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पत्रकारिता जनसेवा है, गुलामी नहीं: मान्यता के नाम पर अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटना बंद हो

*पत्रकारिता जनसेवा है, गुलामी नहीं: मान्यता के नाम पर अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटना बंद हो*

*भारतीय मीडिया फाउंडेशन (National Committee) का कड़ा रुख: संस्थापक एके बिंदुसार ने ‘मान्यता’ की अनिवार्यता को बताया लोकतंत्र पर प्रहार*।।

 

 

 

नई दिल्ली।

भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी के संस्थापक श्री एके बिंदुसार ने बिना मान्यता प्राप्त पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के विरुद्ध की जा रही बयानबाजी और सख्ती की मांग पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि पत्रकारिता का आधार ‘प्रमाण-पत्र’ नहीं, बल्कि ‘सत्यनिष्ठा’ है।

प्रमुख तर्क: जब राजनीति को डिग्री की जरूरत नहीं, तो पत्रकारिता को क्यों?

श्री बिंदुसार ने समाज के दोहरे मापदंडों पर सवाल उठाते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदु रखे हैं:

राजनीति बनाम पत्रकारिता: यदि देश की दिशा तय करने वाले राजनेताओं के लिए किसी विशेष डिग्री या सरकारी मान्यता की आवश्यकता नहीं है, तो जनता की आवाज उठाने वाले पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर पाबंदी क्यों?

पत्रकारिता नौकरी नहीं, जनसरोकार है: पत्रकारिता कोई लाभ का पद या साधारण नौकरी नहीं है, बल्कि यह भ्रष्टाचार के खिलाफ एक संघर्ष है। इसे प्रशासनिक बेड़ियों में बांधना अनुचित है।

हर नागरिक को सच बोलने का हक: भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। सच्चाई उजागर करना किसी सरकारी विभाग के एकाधिकार में नहीं आता।

“फर्जी” शब्द के इस्तेमाल पर सख्त आपत्ति,

श्री बिंदुसार ने उन तत्वों को आड़े हाथों लिया जो बिना मान्यता के काम करने वाले पत्रकारों को “फर्जी” कहकर संबोधित करते हैं। उनके अनुसार:

1. षड्यंत्र का हिस्सा: मान्यता के नाम पर सख्ती की मांग करना असल में उन आवाजों को दबाने की साजिश है जो जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार को उजागर कर रही हैं।

2. उल्टा कार्रवाई की मांग: श्री बिंदुसार ने मांग की है कि जो लोग इस तरह के “घटिया और लोकतंत्र विरोधी” बयान दे रहे हैं, कार्रवाई उनके खिलाफ होनी चाहिए।

ये लोग पत्रकारिता की गरिमा को बचाने के नाम पर उसे सीमित कर रहे हैं।

3. नीयत सर्वोपरि: किसी व्यक्ति की योग्यता उसके द्वारा किए गए जनहित के कार्यों और उसकी नीयत से तय होनी चाहिए, न कि किसी प्लास्टिक कार्ड (ID कार्ड) से।

> “मान्यता और प्रशिक्षण के नाम पर अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाना लोकतंत्र को कमजोर करने की एक नाकाम कोशिश है। हम पत्रकारिता की गरिमा को तबाह करने वाले इन ‘मान्यता-वादी’ ठेकेदारों का विरोध करते हैं।”

> — **श्री एके बिंदुसार** > (संस्थापक, भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कमेटी)

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भारतीय मीडिया फाउंडेशन का यह संदेश स्पष्ट है— पत्रकारिता साहस और सत्य का पथ है। संगठन का मानना है कि यदि कोई पत्रकार या कार्यकर्ता समाज के हित में काम कर रहा है, तो उसे सुरक्षा और सम्मान मिलना चाहिए, न कि कानूनी कार्रवाई का डर।

सत्यमेव जयते!

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