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एटा का सड़ा हुआ सिस्टम: डग्गामार बसों, अवैध ऑटो, ओवरलोड ट्रकों और खनन माफिया के आगे घुटनों पर प्रशासन — जनता की जान पर अफसरों का खेल

*एटा का सड़ा हुआ सिस्टम: डग्गामार बसों, अवैध ऑटो, ओवरलोड ट्रकों और खनन माफिया के आगे घुटनों पर प्रशासन — जनता की जान पर अफसरों का खेल*

 

*तुर्रम सिंह राजपूत✍️*

 

*एटा* जनपद में कानून व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी की हालत इतनी बदतर हो चुकी है कि अब सड़कों पर सिर्फ अव्यवस्था नहीं, बल्कि खुलेआम मौत दौड़ रही है। डग्गामार बसें, अवैध ऑटो, परमिटविहीन टैक्सी, ओवरलोडेड ट्रक, अवैध खनन वाहन और टैक्स चोरी में लिप्त कारोबारी — सब मिलकर पूरे जिले को लूट और खतरे के अड्डे में बदल चुके हैं। सबसे शर्मनाक बात यह है कि यह सब प्रशासन और जिम्मेदार विभागों की जानकारी के बिना नहीं, बल्कि उनकी कथित लापरवाही, ढिलाई और संदिग्ध मौन सहमति के बीच हो रहा है।

*डग्गामार बसों और ऑटो का आतंक: जनता को जानवरों की तरह भरकर मौत की सवारी*

एटा की सड़कों पर डग्गामार बसों और अवैध ऑटो का ऐसा जाल फैला हुआ है जिसने पूरे परिवहन तंत्र का मजाक बना दिया है। बिना परमिट, बिना फिटनेस, बिना बीमा और बिना सुरक्षा मानकों के वाहन खुलेआम दौड़ रहे हैं। कई डग्गामार बसों में क्षमता से दोगुने यात्री ठूँस दिए जाते हैं। ऑटो और टेंपो में बच्चे, महिलाएँ और बुजुर्ग जान जोखिम में डालकर सफर करने को मजबूर हैं।

इन वाहनों में न सुरक्षा है, न वैध कागजात, न प्रशिक्षित चालक। कई चालक नशे में वाहन चलाते दिखाई देते हैं। स्कूल समय में बच्चों से भरे अवैध ऑटो और जर्जर बसें किसी चलती हुई मौत से कम नहीं लगतीं। लेकिन एआरटीओ विभाग और परिवहन अधिकारी केवल खानापूर्ति और कागजी चेकिंग में व्यस्त रहते हैं।

*एआरटीओ विभाग की दिखावटी कार्रवाई: असली माफिया पर मौन क्यों?*

परिवहन विभाग समय-समय पर कुछ छोटे चालान काटकर मीडिया में “सघन चेकिंग अभियान” का प्रचार जरूर करता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि जिले में डग्गामार वाहनों का पूरा नेटवर्क वर्षों से सक्रिय है। सवाल उठता है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में अवैध बसें और ऑटो बिना संरक्षण के कैसे चल रहे हैं?

अगर वास्तव में सख्ती होती, तो हर चौराहे और मुख्य मार्ग पर खड़े डग्गामार वाहन दिखाई क्यों देते? क्यों स्कूलों के आसपास ओवरलोड ऑटो और अवैध वैन बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ करते घूमते हैं? यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता और जवाबदेही से भागने का जिंदा उदाहरण है।

*ओवरलोड ट्रकों और अवैध खनन का खूनी गठजोड़*

डग्गामार वाहनों के साथ-साथ ओवरलोड ट्रकों और अवैध खनन का नेटवर्क भी जिले में खुलेआम फल-फूल रहा है। रात-दिन बालू, गिट्टी और मिट्टी से भरे भारी वाहन सड़कों को तोड़ते हुए गुजरते हैं। कई ट्रकों की फिटनेस समाप्त हो चुकी है, नंबर प्लेट गायब हैं, लेकिन कार्रवाई नहीं होती।

इन ट्रकों के कारण सड़क हादसे बढ़ रहे हैं, पुल और सड़कें क्षतिग्रस्त हो रही हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ तब सक्रिय होते हैं जब कोई हादसा हो जाए या मीडिया में खबर चल जाए। उसके बाद शुरू होता है फोटो खिंचवाने और चालान काटने का दिखावटी अभियान।

*तहसील प्रशासन बना ‘सबका नौकर’, बाकी विभाग आराम में*

सबसे बड़ा प्रशासनिक मजाक यह है कि जिन विभागों को विशेष रूप से अवैध परिवहन, टैक्स चोरी और खनन रोकने के लिए बनाया गया है, वे अक्सर निष्क्रिय दिखाई देते हैं। परिणामस्वरूप उपजिलाधिकारी (SDM), तहसीलदार और नायब तहसीलदारों पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया जाता है।

तहसील प्रशासन पहले ही अदालत, भूमि विवाद, जनशिकायत, राजस्व वसूली, चुनाव, विकास कार्य और कानून व्यवस्था जैसी जिम्मेदारियों में दबा रहता है। इसके बावजूद रात में छापेमारी, वाहन पकड़ना और अवैध खनन रोकने का काम भी उन्हीं से कराया जाता है। जबकि संबंधित विभागों के अधिकारी अक्सर कार्रवाई के बाद सिर्फ फोटो खिंचवाने पहुँचते हैं।

*टैक्स चोरी और विभागीय सुस्ती: सरकारी खजाने की खुली लूट*

जीएसटी, सेल्स टैक्स और अन्य राजस्व की चोरी भी जिले में गंभीर समस्या बन चुकी है। अवैध कारोबारियों और माफिया नेटवर्क के कारण सरकार को भारी नुकसान हो रहा है। लेकिन विभागीय कार्रवाई अक्सर कागजों और प्रेस नोट तक सीमित दिखाई देती है।

जनता सवाल पूछ रही है —

जब इतने अधिकारी तैनात हैं, तो फिर अवैध बसें क्यों दौड़ रही हैं?

डग्गामार ऑटो किसके संरक्षण में चल रहे हैं?

ओवरलोड ट्रकों को कौन बचा रहा है?

खनन माफिया पर स्थायी कार्रवाई क्यों नहीं होती?

और हर हादसे के बाद सिर्फ औपचारिकता ही क्यों दिखाई देती है?

*कड़वा सत्य*

एटा में प्रशासन का बड़ा हिस्सा अब समस्या का समाधान नहीं, बल्कि समस्या का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है। जनता की सुरक्षा, बच्चों का भविष्य, सरकारी राजस्व और कानून व्यवस्था — सब कुछ अव्यवस्था और कथित मिलीभगत की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है।

जब तक जिम्मेदार अधिकारियों की वास्तविक जवाबदेही तय नहीं होगी, नियमित फील्ड निरीक्षण नहीं होंगे, डग्गामार वाहनों पर स्थायी कार्रवाई नहीं होगी और भ्रष्ट संरक्षण तंत्र नहीं टूटेगा, तब तक एटा की सड़कें यूँ ही मौत का रास्ता बनी रहेंगी।

जनता अब केवल बयान नहीं, कार्रवाई चाहती है।

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