समरथ के आगे पीछे सब देखाईं…भले ही वह हर काज गलत ही काहे न करत जाईं

समरथ के आगे पीछे सब देखाईं…भले ही वह हर काज गलत ही काहे न करत जाईं।

 

तुलसीदास के प्रसिद्ध दोहे समरथ को नहि दोष गोसाईं को तोड़-मरोड़कर नए अर्थ के साथ गढ़ने का मेरा आशय मात्र इतना है कि समय, काल और परिस्थितियों के अनुसार यह पंक्ति भी कम प्रासंगिक नहीं लगती।

आज का दौर सामर्थ्यवानों का दौर है। जिसके पास पैसा, पद, प्रतिष्ठा और प्रभाव है, उसके आसपास लोगों की भीड़ लगी रहती है। जो असमर्थ है, उसका अक्सर कोई नहीं होता न सगे, न संबंधी और न ही शुभचिंतक।

 

यह घटना इस कड़वी सच्चाई को सामने रखती है।

 

तस्वीर में दिख रहे इस सात वर्षीय बच्चे अर्पित की कहानी यह है कि यह अपनी मां के साथ लुधियाना से गोंडा आया था। वहां से ईन्हें अयोध्या जाना था, लेकिन बस अड्डे पर ईसकी मां की तबीयत अचानक बिगड़ गई। अस्पताल में चार दिन तक इलाज चला, मगर वह जिंदगी की जंग हार गई।

 

मां की मौत के बाद मासूम अर्पित अकेला पड़ गया। उसने मां के मायके और ससुराल पक्ष के लोगों को फोन किए, मदद की गुहार लगाई, लेकिन कोई भी अंतिम संस्कार के लिए आने को तैयार नहीं हुआ।

 

अर्पित की मां ने प्रेम विवाह किया था। बाद में ईसके पिता ने दूसरी शादी कर ली और मां-बेटे को छोड़ दिया। अब यह बच्चा अस्पताल में अपनी मां के शव के साथ बैठा अपनों का इंतजार करता रहा। शायद ईसे उम्मीद थी कि कोई आएगा, इसे गले लगाएगा, इसकी मां को अंतिम विदाई देगा। मगर कोई नहीं आया।

 

अंततः अस्पताल प्रशासन की पहल और अनुरोध पर हिन्दू सामाजिक संगठन आगे आया और अर्पित की मां का अंतिम संस्कार कराया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार मामला संज्ञान में आने के बाद जिलाधिकारी ने बच्चे की पढ़ाई-लिखाई और पालन-पोषण की जिम्मेदारी लेने का आश्वासन दिया तथा उसे बाल शिशु गृह भेज दिया गया।

 

सोचिए, यह बच्चा आज हर लिहाज से असमर्थ है। इसलिए इसके अपने भी इससे दूर खड़े दिखाई दिए। लेकिन यदि यही अर्पित कल पढ़-लिखकर बड़ा अधिकारी, सफल व्यवसायी या प्रभावशाली व्यक्ति बन जाए, तो संभव है कि इसके आसपास रिश्तेदारों और शुभचिंतकों का घेरा बन जाए। तब लोग इसके साथ अपने पुराने रिश्तों की दुहाई देंगे।

 

यही संसार का दस्तूर है। यहां अधिकांश लोग व्यक्ति का नहीं, उसकी सामर्थ्य का सम्मान करते हैं। मुश्किल समय अक्सर यह बता देता है कि कौन अपना है और कौन केवल अवसर का साथी। इसलिए जीवन में यदि कोई चीज सबसे कीमती है तो वह है संकट की घड़ी में साथ खड़े रहने वाले लोग, क्योंकि वही रिश्तों की असली परीक्षा होती है।

 

विनय मौर्या

बनारस।

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