यह विवाह प्रेम, विश्वास और सामाजिक सौहार्द्र की एक अनोखी मिसाल बन गया है, जहां इंसानियत ने धर्म, अतीत और सामाजिक सीमाओं से ऊपर उठ कर अपना रास्ता बनाया

सतना। केन्द्रीय जेल सतना की ऊंची दीवारों के भीतर शुरू हुई एक प्रेम कहानी अब पूरे प्रदेश ही नहीं, देशभर में चर्चा का विषय बन गई है। बीते 5 मई 2026 को छतरपुर में फिरोजा खातून और धर्मेन्द्र सिंह का विवाह हुआ। दूल्हा कभी उम्रकैद की सजा काट चुका कैदी था, जबकि दुल्हन उसी जेल में पदस्थ डिप्टी जेलर थीं, जहां धर्मेन्द्र ने अपनी सजा पूरी की थी।

 

रीवा की मूल निवासी फिरोजा खातून की नियुक्ति सतना जेल में डिप्टी जेलर के रूप में हुई थी। पीएससी परीक्षा उत्तीर्ण कर सेवा में आईं फिरोजा को वारंट शाखा का प्रभार सौंपा गया। वहीं वर्ष 2007 में नगर परिषद उपाध्यक्ष कृष्णदत्त दीक्षित हत्या मामले में दोषी पाए जाने के बाद धर्मेन्द्र सिंह आजीवन कारावास की सजा काट रहे थे। अच्छे आचरण और कार्यकुशलता के कारण उन्हें जेल की वारंट शाखा में सहायक के रूप में काम सौंपा गया था।

 

यहीं से दोनों के बीच रोजाना मुलाकातें शुरू हुईं, जो धीरे-धीरे संवाद और फिर अपनत्व में बदल गईं। जेल की सलाखों के पीछे शुरू हुई यह कहानी समय के साथ इतनी गहरी हो गई कि दोनों ने साथ जीवन बिताने का निर्णय लिया।

 

करीब तीन वर्ष पहले अच्छे चालचलन के आधार पर धर्मेन्द्र सिंह को जेल से रिहा कर दिया गया। जेल से बाहर आने के बाद भी दोनों का संपर्क बना रहा और समय के साथ उन्होंने विवाह का फैसला कर लिया। फिरोजा मुस्लिम परिवार से थीं, जबकि धर्मेन्द्र हिन्दू। शुरुआत में दोनों परिवारों की ओर से असहमति रही, लेकिन बाद में परिवार इस रिश्ते के लिए तैयार हो गए।

 

5 मई को छतरपुर में हिन्दू रीति-रिवाज से दोनों का विवाह संपन्न हुआ। इस विवाह का सबसे भावुक पहलू तब सामने आया, जब फिरोजा के कन्यादान का सवाल उठा। परिवार के शामिल न होने की स्थिति में जेल निर्माण कार्य से जुड़े राजबहादुर ने पिता की भूमिका निभाते हुए कन्यादान किया, जबकि सचिन शुक्ला ने भाई का दायित्व निभाया।

 

यह विवाह प्रेम, विश्वास और सामाजिक सौहार्द्र की एक अनोखी मिसाल बन गया है, जहां इंसानियत ने धर्म, अतीत और सामाजिक सीमाओं से ऊपर उठ कर अपना रास्ता बनाया।

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