तमिलनाडु का त्रिशंकु जनादेश : सत्ता, संविधान और ‘माइंड गेम’ की राजनीति, आलेख निशा कांत शर्मा

तमिलनाडु का त्रिशंकु जनादेश : सत्ता, संविधान और ‘माइंड गेम’ की राजनीति

 

पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों से पहले जिस प्रकार पूरे देश की राजनीतिक दृष्टि कोलकाता पर टिकी हुई थी, परिणाम आने के बाद वही उत्सुकता अब तमिलनाडु की ओर मुड़ गई है। कारण केवल यह नहीं कि वहां एक खंडित जनादेश आया है, बल्कि इसलिए भी कि इस जनादेश ने भारतीय संघीय राजनीति, राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका, क्षेत्रीय दलों की प्रासंगिकता और राष्ट्रीय दलों की रणनीतिक बेचैनी—सभी को एक साथ केंद्र में ला खड़ा किया है।

 

234 सदस्यीय तमिलनाडु विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) को 108 सीटें प्राप्त हुई हैं। बहुमत के लिए 117 का आंकड़ा चाहिए। कांग्रेस के पांच विधायकों ने उसे समर्थन पत्र सौंप दिया है और इस प्रकार टीवीके के पास फिलहाल 113 विधायकों का खुला समर्थन माना जा रहा है। दूसरी ओर डीएमके गठबंधन के पास लगभग 54 सदस्य हैं, एआईएडीएमके के साथ लगभग 50 विधायक बताए जा रहे हैं, जबकि शेष विधायक अभी राजनीतिक अनिश्चितता के घेरे में हैं। यही वह बिंदु है जहां तमिलनाडु की राजनीति केवल अंकगणित नहीं रह जाती, बल्कि संवैधानिक व्याख्याओं और राजनीतिक आशंकाओं का जटिल खेल बन जाती है।

 

भारतीय संसदीय लोकतंत्र में यह परंपरा रही है कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में राज्यपाल सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का अवसर देते हैं। यह परंपरा केवल राजनीतिक सुविधा नहीं, बल्कि अनेक न्यायिक टिप्पणियों और संवैधानिक व्यवहार से विकसित हुई है। राष्ट्रपति के रूप में शंकर दयाल शर्मा द्वारा अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का अवसर देना हो, महाराष्ट्र में अल्पमत की स्थिति के बावजूद देवेंद्र फडणवीस को शपथ दिलाना हो, या फिर कर्नाटक के एस. आर. बोम्मई प्रकरण के बाद विकसित संवैधानिक मान्यताएं—इन सभी उदाहरणों ने यह स्थापित किया कि बहुमत का अंतिम परीक्षण सदन के पटल पर होना चाहिए, न कि राजभवन की बंद दीवारों के भीतर।

 

यही कारण है कि तमिलनाडु में उठ रहा यह प्रश्न राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो गया है कि यदि टीवीके सबसे बड़ा दल है और उसके पास समर्थन जुटाने की वास्तविक संभावना भी है, तो उसे सरकार गठन के लिए आमंत्रित करने में संकोच क्यों दिखाई दे रहा है? यह प्रश्न सीधे-सीधे राज्यपाल की संवैधानिक निष्पक्षता और केंद्र-राज्य संबंधों की प्रकृति से जुड़ जाता है। भारतीय राजनीति का यथार्थ यही है कि राज्यपाल की भूमिका अक्सर केवल संवैधानिक नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी देखी जाती है। इसलिए जब किसी राज्य में त्रिशंकु स्थिति बनती है, तो राजभवन स्वतः राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ जाता है।

 

दरअसल, तमिलनाडु की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए केवल संवैधानिक प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं; इसके पीछे चल रहे राजनीतिक “माइंड गेम” को भी समझना होगा। कांग्रेस का टीवीके को समर्थन देना केवल सत्ता-साझेदारी का मामला नहीं है। यह दक्षिण भारत में भाजपा की संभावित राजनीतिक घुसपैठ को रोकने की रणनीति भी है। कांग्रेस ने समर्थन के साथ यह शर्त जोड़कर कि टीवीके किसी “सांप्रदायिक दल” के साथ समझौता नहीं करेगी, वस्तुतः भाजपा को राजनीतिक रूप से अलग-थलग करने का प्रयास किया है। यह संदेश केवल तमिलनाडु के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण है।

 

इसके समानांतर भाजपा की रणनीति को भी समझना होगा। यदि राज्यपाल सबसे बड़े दल को तुरंत आमंत्रित नहीं करते, तो इससे समय का एक ऐसा राजनीतिक अंतराल बनता है जिसमें वैकल्पिक गठबंधनों, दल-बदल और शक्ति-संतुलन की संभावनाएं सक्रिय हो जाती हैं। महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों के अनुभवों ने विपक्षी दलों के भीतर यह धारणा मजबूत की है कि भारतीय राजनीति में सत्ता-निर्माण अब केवल चुनावी परिणामों से तय नहीं होता, बल्कि परिणामों के बाद की रणनीतिक सक्रियता भी उतनी ही निर्णायक होती है।

 

इसी संदर्भ में एआईएडीएमके के संभावित बिखराव और कुछ छोटे दलों के समर्थन की चर्चाएं भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं। यदि टीवीके के पक्ष में अतिरिक्त समर्थन आता है, तो विधानसभा में उसका बहुमत परीक्षण अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। दूसरी ओर सोशल मीडिया पर यह संभावना भी तैर रही है कि डीएमके और एआईएडीएमके जैसी परस्पर विरोधी शक्तियां भाजपा को रोकने के लिए किसी अस्थायी राजनीतिक समझौते की ओर बढ़ सकती हैं। भारतीय राजनीति में वैचारिक विरोध और राजनीतिक व्यावहारिकता का यह द्वंद्व नया नहीं है, लेकिन तमिलनाडु जैसे वैचारिक रूप से सजग राज्य में यह प्रयोग असाधारण माना जाएगा।

 

टीवीके और भाजपा के संभावित संबंधों को लेकर भी अनेक अटकलें हैं। किंतु तमिलनाडु की सामाजिक-राजनीतिक चेतना को देखते हुए यह स्पष्ट है कि विजय की पार्टी यदि दीर्घकालिक राजनीतिक अस्तित्व चाहती है, तो उसे द्रविड़ आंदोलन की मूल संवेदनाओं से बहुत दूर नहीं जाना होगा। पेरियार की वैचारिक विरासत, सामाजिक न्याय की राजनीति और केंद्र के प्रति क्षेत्रीय अस्मिता का भाव तमिलनाडु की राजनीति की आधारशिला रहे हैं। ऐसे में भाजपा के साथ खुला गठबंधन टीवीके के लिए राजनीतिक जोखिम भी बन सकता है। हालांकि भारतीय राजनीति यह भी सिखाती है कि सत्ता के समीकरण कई बार वैचारिक सीमाओं को अप्रासंगिक बना देते हैं। जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और भाजपा का गठबंधन, महाराष्ट्र में अजीत पवार और शिंदे प्रकरण—इन उदाहरणों ने यह स्थापित किया है कि सत्ता की राजनीति अक्सर विचारधारा से अधिक अवसरवाद द्वारा संचालित होती है।

 

कांग्रेस पर लग रहे “डीएमके से विश्वासघात” के आरोपों का भी गहराई से विश्लेषण आवश्यक है। संभव है कि यह पूरा राजनीतिक समीकरण डीएमके की मौन सहमति से आगे बढ़ा हो। एम. के. स्टालिन द्वारा विजय को अवसर देने संबंधी संकेत इसी दिशा की ओर इशारा करते हैं। डीएमके यह समझती है कि यदि टीवीके की सरकार अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरती, तो जनता के सामने पुनः सबसे मजबूत विकल्प वही बनकर उभरेगी। साथ ही कांग्रेस का टीवीके के साथ जाना डीएमके के लिए भाजपा-विरोधी राजनीतिक संतुलन बनाए रखने में भी सहायक हो सकता है।

 

कांग्रेस की अपनी मजबूरियां और आकांक्षाएं भी हैं। तमिलनाडु में लंबे समय से वह सहयोगी दल की भूमिका में सीमित रही है। डीएमके के साथ गठबंधन में रहते हुए भी उसे कभी वास्तविक शक्ति-साझेदारी नहीं मिली। ऐसे में टीवीके जैसी नई पार्टी कांग्रेस को अपने संगठनात्मक पुनर्निर्माण और राजनीतिक स्पेस के विस्तार का अवसर देती दिखाई दे रही है। यह केवल सरकार बचाने या बनाने की राजनीति नहीं, बल्कि भविष्य के तमिलनाडु में अपनी भूमिका पुनर्परिभाषित करने का प्रयास भी है।

 

इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या भारतीय राजनीति अब पूरी तरह “रणनीतिक नैतिकता” के युग में प्रवेश कर चुकी है, जहां हर दल अपने निर्णयों को वैचारिक तर्कों से वैध ठहराने की कोशिश करता है, जबकि वास्तविक लक्ष्य सत्ता-संतुलन होता है? भाजपा हो या कांग्रेस—दोनों के राजनीतिक इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मौजूद हैं जहां विचारधारा और व्यावहारिकता के बीच समझौते हुए हैं। इसलिए किसी एक दल की नैतिकता पर प्रश्न उठाने से पहले भारतीय राजनीति के व्यापक चरित्र को समझना आवश्यक है।

 

तमिलनाडु इस समय केवल सरकार गठन का इंतजार नहीं कर रहा; वह भारतीय लोकतंत्र के उस संक्रमणकाल का प्रतीक बन गया है, जहां जनादेश, संवैधानिक परंपराएं, राज्यपाल की भूमिका, क्षेत्रीय अस्मिता और राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएं—सब एक-दूसरे से टकरा रही हैं। आने वाले दिन केवल यह तय नहीं करेंगे कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा, बल्कि यह भी तय करेंगे कि भारतीय संघवाद की आत्मा कितनी स्वतंत्र है और राजनीति में विचारधारा की वास्तविक सीमा आखिर कहां तक है।

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