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तस्वीर में जो दिख रहा है ये भाड़ है। मिट्टी के जो कई सारे बर्तन गाड़े गए है इसमें कई तरह का तरह का बालू डालकर गर्म किया जाता है, आलेख शंकर देव तिवारी

भाड़ में जाओ! ये शब्द अक्सर लोग गुस्से में प्रयोग करते है। मेरा खुद गुस्से में निकला यही शब्द होता है हलांकि शब्दों का प्रयोग बहुत सोच समझकर करना चाहिए। यू तो इस शब्द को नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनों तरीको से लिया जा सकता है। भाड़ में जाओ मतलब भाड़ के अंदर जाओ जिधर आग जल रही या फिर भाड़ में अपने काम से जाओ लेकिन गुस्से में कहे गए शब्द न तो सकारात्मक भाव से कहे जाते है न ही कोई ले पाता है।

एक्ट पॉपकॉर्न के जमाने के बहुत से लोग अब तो भाड़ ही नहीं जानते है क्योंकि मिट्टी के बर्तनो को गाड़कर बना ये भाड़ अब लगभग खत्म सा हो गया।

जी तस्वीर में जो दिख रहा है ये भाड़ है। मिट्टी के जो कई सारे बर्तन गाड़े गए है इसमें कई तरह का तरह का बालू डालकर गर्म किया जाता है एक बड़े बर्तन यानि मुख्य बर्तन में अनाज डालकर पहले गर्म करते है फिर उस गर्म अनाज में दूसरे बर्तन में पहले से गर्म हुई रेत डालते है। रेत डालते ही अनाज भड़भड़ा कर फूटने लगता है और पूरी खपरी भुजे ( भूने) अनाज यानि भूजा से भर जाती है।

जिस बर्तन में ये अनाज भूनें जाते है उस मिट्टी के बर्तन को खपरी कहते है।

 

ये वही भाड़ है जिसे अकेला चना नहीं फोड़ पाता है।

 

जब मैं प्रायमरी स्कूल में थी तब उस समय हमारे स्कूल में बहुत दूर दूर से बच्चे पढ़ने आते थे। हमारा स्कूल, बिल्डिंग,बिजली, पानी, टॉयलेट जैसी सुविधा से वँचित था। बड़े से बूढ़े बरगद के पेड़ के नीचे हमारी क्लास लगती थी। स्कूल में तीन मास्टर जी नियुक्त थे जो अपने घर के काम के अनुसार छुट्टी करते और स्कूल आते थे। तीनों एक साथ शायद ही कभी स्कूल आये होंगे।

इस स्कूल में जो बच्चे नजदीक रहने वाले थे वो भोजन करने घर जाते थे जो दूर के थे वो रोटी और एक आम अचार की फांक रुमाल में बांधकर लाया करते थे। जिनके घर पर समय से भोजन तैयार नहीं होता था वो उसी रुमाल में घर से भुजिया चावल या जोनहरी बांध लाते थे।

काफ़ी ज्यादा भूमि बंजर थी जो चरागाह के रूप में प्रयोग होती थी उन पर कुछ आम के पेड़ भी लगे थे जिससे आप बगिया भी कह सकते है। ये सारी जमीन हमारी दृष्टि में स्कूल की थी और हमारे स्कूल का यही परिसर था इसलिए हमारे स्कूल के परिसर कोई भी सीमा तय नहीं थी।

हमारे परिसर से सटे हुए कुछ खेत थे जिनमें उगने वाली फ़सल की सिंचाई के लिए कोने पर एक कुआ खोदा गया था उस पर ढेकुली लगी थी इसी ढेकुली से खेत की मिट्टी व फ़सल सींची जाती थी और दोपहर में भोजन करने के बाद यही से हम सब पानी पीते थे।

जिनके ये खेत, कुआ थे उन दम्पत्ति ने वही स्कूल के परिसर के कोने में एक छोटी सी झोपडी डालकर भाड़ लगा रखा था। ये दम्पत्ति जाति से भी भड़भुजे थे। दोपहर में हमारे भोजन करने की छुट्टी से पहले ये अपना भाड़ जला लेते थे और फिर बच्चों के लाये अनाज भूजा करते थे। अनाज को भूनने का मूल्य भी उसी अनाज का कुछ हिस्सा होता था। भाड़ जला देखकर कुछ ग्रामवासी भी अपने चने चबैने भूनवाने ले आते थे। उस छोटी सी भूमि के अलावा उस दम्पत्ति का ये भाड़ भी उनके जीविकोपार्जन का एक साधन था।

मेरे नानी के घर जब भी भूजा खत्म होता था तब नानी एक बोरा भरकर भूजा भुजवा लेती थी क्योंकि मेरे घर पर खेत में काम करने के लिए अक्सर कई सारे कामगार (मजदूर ) लगते थे और यही एक एक मौनी भूजा और एक लोटा सिखरन( गन्ने का ताज़ा रस या राब चाहे गुड़ से घोला रस )उनका नाश्ता होता था। मेरे घर पर भूजा खत्म नहीं होने पाता था और दूसरी बात मेरा घर स्कूल के नजदीक था इसलिए भोजन करने घर आने की सुविधा मिली थी सो मुझे भाड़ से भूजा भुजाने का अवसर नहीं मिलता था। कभी कभी जब एक रूपये का सिक्का मिल जाता था तो उस रूपये के बदले भुजाइन मामी एक कलछी अनाज भूज देती थी जो लगभग एक मौनी भरकर होता था। मै फिर कुछ इस प्रकार से भूजा भुजवा कर आनंद लेती थी।

भूजा के लिए पहले नानी अब अम्मा धान की विशेष प्रकार से भुजिया( उबालती )करती है फिर उससे चावल बनवा कर उसका भूजा भुजवाती है। मेरे घर अब भी अम्मा भूजा भुजवा कर रखती है क्योंकि मुझे बहुत पसंद है इसलिए लखनऊ भी भेजती रहती है तीखे चटपटे नमक के साथ चबाने में बहुत स्वादिष्ट लगता है।

 

आसमान से पानी गिरते ही माताएँ बच्चों को ये देखने के लिए दौड़ा देती थी कि भाड़ जला है या नहीं जला है। भुजइनभौजी भी बारिश शुरू होते ही भाड़ जला लेती थी उन्हें पता था कि अब ये कमाई का समय है। गर्म गर्म भूजा बारिश में चबाने में बहुत अच्छा लगता था। भाड़ में भूजा भुजाने का नियम होता था जिसका भूजा भुजाने की बारी है उसे भाड़ झोकना (भाड़ में जलावन डालना )पड़ता था। कई बार भूजाइन भौजी जलावन छाँव में नहीं ऱख पाती थी भीग जाता था तो उस दिन भाड़ नहीं जलता था। सब लोग भाड़ झाँक झाँक कर मुँह लटका कर घर चले जाते थे। जिनके अंदर भूजा चबाने की इच्छा ज्यादा प्रबल होती थी वो घर में ही खपरी चढ़ाने की गुहार लगाते थे। घर की कोई बुजुर्ग महिला या अनुभवी महिला फिर खपरी (मिट्टी का विशेष बर्तन जिसका आकार कड़ाही जैसा होता था ) चढ़ा देती थी। बहुत अच्छा न सही लेकिन काम चलाऊ भूजा तो घर में भी भूज उठता था ताकि सब लोग अपना मुँह सोन्हवा( सोंधा कर )कर बारिश का आनंद ले सके।

इस भाड़ में सिर्फ चावल या जोनहरी ही नहीं बल्कि सतुआ भुजाने, चना भुजाने, मटर भुजाने की भी भीड़ लगा करती थी।

तब देशी अनाज होते थे जो फूटकर खिलते थे तब तो अच्छे लगते ही थे लेकिन जो नहीं फुटते थे उनका ठोर्रा मतलब सिर्फ सिका अनाज भी सोंधा स्वाद लिए बहुत स्वादिष्ट लगता था।

अब अनाज भी हाईब्रीड हो गए और भूनने के तरीके भी डिजिटल हो गए। सुविधा तो हो गई लेकिन वो स्वाद गायब हो गया।

 

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अरूणिमा सिंह

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