*अरुणाचल प्रदेश में भीमकाय बांध का विरोध : अधिकार, ज़मीन और विकास की राजनीति के सवाल*
*(आलेख : भूपेन सरमा, अनुवाद : संजय पराते)*
सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट (एसयूएमपी) अरुणाचल प्रदेश के अपर सियांग, सियांग और ईस्ट सियांग जिलों के मूल निवासी समुदायों के लिए स्वाभाविक रूप से एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। 2008 में भारत की सबसे बड़ी जल विद्युत परियोजना के रूप में परिकल्पित, सियांग घाटी के तीन जिलों में प्रस्तावित 11,200 मेगावाट की यह परियोजना अब ऊपरी चीन की ऐसी ही योजनाओं के खिलाफ एक रणनीतिक जवाब के रूप में पेश की जा रही है। प्रस्तावित महाकाय बांध, जिसकी भंडारण क्षमता लगभग 9.2 अरब घन मीटर होने का अनुमान है, को अदी बन्ने केबांग — यूनाइटेड, सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम और अदी गालो वेलफेयर सोसाइटी सहित कई संगठनों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। इन समूहों को आशंका है कि बांध के कारण 27 गांव जलमग्न और 1.5 लाख लोग विस्थापित हो सकते हैं। इसके अलावा नदी के किनारे उपजाऊ धान के खेतों के बड़े हिस्से भी पानी में डूब सकते हैं। पुश्तैनी जमीन की सुरक्षा को लेकर वैध चिंता के अलावा, प्रस्तावित बांध ने घाटी के आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक आजीविका और खाद्य सुरक्षा के संरक्षण पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विरोध प्रदर्शनों के बढ़ते उग्र रूप की अनदेखी करते हुए, अरुणाचल प्रदेश राज्य मंत्रिमंडल ने 23 सितंबर, 2026 को प्रस्तावित सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट से जुड़ी पूर्व-व्यवहार्यता रिपोर्ट सर्वेक्षण और संबंधित गतिविधियों का ‘मार्गदर्शन और समन्वय’ करने के लिए एक अधिकार प्राप्त उच्च स्तरीय समिति के गठन को मंजूरी देते हुए एक प्रस्ताव पारित किया है।
जबकि जनता अपने शांतिपूर्ण आंदोलन के माध्यम से राज्य सरकार से पारदर्शिता और जवाबदेही की, और इसके साथ ही प्रभावित गांवों के पुनर्वास व पुनरुद्धार के लिए एक व्यावहारिक योजना की मांग कर रही है, सरकार ने इसका संतोषजनक समाधान देने के बजाय हेराफेरी के हथकंडों का सहारा लिया है। खबरों के अनुसार, गांवों में बांध-समर्थक गुट को मजबूत करने के लिए जो कदम उठाए गए हैं, उसमें विशेष रूप से ग्राम प्रधानों, पंचायत नेताओं और सरकारी अधिकारियों को शामिल किया गया है। जन सहमति बनाने के ऐसे प्रयासों के साथ दंडात्मक उपाय भी अपनाए जा रहे हैं और बांध का विरोध करने वालों को ‘राष्ट्रविरोधी’, ‘समाजविरोधी’ तथा ‘विकासविरोधी’ के रूप में चित्रित किया जा रहा है — यह एक ऐसी रणनीति है, जिसका उपयोग भाजपा सरकारें अक्सर असहमति को अवैध ठहराने के लिए करती हैं। इसके साथ ही, पूर्व-व्यवहार्यता सर्वेक्षण का विरोध कर रहे मूल निवासियों की आवाज़ को कुचलने के लिए सरकार ने तीनों ज़िलों के विभिन्न स्थानों पर अर्धसैनिक बलों को तैनात कर दिया है। परिणामतः, 23 अक्टूबर की रात पासीघाट में शांतिपूर्ण आंदोलन एक तनावपूर्ण हिंसा में बदल गया, जब कुछ प्रदर्शनकारियों ने राजनीतिक नेताओं के आवासों में तोड़फोड़ करने के अलावा, कथित तौर पर एक पुलिस थाने, एनएचपीसी कार्यालय और पुलिस वाहनों में आग लगा दी। ब्रह्मपुत्र की बारहमासी बाढ़ को नियंत्रित करने के संभावित उपाय के रूप में, ब्रह्मपुत्र की एक सहायक नदी सुबनसिरी पर एक बड़े बांध का विचार सबसे पहले 1950 के दशक के मध्य में असम सरकार द्वारा परिकल्पित किया गया था। इस विचार ने 1982 में एक मूर्त प्रस्ताव के रूप में तब आकार लिया, जब 1980 के संसद के अधिनियम के तहत स्थापित एक वैधानिक निकाय, ब्रह्मपुत्र बोर्ड ने एक परियोजना योजना तैयार की। बहरहाल, इस प्रस्ताव को न केवल निवेश आकर्षित करने में असफलता मिली, बल्कि संभावित पारिस्थितिक प्रभावों और भूमि के जलमग्न होने के कारण इसे तीव्र विरोध का सामना भी करना पड़ा। उस समय का राजनीतिक माहौल स्थानीय ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए लघु और सूक्ष्म जल विद्युत परियोजनाओं के पक्ष में था।
गेगोंग अपांग के नेतृत्व वाली अरुणाचल प्रदेश सरकार और ब्रह्मपुत्र बोर्ड के बीच राजनीतिक वार्ता के बाद, नब्बे के दशक के मध्य में मूल परियोजना का पुनर्मूल्यांकन किया गया। ब्रह्मपुत्र बोर्ड द्वारा तैयार किए गए संशोधित प्रस्ताव में इस महाकाय बांध परियोजना को छह छोटी परियोजनाओं में विभाजित करने की परिकल्पना की गई थी, जिनमें से तीन सुबनसिरी और तीन दिबांग नदियों पर थीं। पहली परियोजना के लिए सुबनसिरी के निचले क्षेत्रों में गेरुकामुख स्थल का चयन किया गया था। वर्ष 2000 में, केंद्र सरकार ने ब्रह्मपुत्र बोर्ड को इस परियोजना के क्रियान्वयन का उत्तरदायित्व नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन (एनएचपीसी लिमिटेड) को सौंपने का निर्देश दिया।
लोअर सुबनसिरी जलविद्युत परियोजना के बाद दिबांग बहुउद्देशीय परियोजना आई। हालांकि दिबांग परियोजना की आधारशिला 2008 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा रखी गई थी, लेकिन केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जुलाई 2019 में इस परियोजना को मंजूरी दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 9 मार्च, 2024 को नए शिलान्यास समारोह के बाद निर्माण कार्य औपचारिक रूप से पुनः आरंभ हुआ।
विभिन्न राजनीतिक दलों सहित कई संगठनों ने 2,000 मेगावाट की निचली सुबनसिरी जल विद्युत परियोजना और 3,000 मेगावाट की दिबांग बहुउद्देशीय परियोजना दोनों का कड़ा विरोध किया है। विशेषकर लोअर सुबनसिरी परियोजना के खिलाफ प्रतिरोध ने इस तरह की विशाल बांध परियोजनाओं की पर्यावरणीय वहनीयता पर बुनियादी सवाल खड़े किए हैं। यद्यपि इसका विरोध मुख्य रूप से असम से लगे जिलों में ही केंद्रित था, तथापि लंबे समय तक चले बांध विरोधी आंदोलनों ने इस परियोजना के पर्यावरण प्रभाव आकलन की पर्याप्तता, निचले इलाकों में संभावित बाढ़, नदी के कटाव, भूकंपीय जोखिमों, जैव विविधता के नुकसान और स्थानीय आजीविका के व्यवधान के संबंध में गंभीर चिंताओं को रेखांकित किया। इसी के साथ, कुछ संगठनों ने इस परियोजना के विभिन्न पहलुओं को चुनौती देने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप की भी मांग की।
यद्यपि प्रचलित राजनीतिक-न्यायिक परिवेश महाकाय बांधों के निर्माण के अनुकूल था, तथापि राज्य तंत्र और परियोजना क्रियान्वयन अधिकारियों ने यह पाया कि एक ऐसे आंदोलन के प्रतिरोध को धीरे-धीरे कमजोर करना संभव था, जिसमें सुसंगत वैचारिक ढांचे और निरंतर संगठनात्मक समर्थन का अभाव था। अधिकारियों ने दशक भर चले उस आंदोलन को शांत करने के लिए कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) की आड़ में विकासवादियों का एजेंडा आगे बढ़ाया, जिस पर काफी अकादमिक ध्यान भी गया था। स्थानीय स्तर पर समर्थन हासिल करने के प्रयासों में सुअर पालन, रेशम कीट पालन और हथकरघा उद्यमों के लिए सहायता, सड़क के बुनियादी ढांचे में सुधार, ग्रामीण विद्युतीकरण और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों का सृजन शामिल था।
लेन-देन के इस दृष्टिकोण ने परियोजना के आंशिक रूप से चालू होने में मदद की। फिर भी, लोगों की वास्तविक चिंताओं, निचले हिस्सों पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर उनकी आशंकाओं और परियोजना के पर्यावरणीय परिणामों से जुड़ी अनिश्चितताओं का पर्याप्त समाधान नहीं किया गया है। रंगनाडी जल विद्युत परियोजना से जुड़ी बार-बार की तबाही ने इन चिंताओं को और गहरा कर दिया है, जो लोअर सुबनसिरी परियोजना की तुलना में काफी छोटी है। नतीजन, रंगनाडी बांध के अनुभव ने कहीं अधिक बड़े सुबनसिरी प्रोजेक्ट के संभावित निचले हिस्से के परिणामों को लेकर डर को और बढ़ा दिया है।
कॉर्पोरेट घरानों के हितों को पूरा करने के साथ-साथ, अरुणाचल प्रदेश सरकार ने लंबे समय से जल विद्युत विकास को एक व्यावसायिक अवसर माना है। लोअर सुबनसिरी परियोजना को अंतिम रूप दिए जाने के बाद, सरकार ने, मुख्य रूप से निजी विकासकर्ताओं को शामिल करते हुए, नवंबर 2005 में अपनी जल विद्युत नीति शुरू की, जिसका उद्देश्य 57,000 मेगावाट बिजली का उत्पादन करना था। तदुपरांत, सरकार ने कई सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कंपनियों के साथ समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए। खबरों के अनुसार, कुछ निजी कंपनियों के पास जल विद्युत विकास का पूर्व अनुभव न होने के बावजूद, उन्होंने सरकारी राजकोष में अग्रिम भुगतान करके परियोजनाएं हासिल कर लीं। राज्य सरकार द्वारा अपनाये गये ऐसे कथित भ्रष्ट व्यवहार ने पारिस्थितिक वहनीयता की कीमत पर आर्थिक लाभ को प्राथमिकता देने के बारे में अनिवार्य रूप से सवाल खड़े कर दिए।
अरुणाचल प्रदेश के जागरूक नागरिकों ने पूर्वोत्तर, विशेषकर अरुणाचल प्रदेश को जल विद्युत केंद्र के रूप में विकसित करने की भारत सरकार की असमान योजना का निश्चित रूप से संज्ञान लिया होगा, जिसे केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) की योजनाओं में अंतिम रूप दिया गया है। अक्टूबर 2025 में जारी ब्रह्मपुत्र बेसिन की जल विद्युत परियोजनाओं से बिजली निकासी की मास्टर योजना 76 गीगावॉट तक बिजली के प्रेषण के लिए एक रूपरेखा प्रदान करती है, जो भारत की सबसे संसाधन-संपन्न नदी प्रणालियों में से एक से जल विद्युत और पंप-संचित भंडारण परियोजनाओं द्वारा उत्पन्न की जाएगी। इस योजना में 12 उप-बेसिनों में फैली 208 बड़ी जल विद्युत परियोजनाएं शामिल हैं, जिनकी संभावित स्थापित क्षमता 64.9 गीगावाट है, और पंप-भंडारण संयंत्रों से 11.1 गीगावाट अतिरिक्त क्षमता मिलेगी। जाहिर तौर पर, इस योजना का उद्देश्य देश की बढ़ती बिजली की मांग को पूरा करना है, और पारेषण के बुनियादी ढांचे में कुल अनुमानित निवेश लगभग 6.43 लाख करोड़ रुपये है। बहरहाल, इस योजना का औचित्य काफी हद तक राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास के आख्यानों पर टिका है, जबकि बेसिन की भूकंपीय संवेदनशीलता, पारिस्थितिक परिणामों और अन्य प्रासंगिक सामाजिक-आर्थिक चिंताओं पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया है।
यह उल्लेखनीय है कि सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट मूल रूप से 2013 में दो छोटी परियोजनाओं के रूप में योजना बनाई गई थी : सियांग अपर चरण I (6,000 मेगावाट) और चरण II (3,750 मेगावाट)। रिपोर्ट के अनुसार, 26 सितंबर 2017 को मुख्यमंत्री के नेतृत्व में अरुणाचल प्रदेश के एक प्रतिनिधिमंडल और नीति आयोग के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत के बाद योजना में संशोधन किया गया था। परिणामस्वरूप, 250 मीटर ऊँचे एक ही बाँध के निर्माण के लिए प्रस्ताव को संशोधित किया गया, जिसकी उत्पादन क्षमता 11,200 मेगावाट अधिक थी, किंतु लागत 25 प्रतिशत कम थी। सियांग घाटी की अपेक्षाकृत घनी आबादी को देखते हुए, राज्य में इस परियोजना का प्रभाव, विकसित की जा रही अन्य प्रमुख जल विद्युत परियोजनाओं (सुबनसिरी और दिबांग घाटियों की परियोजनाओं सहित) की तुलना में काफ़ी अधिक गंभीर और व्यापक होने की संभावना है।
द हिंदू द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, सियांग घाटी के निवासी न तो सरकार के इस तर्क से संतुष्ट हैं कि इस परियोजना से राज्य की आय बढ़ेगी और न ही तिब्बत में उसी नदी पर चीन की मेडोग बांध परियोजना से उत्पन्न होने वाले सुरक्षा खतरों की कहानियों पर उन्हें विश्वास है। बहरहाल, उनकी मुख्य चिंता उनकी अपनी उत्तरजीविता और अपनी पहचान, परंपराओं तथा रीति-रिवाजों को संरक्षित करते हुए गरिमा के साथ जीने का उनका अधिकार है, साथ ही अपनी भूमि और उससे पोषित प्राकृतिक संसाधनों पर उनके पारंपरिक अधिकार भी हैं।
उपर्युक्त संदर्भ में, सियांग घाटी के निवासियों द्वारा शुरू किए गए इस आंदोलन को केवल एक जलविद्युत परियोजना के विरोध के रूप में नहीं देखा जा सकता। यद्यपि यह आंदोलन सियांग परियोजना से जुड़े पूर्व-व्यवहार्यता सर्वेक्षण और ड्रिलिंग के कारण शुरू हुआ था, तथापि यह आंतरिक रूप से मूल निवासी लोगों के अपनी पूर्वजों की भूमि पर पारंपरिक और प्रथागत अधिकारों, विकास के कॉर्पोरेट तर्क और नवउदारवादी राज्य द्वारा प्रचारित राष्ट्रीय सुरक्षा की कहानी पर लगातार बढ़ते अविश्वास, और पर्यावरण संबंधी संचित चिंताओं से जुड़ा हुआ है। स्पष्ट रूप से कहें तो, यह वर्तमान आंदोलन एक बार फिर कॉर्पोरेट राज्य की सांठगांठ द्वारा स्थापित विकास की तर्कप्रणाली को चुनौती दे रहा है।
पूर्वोत्तर भारत में जल संसाधनों और संबद्ध नदी प्रणालियों का प्रबंधन निस्संदेह एक अत्यंत जटिल विषय है, जिसके लिए इस क्षेत्र के सभी राज्यों के सम्मिलित प्रयासों की आवश्यकता है। तकनीकी दायरे से परे के प्रासंगिक प्रश्नों का भी समाधान किया जाना चाहिए, जिसमें व्यापक सामाजिक सरोकारों को ध्यान में रखा जाए। क्षेत्र में जल प्रबंधन के अनसुलझे मामलों पर निरंतर चर्चा नॉर्थ ईस्ट वॉटर मैनेजमेंट अथॉरिटी (न्यूमा) की बढ़ती आवश्यकता को रेखांकित करती है, जो कि एक संस्थागत तंत्र है, जिसका प्रस्ताव सबसे पहले वर्ष 2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा किया गया था। इसकी कल्पना एक ऐसे मजबूत, एकीकृत निकाय के रूप में की गई थी, जो ब्रह्मपुत्र बोर्ड, जो लंबे समय से सीमित शक्तियों, खंडित क्षेत्राधिकार और कमजोर समन्वय तंत्र से जूझ रहा है, की जगह लेगा।
न्यूमा का विचार 2022 में फिर से उभरा, जब संसद में उत्तर-पूर्व जल प्रबंधन प्राधिकरण विधेयक को सूचीबद्ध तो किया गया था, लेकिन उसे कभी पेश नहीं किया गया। जैसा कि परिकल्पना की गई थी, यह संस्थागत तंत्र ब्रह्मपुत्र बोर्ड की अप्रभावशीलता के कारण पैदा हुए संस्थागत शून्य को भर देगा। इसे न केवल मास्टर प्लान तैयार करने और स्वीकृत करने का अधिकार होगा, बल्कि पर्याप्त वित्त पोषण, स्पष्ट रूप से परिभाषित समय सीमा और प्रभावशाली अंतर्राज्यीय समन्वय के माध्यम से उनके क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने का भी अधिकार होगा। वर्ष 2020 में, जल संसाधन संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने इस तरह की संस्थागत व्यवस्था की आवश्यकता को फिर से रेखांकित किया, और 2023 में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री ने भी इसकी तात्कालिकता पर बल दिया। तथापि, इस प्रस्ताव को अभी तक ठोस कार्रवाई में बदला नहीं जा सका है।
मौजूदा स्थिति को देखते हुए, केंद्र सरकार और अरुणाचल प्रदेश सरकार को इस क्षेत्र में प्रस्तावित भीमकाय बांध परियोजनाओं पर आगे बढ़ने से तब तक बचना चाहिए, जब तक कि सभी प्रस्तावित परियोजनाओं के व्यापक प्रभाव का आकलन नहीं किया जाता और उसके निष्कर्ष सार्वजनिक पड़ताल के लिए सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं कराए जाते।
*(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)*














