*एलडीए की नई जगी नींद, सचमुच जागा महकमा या सिर्फ बदली करवट?*
*रातों-रात उग गईं इमारतें क्या कुंभकर्णी नींद में सो रहा था प्रवर्तन विभाग?*
*संवाददाता सैफ साबरी*
लखनऊ। लखनऊ विकास प्राधिकरण में आखिरकार सख्ती की घंटी सुनाई दी है। उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार की समीक्षा के बाद अधिकारियों को समय-सीमा में कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। अच्छी बात है कि महकमा जागा है, मगर जनता के मन में एक छोटा-सा सवाल है-हुजूर, इतनी देर से नींद खुली?
राजधानी में बहुमंजिला इमारतें कोई ऐसी चीज नहीं हैं जो रात में सोईं और सुबह खड़ी हो गईं। पहले जमीन साफ होती है, फिर नींव पड़ती है, दीवारें उठती हैं, मंजिलें बनती हैं और आखिर में करोड़ों की इमारत तैयार हो जाती है। इस पूरे सफर में एलडीए की नजर कब पड़ती है, यह सवाल शायद फाइलों को भी मालूम नहीं।
मजेदार बात यह है कि जब निर्माण शुरू होता है तो शायद विभाग को दिखाई नहीं देता, लेकिन जब इमारत कई मंजिल ऊपर पहुंच जाती है, तब अचानक नियम-कायदे भी याद आने लगते हैं। यानी पहले निर्माण चलेगा, फिर कार्रवाई की फाइल चलेगी और देखते-देखते दोनों अपनी-अपनी मंजिल तक पहुंच जाएंगे।
शमन आवेदन भी कुछ मामलों में बड़ी सुविधा बन जाते हैं। कार्रवाई की आहट हुई नहीं कि आवेदन सामने। फिर फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल तक ऐसे घूमती है जैसे उसे राजधानी का दर्शन कराने निकाला गया हो। इस बीच निर्माण अपनी रफ्तार से चलता रहता है और मंजिलें बढ़ती रहती हैं।
अब एक सप्ताह के भीतर सीलिंग और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। स्वागत है। मगर असली सवाल यही है कि हंटर चलेगा भी या सिर्फ फाइलों में घूमता रहेगा?
जनता यह भी देखना चाहती है कि कार्रवाई केवल उन निर्माणों पर होगी जहां मालिक कमजोर है और पहुंच कम है, या उन इमारतों तक भी पहुंचेगी जिनके बारे में गलियारों में रसूख और पहुंच के किस्से सुनाई देते हैं। कानून की खूबसूरती तभी है जब उसका डंडा छोटे-बड़े, गरीब-अमीर और रसूखदार-बे-पहुंच सभी के लिए बराबर हो।
और जिम्मेदारी सिर्फ अवैध निर्माण करने वाले की क्यों? जिन अधिकारियों और कर्मचारियों की निगरानी में महीनों तक निर्माण चलता रहा, उनसे भी सवाल होना चाहिए। आखिर निरीक्षण के लिए तैनात अधिकारी क्या सिर्फ चाय की चुस्की और फाइलों पर दस्तखत करने के लिए हैं? अगर अवैध निर्माण आंखों के सामने खड़ा होता रहा, तो आंखें बंद थीं या देखने का चश्मा ही सरकारी स्टोर में अटका था?
डिजिटल पोर्टल और ऑनलाइन आपत्तियों की व्यवस्था निश्चित रूप से अच्छी पहल है। जनता ऑनलाइन शिकायत करेगी, शिकायत दर्ज होगी, नंबर मिलेगा और शायद स्क्रीन पर कार्रवाई भी दिखाई देगी। लेकिन जनता को अब स्क्रीन पर नहीं, सड़क पर कार्रवाई दिखाई देनी चाहिए।
क्योंकि वेबसाइट कितनी भी पारदर्शी हो, अगर कार्रवाई की प्रक्रिया पुरानी चाल से चलेगी तो मामला वही रहेगा, शिकायत ऑनलाइन, इंतजार ऑफलाइन।
एलडीए ने देर से ही सही, सख्ती की दिशा में कदम बढ़ाया है। अब जरूरत सिर्फ जागने की नहीं, जागते रहने की है। वरना कुछ दिनों बाद जनता फिर वही सवाल पूछेगी और फाइलें फिर वही जवाब देंगी।
आखिर अवैध निर्माण ईंट-पत्थर से बनते हैं, लेकिन उन्हें लंबे समय तक खड़ा रखने के लिए सिर्फ ईंट-पत्थर काफी नहीं होते, निगरानी की कमी भी चाहिए और कार्रवाई में देरी भी।
अब देखना यह है कि इस बार आदेश कागज से निकलकर जमीन तक पहुंचता है या फिर फाइलों की अलमारी में जाकर आराम फरमाने लगता है।
हुक्म जारी होना अच्छी शुरुआत है साहब, मगर जनता अब आदेश नहीं, नतीजा देखना चाहती है। वरना एलडीए की यह जागी हुई नींद भी कहीं अगली करवट का इंतजार न बन जाए!









