आज़ के सच का इतिहास
कुंद होती कलम और घुटता हुआ पेशेवर स्वाभिमान
शंकर देव तिवारी

यह किसी एक पत्रकार की लाचारी नहीं, बल्कि पूरे चौथे स्तंभ के अंतःकरण से उपजी वह आत्म-ग्लानि है जो आज हर उस आंख में तैर रही है जो सच को देखने का माद्दा रखती है। जब पत्रकारिता अपने मूल चरित्र यानी ‘सत्य के संधान’ को छोड़कर केवल शासकीय और कॉरपोरेट विज्ञप्तियों की डाकिया बनने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र का सबसे मुखर प्रहरी अब व्हीलचेयर पर आ चुका है। हम किस बात के पत्रकार हैं, जब हमारी आँखों के सामने सच का गला घोंटा जा रहा हो, जब राजनेता गिरगिट की तरह सुबह का वादा शाम को बदल रहे हों, और हमारी कलम उन पर तीखे सवाल दागने के बजाय सत्ता की चाटुकारिता वाली भाषा लिखने को अभिशप्त हो? यह सवाल आज मीडिया की रीढ़ को झकझोर रहा है।
चार दशकों का लंबा अनुभव रखने वाले पत्रकार जब अपनी ही विधा को तमाशबीन बनते देखते हैं, तो निराशा का गहराना लाजिमी है। आज की पत्रकारिता उस चौराहे पर खड़ी है जहां ‘ग्राउंड कवरेज’ और खोजी रिपोर्टिंग का स्थान वातानुकूलित केबिनों में तैयार होने वाले नैरेटिव ने ले लिया है। जनसरोकार के उलझे मसलों पर जांच-पड़ताल करने के बजाय, बिना किसी बुनियादी प्रश्न के मामलों को हूबहू छाप दिया जाता है। नेताओं का दोहरा रवैया और पल-पल बदलती राजनीतिक भाषा अब विस्मय पैदा नहीं करती, बल्कि उसे ही न्यू नॉर्मल मान लिया गया है। सबसे बड़ा अनर्थ तब होता है जब अर्थों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है, ताकि सत्ता के आकाओं को कोई असुविधा न हो। इस प्रक्रिया में पत्रकार का अपना आत्मसम्मान, उसकी वैचारिक तटस्थता किसी हलाहल विष की तरह उसकी आत्मा में घुलती जाती है।
सुबह जब अखबार हाथों में आता है या टेलीविजन स्क्रीन पर खबरों का सैलाब उमड़ता है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरा तंत्र किसी मतिभ्रम या भांग के नशे में जी रहा हो। जो कुछ भी परोसा जा रहा है, वह वास्तविक धरातल से कोसों दूर है। तीखे और तार्किक सवालों—’कब, किसने, कितना?’—को हाशिए पर धकेल दिया गया है। जब कोई पत्रकार व्यवस्था की इन खामियों पर उंगली उठाने की कोशिश करता है, तो मीडिया घरानों के व्यावसायिक आकाओं का एक ही टका सा जवाब मिलता है: ‘यह सीजन गया, अब अगले सीजन का इंतजार करो।’ पत्रकारिता का यह ‘सीजनल’ (मौसमी) हो जाना ही इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी है। यहाँ जनसरोकारों को टीआरपी, विज्ञापनों और राजनीतिक प्राथमिकताओं के तराजू पर तौला जाता है। कभी झूठी बधाई और हर्ष का माहौल बनाया जाता है, तो कभी प्रायोजित आहत भावनाओं की नुमाइश की जाती है।
अब समय आ गया है कि इस रीढ़विहीन और धारहीन होती पत्रकारिता पर आत्म-मंथन किया जाए। यदि आज भी कलम अपनी धार वापस नहीं पा सकी, तो आने वाली पीढ़ियां इस मौन और इस आत्म-समर्पण के लिए हमें कभी माफ नहीं करेंगी।
यह मंथन किसी व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश मात्र नहीं है, बल्कि उस पेशेवर स्वाभिमान की अंतिम पुकार है जो चुल्लू भर पानी में डूब मरने की ग्लानि से उबरकर एक बार फिर सच की स्याही से इतिहास लिखना चाहता है।














