*देश का दर्द, नमाज़ का सिजदा और सेकुलर भारत का इम्तिहान,*
*मस्जिदें छोटी पड़ जाती हैं, दिल तो बड़े रखिए साहब!*
*मोहम्मद सैफ साबरी,*
जब हम बचपन में सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा गाते थे, तो दिल में यह अटूट यकीन होता था कि इस ज़मीन की मिट्टी में जितनी खुशबू हमारे हिस्से की है, उतनी ही हमारे पड़ोसी की भी है। आख़िर इस मुल्क की आज़ादी के लिए जो लहू बहा था, उसका कोई एक मज़हब तो नहीं था। कुर्बानियां सबकी थीं, तो यह वतन भी सबका बराबर था।
लेकिन आज जब त्योहारों के मौके पर महज चंद मिनटों की नमाज़ को एक अमन-चैन का खतरा बनाकर पेश किया जाता है, तो दिल टूट जाता है।
यह पीड़ा सिर्फ किसी एक शहर की नहीं, बल्कि समूचे देश की है। अफ़सोस इस बात का है कि जहां आस्था के नाम पर बड़े-बड़े आयोजन, बारातें और धार्मिक रैलियां घंटों सड़कों को थामे रखती हैं, वहां साल में सिर्फ दो दिन, कुछ पलों के लिए अगर मस्जिदों में जगह कम पड़ने के कारण कोई खुदा के सामने सिर झुका लेता है, तो उसे कानून-व्यवस्था का संकट मान लिया जाता है।
क्या कुछ मिनटों का वह सिजदा वाकई किसी को तकलीफ पहुंचाता है, या फिर जानबूझकर एक पूरे समुदाय को निशाने पर लेने का बहाना ढूंढा जाता है? भारत के संविधान और गंगा-जमुनी तहजीब को जिंदा रखने की चाह रखने वालों की आंखें भी यह देखकर नम हो जाती हैं। वे भी खुद से यही सवाल पूछते हैं कि जिस भाई ने इस वतन को सींचा, आज उसके साथ यह परायापन और इबादत के तरीके को लेकर ऐसा भेदभाव क्यों?
हाल ही में प्रशासनिक बैठकों और सोशल मीडिया पर तैरती तस्वीरों में जब ढलती उम्र के एक शहर काज़ी की भर्राई हुई आवाज़ में यह कसक छलकी कि मस्जिदें छोटी पड़ जाती हैं, दिल तो बड़े रखिए। तो असल में वह सदियों पुरानी उस साझी विरासत की वकालत कर रहे थे जिसे हम हिंदुस्तान कहते हैं। यह आवाज़ उस मां और उस नौजवान का सच है, जो सुकून से सिर झुकाना चाहते हैं, लेकिन बदले में मुकदमों और पाबंदियों का डर पाते हैं।
बेशक, इस विमर्श का एक दूसरा पहलू प्रशासन और सार्वजनिक व्यवस्था से भी जुड़ा है। हाल के वर्षों में न्यायपालिका और शासन का रुख यह रहा है कि रास्तों, सड़कों और फुटपाथों को हर प्रकार के आयोजनों से मुक्त रखा जाए, चाहे वह नमाज़ हो, बारात, जागरण, या राजनीतिक रैली। अधिकारियों का मानना है कि इससे एम्बुलेंस, दफ्तर जाने वालों और आम जनता को असुविधा होती है, साथ ही भीड़ बढ़ने से किसी अप्रिय घटना या दुर्घटना की आशंका रहती है। इसी दृष्टिकोण के कारण अब मस्जिदों की छतों, ईदगाहों या निजी परिसरों के भीतर ही इबादत मुकम्मल करने पर ज़ोर दिया जा रहा है।
नियमों का पालन अपनी जगह ज़रूरी है, लेकिन जब व्यवस्था से मानवीय संवेदना और आपसी भरोसा गायब हो जाता है, तो कानून सिर्फ एकतरफा चाबुक की तरह लगने लगता है। एक जीवंत लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में भारत का असली इम्तिहान यही है कि हम नियम-कायदों का पालन भी करवाएं, और साथ ही किसी भी नागरिक के भीतर हीनभावना न पनपने दें।
वतन को महफूज़ रखने के लिए सड़कों को खाली कराने से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है कि हम उन दिलों को टूटने से बचाएं जिन्होंने इस देश की नींव को संभाला है। कानून की ताकत से रास्ते तो साफ किए जा सकते हैं, लेकिन मोहब्बत के बिना इस मुल्क की रूह को जिंदा नहीं रखा जा सकता। आज पूरा हिंदुस्तान इसी इंसाफ और अपनत्व की राह देख रहा है।
यह देश जितना किसी और का है, उतना ही उस नमाज़ी का भी है जो महज़ कुछ पलों के लिए ज़मीन पर चटाई बिछाकर मुल्क की तरक्की और अमन की दुआ मांगता है। ज़रूरत रास्तों को खाली कराने से ज़्यादा, दिलों में थोड़ी सी जगह बनाने की है। क्योंकि जब तक दिलों में दूरियां रहेंगी, तब तक कोई भी सड़क कभी सीधी और हमवार नहीं हो पाएगी।
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