प्रदूषण के स्तर में कुछ मात्रा में ही सही, कमी तो आई। आज भी स्वच्छ वायु सर्वेक्षण रैंकिंग में दिल्ली 21 वें नम्बर पर है। उसे 200 में से 172 अंक हासिल हुये हैं और अभी भी दिल्ली देश में साफ हवा वाले शहरों की सूची में पहले दस स्थानों में भी शामिल नहीं है। यही नहीं दस लाख से ज्यादा आबादी वाले 48 शहरों की सूची में दिल्ली को 172 अंक दिये गये हैं। जबकि एनसीआर में गाजियाबाद और फरीदाबाद भी दिल्ली से ऊपर 184 और 179.1 स्थान यानी 9वें और 14वें स्थान पर हैं।
दिल्ली में स्वच्छ वायु सर्वेक्षण की रैंकिंग सबूत है कि हवा की गुणवत्ता की स्थिति उस स्तर तक नहीं पहुंची है जिसकी राजधानी दिल्ली को जरूरत है। इसके लिए प्रदूषण नियंत्रण हेतु उपलब्ध एनसीएपी यानी राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम की राशि के इस्तेमाल की धीमी रफ्तार, खर्च का सीमित दायरा और व्यवस्था की प्राथमिकताएं जिम्मेवार हैं। उदाहरण स्वरूप 2020-21 से 2025-26 के बीच दिल्ली को एनसीएपी के तहत करीब 113 करोड़ की राशि की मंजूर हुयी जिसमें 99.77 करोड़ की राशि आवंटित हुयी। इसमें से 23 दिसम्बर 2025 तक करीब 86.36 करोड़ की राशि जारी की गयी। लेकिन महज खर्च 14 करोड़ ही किये गये। यानी कुल राशि का 17 फीसदी ही इस्तेमाल किया गया। यही नहीं 2024-25 में उपलब्ध राशि के मुकाबिले केवल दो फीसदी खर्च और साल 2025-26 में इस मद में कोई भी खर्च नहीं किया गया। यह व्यवस्था की प्राथमिकता का जीता-जागता सबूत है। यदि सीपीसीबी के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2016 में प्रदूषण कण पी एम 10 का औसत स्तर 245.22 पर था जो साल 2026 में सुधर कर 177.48 आ गया।मानकों के मुताबिक पी एम 10 का औसत स्तर 60 पर रहना चाहिए। इसमें सबसे बड़ी समस्या सरकार का प्रदूषण के स्रोत घटाने के स्थान पर प्रदूषण दिखने के बाद धूल दबाने और तत्काल नियंत्रण वाले उपायों पर ज्यादा निर्भर रहना है। यही वजह है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण के प्रमुख न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव को कहना पड़ा कि स्वच्छ हवा केवल पर्यावरण से जुड़ी आकांक्षा नहीं है, बल्कि यह ऐसा व्यावहारिक लक्ष्य है जिसे ठोस प्रयास और जमीन पर प्रभावी अमल से ही हासिल किया जा सकता है।
अब इस बाबत दिल्ली सरकार की वायु प्रदूषण से निपटने हेतु उद्योग, निर्माण, सड़क से उठने वाली धूल, वाहनों के प्रदूषण, कचरे को जलाने से रोकने जैसे सात इलाकों पर फोकस करने, स्थानीय निवासियों व आरडब्ल्यूए के साथ मिलकर जागरूकता अभियान चलाने, हरियाणा सरकार की 14 जिलों के मुताबिक प्लान बनाने, हर जिले में नोडल अधिकारी की तैनाती, वहीं उत्तर प्रदेश की एनसीआर से सटे पांच थर्मल पावर सहित आठ जिलों में पराली जलाने से रोकने, सड़कों की मशीनों से सफाई व मरम्मत कराने, पुराने वाहनों से होने वाले प्रदूषण पर लगाम लगाने के साथ इलैक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दिये जाने, उद्योगों में आनलाइन सतत उत्सर्जन निगरानी प्रणाली लगाये जाने और वायु प्रदूषण नियंत्रण उपकरण लगाये जाने की योजना है जिस पर तीनों राज्यों के मुख्य मंत्रियों के साथ केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री के साथ बैठकों में सहमति बनी है। अब देखना यह है कि इन योजनाओं पर अमल कबतक हो पाता है या इनका क्रियान्वयन भी पुराने ढर्रे पर ही होगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है।
अब तो उत्तरी भारत के मुकाबले साफ माने जाने वाले देश के दक्षिणी राज्यों के प्रमुख शहर चेन्नई और बंगलुरू में भी वायु गुणवत्ता बिगड़ने के संकेतों के पीछे मौसम को जिम्मेदार बताया जा रहा है। देश के दिल्ली, मुंबई, बंगलुरू, पटना, कोलकाता और चेन्नई जैसे प्रमुख शहरों के विश्लेषण से खुलासा हुआ है कि वायु प्रदूषण को केवल उत्सर्जन की समस्या मानना अधूरा दृष्टिकोण है। उत्सर्जन और मौसम के बीच की परस्पर क्रिया ही वायु गुणवत्ता को नियंत्रित करती है। इसलिए विभिन्न मौसमों को दृष्टिगत रखते हुए अलग – अलग लक्ष्यों का निर्धारण और मौसम आधारित कार्रवाई तंत्र विकसित करना बेहद जरूरी हो गया है।
असलियत में देश में अब वायु प्रदूषण सालभर जारी रहने वाला गंभीर स्वास्थ्य खतरा बन चुका है। पता नहीं सरकारें इस पर गंभीर क्यों नहीं हैं। जबकि हालात इस बात के सबूत हैं कि वायु प्रदूषण का असर अब हृदय, फेफडो़ं, सांस, त्वचा, दमा, पाचन तंत्र, मस्तिष्क, हड्डियों, श्वसन व प्रजनन तंत्र से जुड़े रोगों से भी काफी आगे बढ़ कर शरीर के हरेक अंग को प्रभावित कर रहा है। इससे कैंसर, मैटाबोलिक विकार और डिमेंशिया का खतरा बढ़ गया है। यह मानसिक विकार, बच्चों की बुद्धिमत्ता, याददाश्त, एकाग्रता और उनके सीखने की क्षमता पर ही नहीं, उच्च वायु प्रदूषण और गंदी हवा में रहने वाले बच्चों के आई क्यू में मौजूद प्रदूषक तत्व बच्चों के शैक्षणिक प्रदर्शन, उनकी सोचने-समझने की क्षमता और व्यवहार पर भी बुरा असर डाल रहे हैं। यह स्थिति अवसाद और चिंता के जोखिम को बढ़ा देती है। यह अब कम उम्र में आंखों की रोशनी छीन रहा है। यातायात सम्बंधी प्रदूषण इन समस्याओं को बढ़ाने में अहम भूमिका निबाह रहा है। सूक्ष्म पी एम कण शरीर के माध्यम से सीधे मस्तिष्क में पहुंच दिमाग में आक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन पैदा कर रहे हैं। दुखदायी स्थिति यह है कि 15 साल से कम उम्र के 2.02 करोड़ बच्चे इसके शिकार हैं। वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से आत्महत्या व आत्मघाती विचारों का खतरा बढ़ जाता है। ब्रिटेन की क्वींस यूनिवर्सिटी बेलफास्ट के शोध में यह खुलासा हुआ है।
हकीकत है कि वायु प्रदूषण से हर साल तकरीबन बीस लाख से ज्यादा लोगों की मौत होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आज 93 फीसदी बच्चे प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। भारत में सभी श्वसन संबंधी मौतों में एक तिहाई से अधिक वायु गुणवत्ता से जुड़ी हैं। वायु प्रदूषण से जुड़ी होने वाली ज्यादातर स्वास्थ्य समस्यायें एयरोसोल से जुड़ी होती हैं जिसके कण मानव आंखों को मुश्किल से दिखाई देते हैं जो जलवायु, मौसम और शरीर में विषाक्तता सम्बंधी प्रतिक्रियाओं को जन्म देते हैं। इसके लम्बे समय तक संपर्क में रहने से फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। अत्याधिक सांद्रता के कारण श्वसन तंत्र अवरुद्ध होने से मृत्यु तक हो सकती है। इसके प्रभाव से जानवर और पौधे भी अछूते नहीं रह सके हैं। इसके अलावा स्ट्रोक से होने वाली लगभग 40 फीसदी मौतों के लिए वायु प्रदूषण जिम्मेदार है। इस बाबत सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत व न्यायमूर्ति जायमाल्या बागची की आला पीठ ने सही ही कहा है कि वायु प्रदूषण अब एक गंभीर समस्या का रूप ले चुका है। अब इसका फौरी निदान के बजाय दीर्घ- कालिक उपाय ढूंढना जरूरी हो गया है।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।)















