भदावर की माटी और अक्षर पुरुष का महान संकल्पएक, आलेख शंकर देव तिवारी

भदावर की माटी और अक्षर पुरुष का महान संकल्पएक कालखंड ऐसा भी था जब यमुना और चम्बल की लहरों के बीच बसा भदावर क्षेत्र किसी और ही कारण से जाना जाता था। भौगोलिक विषमताओं और सामाजिक उपेक्षा के कारण इस क्षेत्र की माटी में बंदूकें और बागी पनपते थे। जब व्यवस्थाएं कानून के दम पर इस बागीपन को दबाने में विफल हो रही थीं, तब इसी भदावर की भूमि पर एक युगपुरुष का अवतरण हुआ, जिन्हें इतिहास ‘अक्षर पुरुष’ पं. बनवारी लाल तिवारी के नाम से स्मरण करता है। उन्होंने समझा कि इस धरती की समस्या हथियारों की नहीं, बल्कि शिक्षा के अभाव की है। उन्होंने बीहड़ों के इस सन्नाटे को गोलियों की गूंज से नहीं, बल्कि ककहरे और वर्णमाला की गूंज से बदलने का एक अप्रतिम संकल्प लिया।तिवारी जी की शिक्षा प्रणाली और उनका सेवा भाव अनूठा था। जब भी कोई पढ़ा-लिखा युवा या उनका शिष्य काम की तलाश में उनके सम्मुख पहुंचता, तो वे उसे कोई नौकरी या धन नहीं देते थे। वे अपने पास से धरोहर के रूप में चार बेंच और दो कुर्सियां सौंपते थे। उनका एक ही आदेश होता था—”फलां गांव या ठिकाने पर जाओ, वहां चौपाल पर या पेड़ की छांव में स्कूल खोलो और बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दो।” यह केवल रोज़गार का जरिया नहीं था, बल्कि भदावर की तकदीर बदलने के लिए शुरू किया गया एक महा-अभियान था। इसी ‘विद्या दान अभियान’ के कारण बाह, जैतपुर, पिनाहट समेत न जाने कितने सुदूर और दुर्गम गांवों में ज्ञान के मंदिर खड़े हो गए।स्वाभिमान की पाठशाला और आधुनिक विडंबनापं. बनवारी लाल तिवारी जी के इस अभियान में स्वदेशी और स्वाभिमान कूट-कूट कर भरा था। देश की आज़ादी से पहले, जब उनके द्वारा स्थापित विद्यालयों की ख्याति बढ़ने लगी, तो तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत ने उन पर सरकारी मान्यता लेने के लिए भारी दबाव बनाया। लेकिन इस अक्षर पुरुष के तेवर अलग थे। उन्होंने विदेशी दासता की शर्तों पर झुककर आज़ादी से पहले अंग्रेज़ी सरकार से मान्यता लेना स्वीकार नहीं किया। वे मानते थे कि शिक्षा पर पहला अधिकार समाज का है, किसी शोषक सत्ता का नहीं। वे इस अभियान को आगे बढ़ाते गए और अंततः ‘भदावर विद्या मंदिर’ को एक प्रतिष्ठित डिग्री कॉलेज के शिखर तक ले गए। सबसे अद्भुत बात यह थी कि जैसे ही कोई स्कूल आत्मनिर्भर और सफल होता, वे उसे वहीं के स्थानीय प्रबंधकों और समाज को सौंपकर स्वयं अगले गांव में नई अलख जगाने निकल पड़ते थे।आज हम एक स्वतंत्र राष्ट्र में सांस ले रहे हैं। लेकिन अत्यंत पीड़ा का विषय है कि वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्थाएं औपचारिकता और कागज़ी नियमों के फेर में पड़कर उन ऐतिहासिक धरोहरों की आत्मा को चोट पहुंचा रही हैं। वर्तमान में शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act, 2009) की धारा 18 के कड़े प्रावधानों और उत्तर प्रदेश शासन द्वारा समय-समय पर जारी ‘गैर-मान्यता प्राप्त विद्यालयों के खिलाफ धरपकड़ और बंदी अभियान’ के शासकीय आदेशों के तहत इन पारंपरिक पाठशालाओं पर भी बंद होने का संकट मंडरा रहा है। आज़ादी के इतने दशकों बाद, केवल अव्यावहारिक मानकों और कागज़ी ‘मान्यता’ के बहाने इन सेवाभावी ग्रामीण विद्यालयों को बंद कराने के जो अभियान चलाए जाते हैं, वे निश्चित रूप से उस महान शिक्षा शास्त्री की आत्मा को गहरे कष्ट पहुंचाते होंगे। जो विद्यालय किसी दौर में बिना किसी सरकारी मदद के समाज को सुधारने का जरिया बने, उन्हें आज कागज़ के चंद टुकड़ों के लिए कटघरे में खड़ा कर देना न्यायसंगत नहीं है।नीतिगत सुझाव: दमन नहीं, संवर्धन करे सरकारसरकार और समाज को यह समझने की आवश्यकता है कि शिक्षा केवल कंक्रीट की बहुमंजिला इमारतों या भारी-भरकम फीसों से नहीं चलती। शिक्षा चलती है शिक्षक के समर्पण और राष्ट्र निर्माण की भावना से। इस संबंध में शासन को व्यवस्था में सुधार हेतु निम्नलिखित सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए:मानकों में शिथिलता: शासन को RTE नियमावली और इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम के भूमि एवं ढांचागत मानकों में उन सुदूर ग्रामीण विद्यालयों के लिए विशेष छूट (शिथिलता) देनी चाहिए जो दशकों से निरंतर ज्ञान दान कर रहे हैं।एकमुश्त वित्तीय सहायता: ‘अक्षर पुरुष’ के सिद्धांतों के अनुरूप काम कर रहे इन स्कूलों को बंद करने के बजाय सरकार को विशेष अनुदान देकर इनके ढांचे को मजबूत करना चाहिए।दंडात्मक के बजाय सुधारात्मक रुख: शिक्षा विभाग को सीधे विद्यालय बंदी या जुर्माने का आदेश जारी करने के बजाय एक ‘हैंडहोल्डिंग’ नीति अपनानी चाहिए, जिसके तहत एक निश्चित समयसीमा देकर विभागीय अधिकारी स्वयं इन स्कूलों की कमियों को दूर करवाकर उन्हें मान्यता की मुख्यधारा में लाएं।हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि यदि शिक्षा का यह प्रकाश धीमा पड़ा, तो अज्ञानता का अंधकार फिर से पैर पसारेगा। चम्बल के इस भदावर अंचल को हमें पुनः ‘बागियों की फसल’ से आबाद नहीं होने देना है। बीहड़ के युवाओं को बंदूकों की तरफ मुड़ने से रोकने का एकमात्र अचूक अस्त्र ‘अक्षर ज्ञान’ ही है। अतः शासन-प्रशासन को औपचारिकता की बेड़ियों को तोड़कर इन पारंपरिक शिक्षा केंद्रों को गले लगाना चाहिए, ताकि भदावर की भूमि पर ज्ञान की अलख सदैव देदीप्यमान रहे।

Leave a Comment