बाह:
फाइलों के बीहड़ में उलझा एक अभागा क़स्बा
शंकर देव तिवारी
‘मेरी अपनी बाह’ – सचमुच अनाथ है!मेरी अपनी बाह, जिसका दूर-दूर तक कोई धनी-धोरी नज़र नहीं आता। यहाँ पानी के नाम पर सूखी नालियां मुंह बाए खड़ी हैं और बरसात या गंदे पानी की निकासी एक रहस्य बनकर रह गई है। यहाँ की सड़कें तहसील के आसपास तालाब या दलदल का भ्रम पैदा करती हैं, जिन्हें देखकर शायद राहगीर भी भूल जाएं कि वो सड़कों पर चल रहे हैं या किसी दल-दल में।वन विभाग का पहरा और योजनाओं का वनवासवाह रे वन विभाग! इस महकमे की आड़ में दर्जनों विकास योजनाएं ऐसी परमिशन की चक्की में पिसी हैं कि सालों से अधर में लटकी हैं। लगता है बाह के विकास और वन विभाग के बीच सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का ऐसा ‘चूहा-बिल्ली’ का खेल चल रहा है, जिसका नतीजा सिर्फ ‘शून्य’ है。अर्जुन तो हैं, पर खेल का मैदान कहाँ?इस तहसील में एक-दो नहीं, बल्कि कई ‘अर्जुन’ खेल की दुनिया में चमक रहे हैं, लेकिन उन अर्जुन को अभ्यास करने के लिए एक अदना सा खेल का मैदान तक नसीब नहीं! खेल प्रतिभाएं सुविधाओं के अभाव में दम तोड़ रही हैं।अस्पताल का अभाव और दबंगई की दास्तानहद तो तब हो गई जब तहसील में बना-बनाया, चालू महिला अस्पताल ही खत्म कर दिया गया। आम जनता स्वास्थ्य सेवाओं के लिए तरस रही है, लेकिन प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। यहाँ दबंगई तो सबने देखी थी, लेकिन अब तो ‘नंगाई’ भी सड़कों पर नाचती दिखती है। ‘जय भोले की स्थली’ कहे जाने वाले इस क्षेत्र को सिस्टम ने असहाय धंधे की एक स्कीम बनाकर रख दिया है।पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य… खलनायक कौन?आम जन को अब अच्छी तरह समझ आ चुका है कि बाह के विकास में खलनायक कौन है। पेयजल, शिक्षा, खेल, स्वास्थ्य और वन विभाग का सुप्रीम कोर्ट के आदेश के चलते विकास में बाधक बनना, या सिस्टम की आड़ में इन बाधाओं को ढाल बना लेना यहाँ कोई नई बात नहीं है।सिस्टम के नाम पर ‘शून्य’ का सन्नाटापुलिस और डाकुओं की तकरार कब शांत हुई, यह तो कोई नहीं बता सकता, लेकिन बाह की बदहाली की कहानी जस की तस बनी हुई है। ऐसा लगता है कि यहाँ के हुक्मरानों का एक ही नारा है—”योजनाएं बनाओ, कागजों में उलझाओ, और आम जनता को भगवान भरोसे छोड़ जाओ।” बाह की इस बेबसी को देखकर बस यही निकलता है—वाह रे सिस्टम, वाह!
दिल खुश हो गया
गंगा नहा ली
अपनी गली में
नदी बहा दी
बधाई









