आज़ की बात
वादों के मैदान में फाइलों का फुटबॉल मैच, दीर्घा में बैठी हाफती जनता
शंकर देव तिवारी

कहते हैं कि खेल स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है, शायद इसीलिए हमारे माननीय जनप्रतिनिधियों ने क्षेत्र के विकास को ही एक खेल बना दिया है। युवाओं के पैरों में असली फुटबॉल आए न आए, लेकिन एक अदद मिनी स्टेडियम की योजना बीते कई सालों से राजनीति के मैदान में बेहतरीन फुटबॉल बनी हुई है। नेताजी अपनी तरफ से वादों की ऐसी जोरदार किक मारते हैं कि गेंद सीधे जनता की उम्मीदों के गोलपोस्ट के पास जाकर हवा में गायब हो जाती है। जनता बेचारी मैदान के बाहर दर्शक दीर्घा में बैठी हर पांच साल में तालियां बजाने और अगले पांच साल तक सिर्फ इंतजार करने के लिए अभिशप्त है।
चुनावी बूट और अंतहीन ड्रिब्लिंग
साल 2017 के पहले हाफ में जब जनप्रतिनिधि महोदय ने जीत की ट्रॉफी उठाई, तो उन्होंने योजना के प्रति ऐसा ‘सहानुभूतिपूर्ण पास’ दिया कि लगा बस अगले ही महीने मैदान सज जाएगा। वक्त का रेफरी सीटी बजाता रहा और 2022 का दूसरा हाफ भी आ गया। नेताजी फिर जीते और इस बार उनकी ड्रिब्लिंग और शानदार हो गई। अब वे भरे मंच से घोषणा करते हैं कि ‘योजना हम ही लाएंगे, गोल हम ही दागेंगे।’ मगर खेल प्रेमियों की त्रासदी देखिए कि मैच के इतने साल बीत जाने के बाद भी इस योजना का ‘श्रीगणेश’ यानी कि किक-ऑफ तक नहीं हो सका है।
अधिकारियों की सीटी और कागजी फाउल
इस खेल का सबसे दिलचस्प पहलू तब सामने आया जब खेल निदेशक आर पी सिंह और खेल मंत्री गिरीश यादव ने अपनी प्रशासनिक सीटी बजाई। उन्होंने साफ किया कि सरकार के पाले से तो नुशर ब्लॉक और तहसील स्तर के मिनी स्टेडियमों की फाइल बहुत पहले ही पास की जा चुकी है। नियम सरल था—माननीय को सिर्फ जिलाधिकारी के जरिए एक अदद मैदान (जमीन) का पता बताना था और प्रस्ताव को आगे बढ़ाना था। यानी गेंद पूरी तरह से जनप्रतिनिधियों के पाले में थी, लेकिन वे इसे गोलपोस्ट तक ले जाने के बजाय दफ्तरों के गलियारों में टाइम-पास (समय की बर्बादी) करते रहे।
रास्ते के बिना ‘अर्श से फर्श’ का हवाई शॉट
जब जनता कागजी टेंडरों और बजट स्वीकृत होने के हवाई दावों पर झूम रही थी, तब कानून के एक खिलाड़ी वकील अनिल गुप्ता जी ने आरटीआई और कागजातों की मदद से इस खेल का एक बड़ा ‘फाउल’ पकड़ लिया। अधिकारियों से जब हकीकत जानी गई, तो पता चला कि जिस जमीन पर युवाओं के भविष्य की इमारत खड़ी होनी थी, वहां तक पहुंचने का कोई रास्ता ही नहीं है। यानी बिना रास्ते की बंजर जमीन को योजना का केंद्र बना दिया गया। नतीजा यह हुआ कि जो योजना दावों के आसमान पर ‘अर्श’ पर उड़ रही थी, वह हकीकत के धरातल पर आते ही ‘फर्श’ पर औंधे मुंह गिर पड़ी।
कैबिनेट का नया चक्रव्यूह और अगले सत्र की तारीख
जब बिना रास्ते की जमीन का सच उजागर हुआ, तो रेफरी ने रेड कार्ड दिखाने की तैयारी कर ली। लेकिन राजनीति के खिलाड़ी आसानी से हार कहां मानते हैं? अब जनता को ‘रीवाइज प्रस्ताव’ और ‘कैबिनेट मंजूरी’ जैसे भारी-भरकम तकनीकी शब्दों का नया पास दिया जा रहा है। वर्तमान सत्र की समय-सीमा समाप्त हो चुकी है और खुद दिग्गजों की मौजूदगी में यह तय हो चुका है कि इस सत्र में अब कुछ नहीं होने वाला। युवाओं को अब ‘अगले सत्र’ का एक नया लॉलीपॉप थमा दिया गया है।
मैच का परिणाम: स्कोरबोर्ड पर शून्य
शासन की नीतियां तैयार हैं, मंत्रियों की हरी झंडी है, लेकिन स्थानीय इच्छाशक्ति के अभाव ने इस खेल को एक अंतहीन तमाशा बना दिया है। बजट स्वीकृत होने के ढोल तो जोर-शोर से पीटे जा रहे हैं, मगर धरातल पर काम का स्कोरबोर्ड आज भी शून्य पर अटका है। देखना यह है कि अगले सत्र में यह फुटबॉल हकीकत का कोई आकार लेती है, या फिर आने वाले चुनावों में एक बार फिर इसी अधूरी योजना के नाम पर जनता को दर्शक बनाकर एक नया मैच खेला जाएगा।













