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वैभव खेला तो और रिकॉर्ड टूटेंगे, पुरोधाओं को डर
शंकर देव तिवारी
प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती, फिर भी चयन में बंद दरवाज़ों के पीछे की असल कहानी यही है कि कोई भी स्थापित व्यवस्था अपने शीर्ष स्तंभों को इतनी जल्दी हिलते हुए नहीं देखना चाहती。 वैभव का बाहर बैठना इस बात का प्रमाण है कि क्रिकेट में ‘योग्यता’ से ज्यादा ‘चयन की राजनीति’ भारी पड़ रही है。
वैभव सूर्यवंशी को भारतीय प्लेइंग-XI में मौका न मिलने के पीछे एक दबी-छिपी चिंता क्रिकेट के पुरोधाओं के रिकॉर्ड के टूटने की भी है。 महज़ 15 साल की उम्र में इस बिहारी सितारे ने ब्रैडमैन और गेल जैसे दिग्गजों को भी पीछे छोड़ दिया है。 यदि वह लगातार खेलते हैं, तो क्रिकेट के भगवान का रुतबा भी दांव पर लग सकता है。वैभव का न खिलना: कीर्तिमानों का भय और दिल्ली-मुंबई की लॉबीक्रिकेट का इतिहास हमेशा शानदार रहा है, लेकिन जब कोई ‘अंडरडॉग’ (कमज़ोर या नए क्षेत्र से आया खिलाड़ी) दिग्गजों के दशकों पुराने रिकॉर्ड्स को पल भर में ध्वस्त कर देता है, तो स्थापित लॉबी में बेचैनी स्वाभाविक है。 वैभव सूर्यवंशी ने अंतरराष्ट्रीय और घरेलू स्तर पर जो तांडव मचाया है, उसने बड़े-बड़े धुरंधरों को सकते में डाल दिया है。दिग्गजों के सिंहासन पर ख़तरा: ब्रैंडमैन की औसत हो या क्रिस गेल के सबसे तेज़ शतक या सबसे अधिक छक्कों का रिकॉर्ड—वैभव ने अपनी 11 गेंदों में अर्धशतक जैसी पारियों से सभी को बौना साबित कर दिया है。 ऐसे में, यदि इस 15 वर्षीय बालक को लगातार खेलने दिया गया, तो ‘क्रिकेट के भगवान’ के रूप में स्थापित छवि और उनके अटूट रिकॉर्ड्स का किला भी दरक सकता है。मुंबई बनाम दिल्ली, अब बिहार बनाम ‘कौन?’: भारतीय क्रिकेट का पावर-सेंटर (सत्ता केंद्र) हमेशा से मुंबई और दिल्ली के इर्द-गिर्द घूमता रहा है。 इन महानगरों की लॉबी का प्रभाव चयन से लेकर मीडिया तक साफ झलकता है。 अब प्रश्न यह उठ रहा है कि क्या बिहार की माटी से उपजा यह ‘बिहारी लाल’ अपनी प्रतिभा के दम पर इस वर्चस्व को तोड़ देगा? यह संघर्ष अब सिर्फ मैदान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था और प्रतिभा के बीच का एक छिपा हुआ युद्ध बन गया है。









