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क्या जलवायु परिवर्तन अब निर्णायक मोड़ पर है? –डा० संजय राणा

झुलसता यूरेशिया: एशिया और यूरोप में बढ़ती भीषण गर्मी

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क्या जलवायु परिवर्तन अब निर्णायक मोड़ पर है? –डा० संजय राणा

 

एक समय था जबकि विश्व के धनाढ्य लोग गर्मी की छुट्टी मनाने यूरोप जाया करते थे, मगर वर्तमान समय में पृथ्वी का मौसम तेजी से बदल रहा है और इसके संकेत अब किसी एक देश या महाद्वीप तक सीमित नहीं रह गए हैं। वर्ष 2026 की गर्मियों में एशिया और यूरोप दोनों अभूतपूर्व हीटवेव (लू) की चपेट में हैं। भारत, पाकिस्तान, चीन और मध्य एशिया के साथ-साथ फ्रांस, स्पेन, इटली, जर्मनी, ब्रिटेन, पोलैंड, बेल्जियम, नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया और बाल्कन क्षेत्र के अनेक देशों में तापमान सामान्य से कई डिग्री अधिक दर्ज किया जा रहा है। कहीं 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक तापमान पहुँच रहा है, तो कहीं गर्मी ने दशकों पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। यह स्थिति केवल असामान्य मौसम नहीं, बल्कि पृथ्वी की बदलती जलवायु का गंभीर संकेत है। जिसका परिणाम यह है कि जून के महा में यूरोप में 1300 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। वहीं विश्व स्वास्थ संगठन की मानें तो वर्ष 2000 से 2019 के दौरान प्रति वर्ष 4.89 लाख लोग गर्मी से उत्पन्न विभिन्न बीमारियों का शिकार होते हुए मृत्यु के आगोश में चले गए। उनमें से लगभग 45 प्रतिशत एशिया मूल के रहे, वहीं 36 प्रतिशत यूरोपीय देशों के लोग थे।

 

यूरोप और एशिया भौगोलिक रूप से अलग महाद्वीप अवश्य माने जाते हैं, किंतु वास्तव में वे यूरेशिया नामक एक विशाल भूभाग का हिस्सा हैं। जब इस पूरे भूभाग के ऊपर वायुमंडलीय परिसंचरण में व्यापक परिवर्तन होता है, तो उसका प्रभाव हजारों किलोमीटर तक फैल जाता है। यही कारण है कि एक ही समय में भारत में भीषण लू चल रही होती है और पश्चिमी यूरोप भी उस दौरान असहनीय गर्मी से जूझ रहा होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस स्थिति के पीछे कई कारण एक साथ कार्य कर रहे हैं। सबसे प्रमुख कारण मानवीय गतिविधियों से बढ़ी ग्रीनहाउस गैसें हैं, जिन्होंने पृथ्वी के औसत तापमान को लगातार बढ़ाया है। कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और अन्य गैसें वातावरण में ऊष्मा को रोक रही हैं, जिससे पृथ्वी का ताप संतुलन बिगड़ रहा है। इसके साथ ही जेट स्ट्रीम का कमजोर और अधिक लहरदार होना, लंबे समय तक उच्च वायुदाब (हीट डोम) का बने रहना, मिट्टी का सूखना तथा समुद्रों का लगातार गर्म होना हीटवेव को अधिक तीव्र और लंबा बना रहे हैं।

 

यूरोप में भूमध्य सागर का बढ़ता तापमान और आर्कटिक क्षेत्र का तेज़ी से गर्म होना भी मौसम प्रणाली को प्रभावित कर रहा है। जब जेट स्ट्रीम धीमी पड़ जाती है, तो बादल नहीं बनते, वर्षा नहीं होती और कई दिनों तक लगातार तेज धूप पड़ती रहती है। परिणामस्वरूप तापमान नए रिकॉर्ड स्थापित करता है। यही स्थिति एशिया के अनेक क्षेत्रों में भी देखने को मिल रही है। इस भीषण गर्मी का प्रभाव केवल तापमान तक सीमित नहीं है। जंगलों में आग की घटनाएँ बढ़ रही हैं, जलस्रोत सूख रहे हैं, कृषि उत्पादन प्रभावित हो रहा है, बिजली की मांग बढ़ रही है और हीट स्ट्रोक से लोगों की जान तक जा रही है। बच्चों, बुज़ुर्गों, श्रमिकों और गरीब तबकों पर इसका प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है। यह केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और सामाजिक न्याय का भी संकट है। महत्वपूर्ण बात यह है कि वैज्ञानिक अब केवल भविष्य की चेतावनी नहीं दे रहे, बल्कि वे यह भी बता रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव वर्तमान में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।

 

हालांकि यह कहना उचित नहीं होगा कि संकट अपने अंतिम या “चरम” बिंदु पर पहुँच चुका है, क्योंकि यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन नहीं घटा तो आने वाले दशकों में परिस्थितियाँ और अधिक गंभीर हो सकती हैं। अर्थात आज जो हीटवेव हमें असाधारण लग रही है, वह भविष्य में सामान्य बन सकती है। ऐसी परिस्थिति में केवल सरकारों की नीतियाँ पर्याप्त नहीं होंगी। ऊर्जा के स्वच्छ स्रोतों को अपनाना, जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना, जल संरक्षण, वनों का संरक्षण, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण, शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाना तथा जलवायु के अनुकूल विकास मॉडल अपनाना समय की आवश्यकता है। साथ ही प्रत्येक नागरिक को भी अपनी जीवनशैली में ऐसे परिवर्तन करने होंगे, जिनसे कार्बन उत्सर्जन कम हो।

 

आज एशिया और यूरोप का एक साथ झुलसना पूरी मानवता के लिए एक गंभीर चेतावनी है। प्रकृति यह संकेत दे रही है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बिगड़ चुका है। यदि हमने अभी भी विज्ञान की चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल अधिक गर्म पृथ्वी ही नहीं, बल्कि जल, खाद्य और स्वास्थ्य संकटों से घिरी दुनिया विरासत में पाएँगी। जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की आशंका नहीं, वर्तमान की वास्तविकता है। प्रश्न यह नहीं कि पृथ्वी बदल रही है; प्रश्न यह है कि क्या हम समय रहते अपने व्यवहार और विकास की दिशा बदल पाएँगे। वैसे लगता तो नहीं कि हम बदल पाएंगे, फिर भी आओ प्रकृति की ओर लौटें।

( लेखक एस्रो के निदेशक एवं पर्यावरणविद हैं।)

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