*कहानी लेखन वर्कशॉप–दूसरा दिन
**’संवेदना व प्रेम से बनती है अच्छी कहानी’
*प्रशिक्षुओं ने किए कहानी लेखन के अभ्यास
आगरा। “कहानी में विचार सुगंध की तरह रचा बसा होता है। विचार व विचारधारा कहानी का अभिन्न अंग भले ही हों लेकिन संवेदना व प्रेम के बिना अच्छी कहानी नहीं लिखी जा सकती।”यह कहना है वरिष्ठ कथाकार महेश कटारे (ग्वालियर) का। वह आज यहाँ कहानी लेखन वर्कशॉप के दूसरे दिन प्रशिक्षुओं को संबोधित कर रहे थे।
वर्कशॉप का आयोजन कहानी पत्रिका ‘कथादेश’,सांस्कृतिक संस्था ‘रंगलीला’ और सामाजिक संगठन ‘शीरोज हैंगआउट’ ने किया है।
श्री कटारे ने कहा कि सत और असत के बीच भेद करने का जो औजार है वही विचारों का आधार बनता है और वही तय करता है कि कहानी की दिशा व दशा क्या होगी। वर्कशॉप में प्रशिक्षुओं से संवाद करते हुए वरिष्ठ कहानीकार सत्यनारायण(जोधपुर) ने कहा कि समय का यथार्थ कहानी से मुठभेड़ करता है। आज के कहानीकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती बाहर व भीतर की यही मुठभेड़ है और समय के यथार्थ को पकड़ना ही लेखक के समक्ष सबसे बड़ा सवाल है।
वरिष्ठ कहानी आलोचक जयप्रकाश (राजनांदगांव) ने कहा कि आधुनिक कहानी ने ‘सचमुच’ के मनुष्य को केंद्र में रखा। कहानी झूंठ व सच का संयोग होती है। एक त्रिकोण के जरिये कहानी के विभिन्न अंगों से उन्होंने प्रशिक्षुओं को परिचित कराया।
वरिष्ठ कहानीकार जितेंद्र भाटिया(जयपुर) ने कहा कि सोशल मीडिया का व्याकरण हमें मजबूर करता है कि हम उसे ग्रहण करके अपनी मौलिकता को नष्ट करें। कहानी यथार्थ व कल्पना से मिलकर बनती है। लेकिन इसके अनुपात का कोई सेट फॉर्मूला नहीं।
सत्र की अध्यक्षता ‘कथादेश’ के संपादक हरिनारायण ने की।
धन्यवाद ज्ञापन रंगलीला के निदेशक अनिल शुक्ल ने किया।
आगंतुकों का स्वागत शीरोज हैंगआउट के रामभरत उपाध्याय ने किया। कार्यक्रम का संयोजन रंजीत गुप्ता,अर्निका माहेश्वरी, अजय तोमर ने किया।
मंच नियंत्रण मनीषा शुक्ला ने किया। कार्यक्रम की व्यवस्था अर्जुन सहवेदिया ने संभाली।
आज के भोजनावकाश के बाद का सत्र प्रशिक्षुओं के अभ्यास का था। देखते ही देखते उन्होंने चंद शब्दों की मदद से कहानी के ढीले ढाले ढांचे को गढ़ना शुरू कर दिया। कल के दिन वे ज्यादा समय अभ्यास में गुजारेंगे।
वर्कशॉप के तीसरे दिन वरिष्ठ कहानीकार विभांशु दिव्याल(गाजियाबाद) और योगेंद्र आहूजा (नई दिल्ली) प्रशिक्षुओं को संबंधित करेंगें।
















