महारास का रहस्य
महारास को लोग नाच समझते हैं, पर यह नाच नहीं है। यह वेद का सार है।
*1. महारास का समय क्यों शरद पूर्णिमा?*
शरद पूर्णिमा साल की सबसे निर्मल रात है। चांद 16 कलाओं से पूरा है। शास्त्र कहता है मन ही चंद्रमा है। जब मन पूरा निर्मल, पूरा शांत हो, तभी परमात्मा उतरता है। इसीलिए कृष्ण ने भादों की अंधेरी रात नहीं, शरद की उजली रात चुनी।
*2. बंशी का रहस्य*
बंशी में गांठ नहीं होती, अंदर खाली होती है। कृष्ण संकेत देते हैं – जैसे बंशी खाली है, तुम भी अहंकार से खाली हो जाओ। जो खाली होगा, उसी में मेरा स्वर बजेगा। गोपियों ने घर नहीं छोड़ा, उन्होंने ‘मैं’ छोड़ा।
*3. जितनी गोपियाँ उतने कृष्ण – इसका अर्थ क्या?*
यही महारास का सबसे बड़ा रहस्य है।
भगवान एक हैं, पर हर भक्त को लगता है मेरे साथ हैं। पति को लगता है भगवान मेरे लिए, पत्नी को लगता है मेरे लिए, ज्ञानी को लगता है ज्ञान में, प्रेमी को लगता है प्रेम में। भगवान किसी एक के नहीं, जो सच्चे मन से बुलाए, उसके हो जाते हैं।
भागवत में लिखा है – *रास में हर गोपी के बीच कृष्ण, पर हर गोपी को लगा कृष्ण मेरे बगल में हैं।*
*4. कृष्ण का गायब होना क्यों?*
जैसे ही गोपियों को लगा – हम श्रेष्ठ हैं, कृष्ण गायब। ये अहंकार का नियम है। भक्ति में थोड़ा सा भी ‘मैं’ आते ही भगवान छिप जाते हैं।
फिर गोपियों ने क्या किया? उन्होंने तर्क नहीं किया, श्राप नहीं दिया। वे रोईं। वही 19 श्लोक का गोपी गीत है। इसका अर्थ है – जब भगवान न मिलें तो रोना ही साधना है।
*5. असली महारास तब शुरू होता है*
जब भगवान लौटे तो उन्होंने कहा – _न पारयेऽहं_ – मैं तुम्हारा ऋणी हूँ।
सोचो, जगत का मालिक कह रहा है मैं ऋणी हूँ। यही भक्ति की जीत है।
फिर उन्होंने एक रात को 6 महीने का कर दिया। विज्ञान कहता है समय सापेक्ष है। प्रेम में समय लंबा हो जाता है, दुख में भी। भगवान ने दिखाया – प्रेम के क्षण में अनंत समा सकता है।
*6. महारास में काम नहीं है*
शुकदेव जी ने पहले ही कहा है – जो इस कथा को काम से सुनेगा, वह नरक जाएगा। जो प्रेम से सुनेगा, उसका काम नष्ट हो जाएगा।
गोपियाँ स्त्री नहीं हैं, वे श्रुतियाँ हैं, ऋषि हैं जिन्होंने जन्मों तक तप किया था। कृष्ण पुरुष नहीं हैं, वे परमात्मा हैं। यह आत्मा और परमात्मा का रमण है।
इसीलिए भागवत सुनने का फल महारास सुनने के बाद ही मिलता है।
*अंत में एक बात:*
महारास आज भी चल रहा है। वृंदावन में आज भी मान्यता है कि हर रात ठाकुर जी रास करते हैं। निधिवन के पत्ते क्यों तुलसी के हो जाते हैं, इसका उत्तर विज्ञान के पास नहीं।
रहस्य यही है – तुम्हें रास में जाना नहीं है, रास तुम्हारे अंदर होना है। जब तुम्हारा मन बंशी सुनकर संसार से हटकर उसकी तरफ दौड़े, समझो तुम्हारा महारास शुरू हो गया।
*राधे-राधे।*
















