“वर्तमान परिप्रेक्ष्य में नारी” पर आयोजित साहित्यिक संगोष्ठी
एटा ; दिनांक 17 अप्रैल 2026 को सायं 5 बजे एक गरिमामयी साहित्यिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसका विषय था— “वर्तमान परिप्रेक्ष्य में नारी”। कार्यक्रम में क्षेत्र के प्रमुख साहित्यकारों, शिक्षाविदों एवं बुद्धिजीवियों ने सहभागिता कर नारी के विविध आयामों पर अपने सारगर्भित विचार प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता आचार्य डॉ. प्रेमी राम मिश्र ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा—
साहित्य अपने समय का दर्पण होता है और नारी के बिना न तो समाज की कल्पना संभव है और न ही साहित्य की। नारी ही सृजन की मूल शक्ति है।हमें नारी के मर्यादामय स्वरूप को बचाये रखने के लिए अपनी प्राचीन संस्कृति से प्राप्त दिशा निर्देशों पर विचार करने की आवश्यकता है। उच्च शिक्षा में भले ही लड़के और लड़कियां एक साथ पढ़ें, किंतु उससे पूर्व की शिक्षा में उनकी शिक्षा व्यवस्था अलग-अलग होनी ही चाहिए। इससे उनके चिंतन और आचरण को अनेक बुराइयों से बचाया जाना संभव हो सकेगा। परिवार में भी यदि उन्हें अच्छे संस्कार और सुविचार प्राप्त होंगे तो वे अनेक कुरीतियों से बचने में सफल हो सकेंगे। शिक्षा के साथ-साथ अच्छे संस्कार और सुविचार भी पल्लवित करने की अत्यंत आवश्यकता है।
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित डॉ. के.पी. सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा—
“वर्तमान समय में नारी ने शिक्षा, विज्ञान, राजनीति और समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। अब आवश्यकता हैम कि उसे समान अवसर और सम्मान मिलते रहें।”नारी विभिन्न रूपों में अपनी भूमिका निभाती है, बहुत कुछ कर सकती है किन्तु सभी कुछ तो नहीं कर सकती।
कार्यक्रम के संचालक ओजकवि श्री बलराम सरस ने अपने ओजपूर्ण शब्दों में कहा—
“नारी केवल संवेदना की प्रतीक नहीं, बल्कि संघर्ष और शक्ति का भी स्वरूप है। समाज को उसकी क्षमता को पहचानना होगा।”
कार्यक्रम के संयोजक डॉ. ओम ऋषि भारद्वाज ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा—
“नारी की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब उसे शिक्षा, समान अधिकार और सामाजिक सुरक्षा पूर्ण रूप से प्राप्त हो। साहित्य के माध्यम से हमें समाज में सकारात्मक चेतना का संचार करना चाहिए।”
समाज सेविका श्रीमती पूनम यादव ने कहा कि सती सावित्री और सीता जैसी नारियों के उदाहरण हमारे सामने हैं, विषम परिस्थितियों में महिलाओं ने इतिहास रचा है।
डॉ ललित कुमार कुलश्रेष्ठ ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि पुरुषों पर जब जब विपत्ति आई है, इतिहास साक्षी है कि नारियों ने बचाया है।
कर्मयोगी श्री रामौतार आर्य जी ने सती प्रथा जैसी कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाने वाले पुरुषों को याद करते हुए कहा कि नारी समाज का मुख्य अंग है।
युवा शिक्षक श्री संजय सिंह ने स्त्रियों की आनुपातिक संख्या कम होने पर अपनी चिंता व्यक्त की, और स्त्री मूर्ति नहीं जीवंत है ऐसे विचार प्रस्तुत किए।
मैनपुरी से पधारी आ. रजनी वर्मा ने महिलाओं के अंतरिक्ष, खेल, राजनीति, नेतृत्व, शासन तथा प्रशासन में सक्रिय होने पर हर्ष व्यक्त करते हुए अभी और भी बहुत ऊँचाई तक जाने का सपना दोहराया। उन्होंने कहा कि अब नारी अबला नहीं, बेचारी नहीं, वह आगे बढ़ रही है।
संगोष्ठी में अन्य विद्वानों ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए। वक्ताओं ने कहा कि नारी आज घर की सीमाओं से निकलकर हर क्षेत्र में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है। परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण में उसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
चर्चा के दौरान यह भी कहा गया कि इतिहास में नारी को अनेक सामाजिक बंधनों का सामना करना पड़ा, किन्तु वर्तमान समय में शिक्षा और जागरूकता के कारण उसकी स्थिति में व्यापक सुधार हुआ है।
वक्ताओं ने नारी के विविध रूपों—माँ, बहन, पत्नी एवं एक स्वतंत्र व्यक्तित्व—पर प्रकाश डालते हुए उसके त्याग, संघर्ष और उपलब्धियों को रेखांकित किया। साथ ही यह भी कहा गया कि समाज में व्याप्त कुरीतियों, भेदभाव और असमानता को समाप्त कर नारी को पूर्ण समानता प्रदान करना समय की आवश्यकता है।
कार्यक्रम के अंत में डॉ ओम ऋषि भारद्वाज द्वारा सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया गया। यह संगोष्ठी सामाजिक जागरूकता और सकारात्मक चिंतन की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास सिद्ध हुई।विषय: “वर्तमान परिप्रेक्ष्य में नारी” पर आयोजित साहित्यिक संगोष्ठी
एटा ; दिनांक 1च5 अप्रैल 2026 को सायं 5 बजे एक गरिमामयी साहित्यिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसका विषय था— “वर्तमान परिप्रेक्ष्य में नारी”। कार्यक्रम में क्षेत्र के प्रमुख साहित्यकारों, शिक्षाविदों एवं बुद्धिजीवियों ने सहभागिता कर नारी के विविध आयामों पर अपने सारगर्भित विचार प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता आचार्य डॉ. प्रेमी राम मिश्र ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा—
“साहित्य अपने समय का दर्पण होता है और नारी के बिना न तो समाज की कल्पना संभव है और न ही साहित्य की। नारी ही सृजन की मूल शक्ति है।”
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित डॉ. के.पी. सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा—
“वर्तमान समय में नारी ने शिक्षा, विज्ञान, राजनीति और समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। अब आवश्यकता है कि उसे समान अवसर और सम्मान मिलते रहें।”नारी विभिन्न रूपों में अपनी भूमिका निभाती है, बहुत कुछ कर सकती है किन्तु सभी कुछ तो नहीं कर सकती।
कार्यक्रम के संचालक ओजकवि श्री बलराम सरस ने अपने ओजपूर्ण शब्दों में कहा—
“नारी केवल संवेदना की प्रतीक नहीं, बल्कि संघर्ष और शक्ति का भी स्वरूप है। समाज को उसकी क्षमता को पहचानना होगा।”
कार्यक्रम के संयोजक डॉ. ओम ऋषि भारद्वाज ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा—
“नारी की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब उसे शिक्षा, समान अधिकार और सामाजिक सुरक्षा पूर्ण रूप से प्राप्त हो। साहित्य के माध्यम से हमें समाज में सकारात्मक चेतना का संचार करना चाहिए।”
समाज सेविका श्रीमती पूनम यादव ने कहा कि सती सावित्री और सीता जैसी नारियों के उदाहरण हमारे सामने हैं, विषम परिस्थितियों में महिलाओं ने इतिहास रचा है।
डॉ ललित कुमार कुलश्रेष्ठ ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि पुरुषों पर जब जब विपत्ति आई है, इतिहास साक्षी है कि नारियों ने बचाया है।
कर्मयोगी श्री रामौतार आर्य जी ने सती प्रथा जैसी कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाने वाले पुरुषों को याद करते हुए कहा कि नारी समाज का मुख्य अंग है।
युवा शिक्षक श्री संजय सिंह ने स्त्रियों की आनुपातिक संख्या कम होने पर अपनी चिंता व्यक्त की, और स्त्री मूर्ति नहीं जीवंत है ऐसे विचार प्रस्तुत किए।
मैनपुरी से पधारी आ. रजनी वर्मा ने महिलाओं के अंतरिक्ष, खेल, राजनीति, नेतृत्व, शासन तथा प्रशासन में सक्रिय होने पर हर्ष व्यक्त करते हुए अभी और भी बहुत ऊँचाई तक जाने का सपना दोहराया। उन्होंने कहा कि अब नारी अबला नहीं, बेचारी नहीं, वह आगे बढ़ रही है।
संगोष्ठी में अन्य विद्वानों ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए। वक्ताओं ने कहा कि नारी आज घर की सीमाओं से निकलकर हर क्षेत्र में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है। परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण में उसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
चर्चा के दौरान यह भी कहा गया कि इतिहास में नारी को अनेक सामाजिक बंधनों का सामना करना पड़ा, किन्तु वर्तमान समय में शिक्षा और जागरूकता के कारण उसकी स्थिति में व्यापक सुधार हुआ है।
वक्ताओं ने नारी के विविध रूपों—माँ, बहन, पत्नी एवं एक स्वतंत्र व्यक्तित्व—पर प्रकाश डालते हुए उसके त्याग, संघर्ष और उपलब्धियों को रेखांकित किया। साथ ही यह भी कहा गया कि समाज में व्याप्त कुरीतियों, भेदभाव और असमानता को समाप्त कर नारी को पूर्ण समानता प्रदान करना समय की आवश्यकता है। स्पृहा भारद्वाज, कृष भारद्वाज, वैष्णव कुलश्रेष्ठ, लवी कुलश्रेष्ठ, श्रीमती उज्ज्वल सहाय आदि ने श्रोता रूप में सहभागिता की।
कार्यक्रम के अंत में डॉ ओम ऋषि भारद्वाज द्वारा सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया गया। यह संगोष्ठी सामाजिक जागरूकता और सकारात्मक चिंतन की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास सिद्ध हुई।की।






