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लोकतंत्र का चौथा स्तंभ: भारतीय मीडिया का सशक्तिकरण, प्रमुख माँगें और ए.के. बिंदुसार का विज़न

*लोकतंत्र का चौथा स्तंभ: भारतीय मीडिया का सशक्तिकरण, प्रमुख माँगें और ए.के. बिंदुसार का विज़न।*

 

लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका

लोकतंत्र के चार प्रमुख स्तंभ—कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और मीडिया (प्रेस)—देश की लोकतांत्रिक संरचना को संतुलित रखते हैं। मीडिया को ‘लोकतंत्र का चौथा स्तंभ’ माना जाता है क्योंकि यह जनता की आवाज़ को शासन तक पहुँचाने और शासन की नीतियों का निष्पक्ष विश्लेषण कर नागरिक चेतना को जागृत करने का कार्य करता है।

हाल के वर्षों में डिजिटल क्रांति, वित्तीय असुरक्षा, स्वतंत्र पत्रकारिता पर बढ़ते दबाव और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के कारण मीडिया क्षेत्र कई समस्याओं से जूझ रहा है। मीडिया को सशक्त बनाए बिना एक पारदर्शी और भ्रष्टाचार-मुक्त लोकतंत्र की कल्पना असंभव है।

मीडिया सशक्तिकरण हेतु केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा संचालित की जाने वाली आवश्यक योजनाएँ

भारतीय मीडिया और पत्रकारों के सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने के लिए सरकार को ठोस प्रशासनिक और कानूनी योजनाएँ लागू करने की आवश्यकता है:

. पत्रकार सुरक्षा कानून (Journalist Protection Act)

विशेष सुरक्षा दायरा: कर्तव्य पालन के दौरान पत्रकारों पर होने वाले जानलेवा हमलों, फर्जी मुकदमों और मानसिक उत्पीड़न को रोकने के लिए एक कड़ा केंद्रीय कानून बने।

गैर-जमानती अपराध: पत्रकारों पर हमला करने या उनके कार्य में बाधा डालने वालों के खिलाफ गैर-जमानती धाराओं के तहत तत्काल कार्रवाई की व्यवस्था हो।

. राष्ट्रीय पत्रकार कल्याण एवं पेंशन योजना (National Journalist Welfare & Pension Scheme)

पेंशन प्रावधान: 60 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ और अनुभवी पत्रकारों के लिए एक समान राष्ट्रीय पेंशन योजना शुरू की जाए।

आकस्मिक सहायता: दुर्घटना, गंभीर बीमारी या असामयिक निधन की स्थिति में पीड़ित परिवार को तत्काल 10 लाख से 25 लाख रुपये तक की आर्थिक अनुग्रह राशि प्रदान की जाए।

. डिजिटल मीडिया एवं स्वतंत्र पत्रकारों (Freelancers) के लिए मान्यता नीति

समावेशी नीतियाँ: वर्तमान में मान्यता (Accreditation) संबंधी मानक अधिकतर बड़े प्रिंट और टीवी मीडिया तक सीमित हैं। डिजिटल, वेब न्यूज़ और फ्रीलांस पत्रकारों को पारदर्शी प्रक्रिया द्वारा सरकारी मान्यता दी जाए।

आधिकारिक पास एवं प्रेस कार्ड: स्थानीय, जिला और राज्य स्तर पर निष्पक्ष पत्रकारों को प्रशासनिक कवरेज के लिए अधिकृत पास जारी किए जाएँ।

. स्वास्थ्य एवं सामाजिक सुरक्षा योजना (CGHS Coverage & Insurance)

स्वास्थ्य बीमा: देश के प्रत्येक श्रमजीवी पत्रकार को आयुष्मान भारत या सीजीएचएस (CGHS) के तहत कम से कम ₹10 लाख का कैशलेस स्वास्थ्य बीमा दिया जाए।

ईपीएफ और सामाजिक सुरक्षा: छोटे एवं मध्यम समाचार पत्रों/पोर्टल्स के कर्मचारियों को अनिवार्य ईपीएफ (EPF) और ईएसआई (ESI) सुरक्षा दायरा प्रदान किया जाए। निष्पक्ष विज्ञापन आवंटन नीति (Government Advertisement Policy)

पारदर्शी विज्ञापन आवंटन: विज्ञापन आवंटन में पक्षपात समाप्त कर छोटे, क्षेत्रीय और डिजिटल मीडिया संस्थानों के लिए न्यूनतम विज्ञापन कोटा (Ad-Quota) निर्धारित किया जाए।

देश के प्रमुख मीडिया एवं पत्रकार संगठनों द्वारा उठाई जाने वाली प्रमुख माँगें (10-सूत्रीय एजेंडा)

देश भर के प्रमुख मीडिया यूनियनों, संगठनों और श्रमजीवी संघों को सरकार और नीति निर्माताओं के समक्ष निम्नलिखित 10 प्रमुख बिंदुओं पर एकजुट होकर आवाज़ उठानी चाहिए:

1. राष्ट्रीय मीडिया आयोग (National Media Commission) का गठन

2. वेज बोर्ड (Media Wage Board) का पुनर्गठन एवं सख्त कार्यान्वयन

3. पत्रकार सुरक्षा अधिनियम (Journalist Protection Law) लागू करना

4. जिला एवं तहसील स्तर के पत्रकारों को स्वास्थ्य बीमा व सुरक्षा

5. टोल प्लाजा एवं सार्वजनिक परिवहन में टोल/किराया छूट

6. ग्रामीण व छोटे मीडिया हाउसों के लिए सरकारी सब्सिडी

7. गैर-मान्यता प्राप्त पत्रकारों को दुर्घटना व जीवन बीमा कवरेज

8. डिजिटल न्यूज़ मीडिया के लिए स्वतंत्र नियामक निकाय (Self-Regulatory Body)

9. निष्पक्ष एवं समयबद्ध विज्ञापन भुगतान (CBD/CBC Rates)

10. आवास योजना में पत्रकारों के लिए विशेष कोटा

 

 

राष्ट्रीय मीडिया आयोग का गठन: न्यायपालिका और चुनाव आयोग की तर्ज़ पर एक स्वायत्त निकाय बने, जो पत्रकारों के अधिकारों, वेतन और मीडिया आचार संहिता की निगरानी करे।

नया वेज बोर्ड लागू करना: महँगाई के अनुरूप डिजिटल, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कर्मचारियों के न्यूनतम वेतन पुनरीक्षण के लिए नया वेज बोर्ड गठित किया जाए।

जिला व तहसील पत्रकारों की सुरक्षा: ग्राउंड रिपोर्टिंग करने वाले क्षेत्रीय और ब्लॉक-स्तरीय पत्रकारों को अक्सर धमकियाँ मिलती हैं; अतः उनके लिए त्वरित शिकायत निवारण पोर्टल (Grievance Redressal Portal) स्थापित हो।

सस्ती आवासीय योजनाएँ: केंद्र व राज्य सरकारों की आवासीय योजनाओं (DDA, MHADA, BDA आदि) में निष्पक्ष पत्रकारों के लिए न्यूनतम आरक्षण तय किया जाए।

 

भारतीय मीडिया फाउंडेशन (National Core Committee) देश भर के पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए एक गैर-राजनीतिक व गैर-धार्मिक मंच के रूप में कार्य कर रहा है। संगठन द्वारा राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर मुख्य रूप से निम्नलिखित माँगें उठाई गई हैं:

सशक्त मीडिया – समृद्ध भारत तथा भ्रष्टाचार-मुक्त भारत का निर्माण: मीडियाकर्मियों के संवैधानिक और मौलिक अधिकारों का संरक्षण करते हुए देश से भ्रष्टाचार मिटाने में मीडिया को सशक्त भूमिका देना।

राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर मीडिया अधिकारों हेतु ‘महापंचायत’: देश भर के पत्रकारों को एक मंच पर लाकर ‘मीडिया अधिकार महापंचायत’ आयोजित कर सरकारों का ध्यान आकर्षित करना।

प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक एवं डिजिटल मीडिया सेल की स्थापना: मीडिया के प्रत्येक वर्ग—प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल व महिला पत्रकारों—के लिए अलग-अलग सेल बनाकर उनकी विशिष्ट समस्याओं का समाधान करना।

स्वतंत्र व निडर पत्रकारिता को संरक्षण: स्थानीय एवं जिला स्तर पर अधिकारियों या माफियाओं द्वारा पत्रकारों पर किए जाने वाले फर्जी मुकदमों को तुरंत खारिज करने की व्यवस्था करना।

संगठनात्मक एकजुटता व प्राथमिक सदस्यता: ‘मिशन प्रेस’ के तहत देश के हर गांव, तहसील और जिले से पत्रकारों को जोड़कर एक सशक्त नेटवर्क तैयार करना।

 

भारतीय मीडिया फाउंडेशन नेशनल कोर कमेटी के संस्थापक एवं बीएमएफ न्यूज नेटवर्क के संपादक ए.के. बिंदुसार के विचार लोकतंत्र में मीडिया की स्वतंत्रता, स्वावलंबन और अनुशासन पर केंद्रित हैं।

> “सशक्त मीडिया, समृद्ध भारत और भ्रष्टाचार-मुक्त भारत के नवनिर्माण के लिए भारतीय लोकतंत्र को सशक्त बनाना ही हमारी संस्था का मूल दर्शन है।”

> — ए.के. बिंदुसार (संस्थापक, BMF)

>

वैचारिक आयाम – ए.के. बिंदुसार का मुख्य दृष्टिकोण ,

गैर-राजनीतिक व निष्पक्ष स्वरूप -संगठन पूरी तरह से गैर-राजनीतिक, गैर-धार्मिक और गैर-जातिगत है। मीडिया का कार्य केवल सच को सामने लाना है, किसी धर्म, जाति या राजनीतिक दल को टारगेट करना नहीं।

“सूचना से समाधान” का सिद्धांत – पत्रकारिता केवल समस्याओं को उजागर करने तक सीमित न रहे, बल्कि सूचना के माध्यम से समाधान (Information to Solution) की दिशा में काम करे।

संगठनात्मक पहचान और अनुशासन – वास्तविक और फर्जी पत्रकारों के बीच अंतर स्पष्ट करने के लिए आधिकारिक पहचान और अनुशासन आवश्यक है। सामूहिक पहचान ही पत्रकारों की सुरक्षा का सबसे बड़ा कवच है।

‘मिशन प्रेस’ और युवा/महिला भागीदारी – आने वाली पीढ़ी को एक निडर, निष्पक्ष और पारदर्शी पत्रकार के रूप में तैयार करना। इसके लिए महिला सेल और युवा पत्रकारों की सक्रिय भागीदारी पर बल देना।

धरातलीय स्तर (Ground Level) पर संगठन -क्रांति और बदलाव की शुरुआत अपने घर, गाँव और परिवार से होती है। जब स्थानीय स्तर पर पत्रकार संगठित होंगे, तभी राष्ट्र स्तर पर बदलाव संभव होगा।

सशक्त मीडिया ही सशक्त लोकतंत्र का आधार है

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को मजबूत बनाने के लिए सरकार, मीडिया संस्थानों और पत्रकार संगठनों को मिलकर काम करना होगा। सरकार जहाँ सुरक्षा, स्वास्थ्य और वित्तीय सुरक्षा की योजनाएँ लागू करे, वहीं पत्रकार संगठनों को ए.के. बिंदुसार जैसे विचारकों के निष्पक्ष और संगठनात्मक मॉडल को अपनाते हुए पत्रकारिता की गरिमा और अनुशासन बनाए रखना चाहिए।

जब देश का ग्राउंड रिपोर्टर सुरक्षित, आर्थिक रूप से स्वावलंबी और संवैधानिक अधिकारों से लैस होगा, तभी भारत में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ वास्तविक अर्थों में सशक्त हो पाएगा।

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