तमिलनाडु का सियासी गतिरोध : क्या संवैधानिक पद भी अब राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुके हैं, आलेख निशा कांत शर्मा

तमिलनाडु का सियासी गतिरोध : क्या संवैधानिक पद भी अब राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुके हैं

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हाल में संपन्न विधानसभा चुनावों के बाद भारतीय राजनीति एक बार फिर उस प्रश्न के सामने खड़ी दिखाई दे रही है, जो पिछले एक दशक से लगातार गहराता जा रहा है—क्या भारत में लोकतांत्रिक संस्थाएं अब केवल औपचारिक संरचनाएँ भर रह गई हैं, जबकि वास्तविक राजनीतिक नियंत्रण कहीं और केंद्रित हो चुका है? सोशल मीडिया पर भाजपा की भारी चुनावी जीत के बाद किया गया यह व्यंग्य—“मोदीजी का बड़प्पन है कि चुनाव करवाने के बाद भाजपा को विजेता दिखाते हैं”—सिर्फ कटाक्ष नहीं, बल्कि उस गहरी लोकतांत्रिक बेचैनी की अभिव्यक्ति है जो आज समाज के एक बड़े हिस्से में दिखाई देने लगी है।

 

लोकतंत्र का मूल तत्व अनिश्चितता होता है। चुनाव इसलिए होते हैं क्योंकि परिणाम पहले से तय नहीं होते। लेकिन जब एक राजनीतिक वातावरण इस तरह निर्मित हो जाए कि चुनाव शुरू होने से पहले ही यह वाक्य सामान्य राजनीतिक सत्य की तरह स्वीकार कर लिया जाए कि “आएगा तो मोदी ही”, तब यह केवल किसी नेता की लोकप्रियता का प्रश्न नहीं रह जाता; यह लोकतांत्रिक मनोविज्ञान के बदल जाने का संकेत बन जाता है। इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि इस मानसिकता को अब सामान्य माना जाने लगा है। जनता का एक बड़ा हिस्सा इस प्रश्न को उठाना भी छोड़ चुका है कि क्या लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया का नाम है, या फिर संस्थागत निष्पक्षता और राजनीतिक समान अवसर का भी।

 

तमिलनाडु की वर्तमान स्थिति इसी व्यापक संदर्भ में देखी जानी चाहिए। वहाँ किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। 243 सदस्यीय विधानसभा में टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और उसे 108 सीटें प्राप्त हुईं। बहुमत के लिए 118 सीटों की आवश्यकता है। कांग्रेस ने अपने पाँच विधायकों के समर्थन की घोषणा कर दी, फिर भी सरकार गठन के लिए कुछ संख्या कम है। भारतीय संसदीय परंपरा में ऐसी स्थिति कोई असामान्य घटना नहीं है। देश ने कई बार त्रिशंकु संसद और विधानसभाएँ देखी हैं। ऐसे अवसरों पर संवैधानिक व्यवहार सामान्यतः यही रहा है कि राज्यपाल या राष्ट्रपति सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का अवसर दें और बहुमत का अंतिम परीक्षण सदन में हो।

 

यही वह संवैधानिक मर्यादा है, जिस पर इस समय तमिलनाडु में विवाद खड़ा हुआ है।

 

टीवीके नेता विजय ने राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश किया। किंतु राज्यपाल द्वारा यह कहना कि पहले समर्थन देने वाले विधायकों के हस्ताक्षर लेकर आइए, कई संवैधानिक प्रश्न खड़े करता है। राज्यपाल का दायित्व यह तय करना नहीं है कि कौन-सा गठबंधन “स्थिर” सिद्ध होगा; उनका दायित्व यह सुनिश्चित करना है कि सदन में बहुमत परीक्षण की प्रक्रिया निष्पक्ष ढंग से हो सके। भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा और अनेक न्यायिक टिप्पणियाँ स्पष्ट करती हैं कि बहुमत का परीक्षण राजभवन में नहीं, विधानसभा के पटल पर होना चाहिए।

 

यही कारण है कि संवैधानिक विशेषज्ञों और विपक्षी दलों द्वारा उठाए जा रहे प्रश्न केवल राजनीतिक आरोप नहीं हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद अभिषेक मनु सिंघवी का यह कहना कि राज्यपाल के पास सबसे बड़े दल को आमंत्रित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, वस्तुतः संवैधानिक व्यवहार की स्थापित परंपरा की ओर संकेत करता है। यदि कोई दूसरा दल या गठबंधन स्पष्ट बहुमत का दावा लेकर सामने नहीं आया है, तो सबसे बड़े दल को अवसर देना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता रहा है।

 

यहीं से राजनीतिक संदेह जन्म लेते हैं। क्योंकि तमिलनाडु के वर्तमान समीकरण में भाजपा प्रत्यक्ष रूप से सत्ता की दौड़ में दिखाई नहीं देती, लेकिन राजनीतिक विमर्श का बड़ा हिस्सा यह मानकर चल रहा है कि राज्यपाल की हिचकिचाहट के पीछे भाजपा की रणनीतिक दिलचस्पी काम कर रही है। यह धारणा अचानक पैदा नहीं हुई। पिछले वर्षों में महाराष्ट्र, गोवा, मध्यप्रदेश, कर्नाटक और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में जो राजनीतिक घटनाक्रम हुए, उन्होंने विपक्षी दलों के भीतर यह विश्वास मजबूत किया है कि चुनाव परिणाम आने के बाद भी सत्ता-समीकरणों को बदला जा सकता है।

 

तमिलनाडु में भी एआईएडीएमके के भीतर संभावित टूट, विधायकों को होटल में ठहराए जाने और विभिन्न गुटों की सक्रियता ने इस आशंका को और हवा दी है। राजनीति में संख्या का खेल केवल वैचारिक समर्थन से नहीं चलता; वह समय, दबाव, रणनीति और अवसरवाद के जटिल संतुलन पर भी निर्भर करता है। यही कारण है कि विपक्षी दल राज्यपाल की निष्क्रियता को केवल प्रक्रियात्मक देरी नहीं, बल्कि राजनीतिक अवसर निर्माण के रूप में देख रहे हैं।

 

इस पूरे परिदृश्य में एक दिलचस्प और महत्वपूर्ण भूमिका डीएमके प्रमुख एम. के. स्टालिन की भी है। उन्होंने विजय को सरकार बनाने देने की बात कहकर राजनीतिक परिपक्वता और संवैधानिक शिष्टाचार दोनों का परिचय दिया है। यह वक्तव्य केवल उदारता नहीं, बल्कि एक गहरी राजनीतिक समझ का भी संकेत है। स्टालिन जानते हैं कि यदि सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने का अवसर नहीं दिया जाता, तो यह तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीतिक संस्कृति के विरुद्ध जाएगा, जो लंबे समय से केंद्र के हस्तक्षेप और “थोपे गए राजनीतिक नियंत्रण” के प्रति संवेदनशील रही है।

 

डीएमके का यह रुख भाजपा-विरोधी राजनीति के व्यापक संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है। वह यह संदेश देना चाहती है कि सत्ता की लड़ाई अपनी जगह है, लेकिन संवैधानिक प्रक्रिया और जनादेश का सम्मान उससे ऊपर होना चाहिए। यह वही नैतिक धरातल है, जिस पर विपक्ष भाजपा और उसके सहयोगी संस्थागत ढांचे की आलोचना करता रहा है।

 

राज्यपाल की भूमिका को लेकर भी एक व्यापक बहस की आवश्यकता है। भारतीय संविधान ने राज्यपाल को संघीय संतुलन का संवैधानिक संरक्षक माना था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह पद लगातार राजनीतिक विवादों का केंद्र बनता गया है। कई राज्यों में राज्यपालों पर आरोप लगे कि वे निर्वाचित सरकारों के समानांतर राजनीतिक शक्ति केंद्र की तरह व्यवहार कर रहे हैं। तमिलनाडु की स्थिति ने इस बहस को और तीखा कर दिया है कि क्या राज्यपाल अब संविधान के निष्पक्ष प्रहरी रह गए हैं, या वे केंद्र की राजनीतिक रणनीति का विस्तार बनते जा रहे हैं।

 

यह भी ध्यान देने योग्य है कि लोकतंत्र केवल संविधान की लिखित धाराओं से नहीं चलता; वह संवैधानिक नैतिकता और परंपराओं से भी संचालित होता है। यदि हर संवैधानिक पद राजनीतिक व्याख्या का औजार बन जाए, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे प्रक्रियात्मक ढांचे में तो बचा रह सकता है, लेकिन उसकी आत्मा कमजोर पड़ने लगती है।

 

तमिलनाडु का यह संकट केवल एक राज्य में सरकार गठन का विवाद नहीं है। यह उस बड़े संक्रमण का हिस्सा है, जिसमें भारतीय लोकतंत्र संस्थागत निष्पक्षता, संघीय संतुलन और राजनीतिक नैतिकता के नए प्रश्नों से जूझ रहा है। चुनाव अभी भी हो रहे हैं, जनता अभी भी वोट डाल रही है, सत्ता अभी भी बदल रही है—लेकिन साथ ही यह आशंका भी बढ़ रही है कि क्या लोकतांत्रिक संस्थाएँ समान रूप से स्वतंत्र और निष्पक्ष बनी हुई हैं।

 

भारतीय लोकतंत्र की शक्ति केवल चुनाव कराने में नहीं, बल्कि हारने वाले को भी यह विश्वास दिलाने में है कि उसके साथ निष्पक्ष व्यवहार हुआ है। जिस दिन यह विश्वास टूटता है, उसी दिन लोकतंत्र केवल प्रक्रिया बनकर रह जाता है, विश्वास नहीं।

 

तमिलनाडु की राजनीति आने वाले दिनों में किस दिशा में जाएगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन इतना निश्चित है कि यह प्रकरण केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं रहेगा; यह भारतीय लोकतंत्र में संवैधानिक मर्यादाओं, राज्यपाल की भूमिका और राजनीतिक नैतिकता पर भविष्य की बहसों का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन चुका है।

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