पत्रकारिता-मिशन से बाजार तक?
कभी पत्रकारिता सिर्फ एक पेशा नहीं, सच के लिए खड़े होने का साहस हुआ करती थी। पत्रकार की पहचान किसी कार्ड, कैमरे या माइक से नहीं, बल्कि उसकी ईमानदार कलम, पक्के तथ्यों और जनता के विश्वास से होती थी।
आज डिजिटल दौर ने हर हाथ में कैमरा और हर आवाज़ को मंच दे दिया है। यह बदलाव अच्छी बात है, लेकिन कैमरा पकड़ लेना पत्रकारिता नहीं है। माइक आवाज़ बढ़ा सकता है, कैमरा तस्वीर दिखा सकता है और प्रेस कार्ड पहचान बता सकता है, मगर सच्चाई की गारंटी नहीं दे सकता।
असली पत्रकार वह है जो खबर को सनसनी बनाने से पहले उसकी सच्चाई तलाशे, आरोप लगाने से पहले तथ्य देखे और लिखने से पहले यह सोचे कि उसके शब्दों का असर किस पर पड़ेगा। व्यूज़ और लाइक्स की भूख अगर खबर पर हावी हो जाए, तो पत्रकारिता की आत्मा कमजोर पड़ने लगती है।
व्यवस्था से सवाल करना पत्रकारिता है, भ्रष्टाचार को उजागर करना पत्रकारिता है, जनता की आवाज़ बनना पत्रकारिता है। लेकिन किसी की मजबूरी को तमाशा बनाना, दबाव बनाना या निजी लाभ के लिए खबर का इस्तेमाल करना पत्रकारिता नहीं हो सकता।
आज जरूरत पत्रकारिता के दरवाजे बंद करने की नहीं, बल्कि उसकी गरिमा, मर्यादा और विश्वसनीयता बचाने की है। नए लोग आएं, आगे बढ़ें और डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करें, लेकिन पत्रकारिता की बुनियाद सच, संयम और जिम्मेदारी ही रहनी चाहिए।
क्योंकि माइक खरीदा जा सकता है, कैमरा खरीदा जा सकता है, स्टूडियो बनाया जा सकता है, लेकिन जनता का विश्वास खरीदा नहीं जा सकता।
और जब यही विश्वास टूटता है, तो स्क्रीन पर चेहरे और कैमरे तो बहुत दिखाई देते हैं, मगर सच की आवाज़ धीरे-धीरे खोने लगती है।
सवाल सिर्फ इतना है, हम पत्रकारिता को आने वाली पीढ़ी के लिए एक सम्मानित विरासत बनाएंगे या उसे व्यूज़ और मुनाफे की दुकान बनने देंगे?
मोहम्मद सैफ साबरी
















